रविवार, 3 जुलाई 2011

मैं मूर्ख हूँ और अपने देश का बुरा चाहता हूँ(परिवर्धित संस्करण )

साहब ने अपना ज्ञान बघारा है। अभी-अभी देखा। उनके सारे अनुयायी जैसे कि… छोड़िए नाम नहीं लेता हूँ। चला बिहारी ब्लागर बनने (सलिल नाम है जिन्होंने अप्रत्यक्ष रुप से मुझे कुछ कहा है। इनका नाम लेना पड़ा क्योंकि इन्होंने मुझे संबोधित किया है।) आदि अपने तो भेड़चाल में शामिल हैं लेकिन जरा देखिए कि मुझे क्या कहा है इस सलिल ने जो पटना के ही हैं- 'जिन महाशय ने कभी आपको भगोड़े भारतीय के खिताब से नवाजा था, उन्हें यह आलेख और ऐसे ही कई आलेख जो आपने पूर्ण शोध के आधार पर लिखे हैं, पढना चाहिए! मगर क्या किया जा सकता है- मूर्ख और मृतक अपने विचारों से चिपक जाते हैं!!'

      साहब भूल गए कि मृतक विचार कर ही नहीं सकता तो चिपकने की बात कहाँ से आ गई?



यानि ये आलेख पूर्ण शोध करके लिखा गया है। यहाँ एक बात बता दूँ कि उनके इस आलेख पर जितने लोगों ने टिप्पणियाँ की हैं उनमें से अधिकांश लोग जिस बात का समर्थन करते हैं उसे भी साहब ने गलत ठहराया है। लेकिन वहाँ किसी की हिम्मत नहीं होती कि पूछे कि वास्तव में उनके पास क्या तर्क हैं या हैं भी कि नहीं? शायद बात समझ में नहीं आ रही। लीजिए साफ-साफ बताता हूँ। कुछ दिनों पहले साहब ने एक लेख लिखा था। उसमें एक बात आई है कि ब्रिटिश संसद में लॉर्ड मैकाले का शिक्षा द्वारा भारत को दास बनाने का ड्राफ्ट के बारे में। इसे गलत बताया गया है। अब मैं कुबताता हूँ, सुनिए। आदरणीय लेकिन दिवंगत राजीव दीक्षित ने यह बात जमकर फैलाई थी। राजीव दीक्षित साफ-साफ कहूँ, तो बाबा रामदेव के गुरु थे। मैं तब एकदम परेशान हो जाता हूँ जब राजीव दीक्षित अपने व्याख्यानों में रामदेव को परमपूज्य कहते हैं। यह एकदम राजनीतिक अंदाज लगता है। फिर भी मैं राजीव दीक्षित का प्रशंसक हूँ। कम से कम उनकी बोलने की कला और उनके ज्ञान का तो हूँ ही। उनके ज्ञान का आधार हैं धर्मपाल जी। उनके बारे में मेरी जितनी जानकारी है उसके अनुसार वे मेरे सम्माननीय हैं। लेकिन राजीव दीक्षित के पीछे कुछ खोजबीन करनी शुरु की तो एक मित्र को बहुत बुरा लगा और वे इसे बरदाश्त नहीं कर सके। लेकिन यहाँ ज्यादा कहने का समय भी नहीं है और अभी ये सब कहना उचित भी नहीं है।

      मेरा सवाल है उन सारे टिप्पणीकारों से जो हिंदुत्व के पुरोधा हैं, रामदेव के अत्यन्त समर्थक हैं और साहब के ब्लाग पर टिप्पणी कर चुके हैं कि इस मैकाले वाली बात पर कितनों ने शोध किया? क्या साहब की हर बात 100 प्रतिशत सही होती है? उनकी बातों पर आँख मूँद कर विश्वास करना ही देशभक्ति और सच्चा होने का सबूत है? उससे अच्छा तो सुरेश चिपलूनकर(अभी तक की मेरी जानकारी से) हैं जो अपनी बात यथासंभव तर्क और सबूत के साथ करते हैं। मैं उनका प्रशंसक नहीं फिर भी उनकी इस बात का समर्थन करता हूँ। या फिर तेजोमहालय वाली बात को ले लें तो पी एन ओक की बात का इन सभी संघी टिप्पणीकारों ने समर्थन किया है। (मैं जिस ब्लाग पर या इंटरनेट पर जहाँ कहीं गया हूँ शायद ही किसी संघी आदमी ने पी एन ओक की बात का विरोध किया है।) क्या ये सारे लोग एक आदमी की हर बात में सिर्फ़ हाँ में हाँ मिलाते हैं? अगर ऐसा है, तो करते रहिए मेरी शिकायत और अपना समय इसमें लगाते रहिए। अब चालाकी से कहना होगा कि आप ऐसा नहीं करते तो अच्छी बात है कि मेरे उपर नहीं सोचते।


मुझे नहीं पता कि भक्तों की इन टिप्पणियों का क्या उद्देश्य है। लेकिन देख लें कि आखिर क्या कहते हैं लोग?
1) 'ज्ञान की कुछ पोथियाँ चबाते और मुँह से उसका झाग यहाँ वहाँ बिखराते हुये विचरते बछड़ों को पालने वालों के लिये यह जानकारी शायद कुछ काम की हो'

(इटालिक अक्षरों में ब्लाग जगत में कौन लिखता है, आप जानते ही होंगे।)

हर आदमी जो लिखता है, बोलता है, सोचता है कहीं न कहीं से वैचारिक खुराक लेता है। और इसमें गलत क्या है? लेकिन जब ये लोग ज्ञान बघारते हैं तो ठीक है, वह प्रमाण है, बुद्धिमत्ता है लेकिन जैसे मैंने कुछ कहा कि झाग हो गया। बार-बार तमाशा वह भी बिना पैसे के देखा जा सकता है यहाँ।
मेरा सवाल है कि कौन सा बन्दा है जो बिना पोथियाँ चबाए यहाँ लिख और बोल रहा है? कहीं कोई अवतार तो नहीं उतर गया आसमान से। निश्चय ही अपनी पोथियों में सोना और दूसरों की पोथियों में मिट्टी वाली मानसिकता होगी। चिकित्सक होने के लिए रोगी होना जरूरी होता है क्या? वैसे शारीरिक चिकित्सकों को मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा की जरूरत सबसे अधिक है।

2) 'यह नास्तिकों का पुराना शगल है। जैसे ही कोई तथ्यपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई जाती है छपाक से कह उठेगें, "क्रान्तिकारीयों का कोई धर्म नहीं होता। अन्यथा वर्ना गढ गढ के देंगे कि फलां फलां क्रांति कारी नास्तिक थे
जैसे क्रांतिकारीयों का कोई धर्म नहीं होता ठीक वैसे ही क्रांतिकारी (मां के) कभी भी नास्तिक नहीं होते।यह तो आपकी तरह कोई कोई ही प्रमाण लाता है। अन्यथा इनको तो कुछ और ही सिद्ध करना है।'

(ये महात्मा तो बुद्ध के अवतार हैं।)

        आखिर बेचारे क्यों परेशान हैं? एक का कहना है कि तथ्यपूर्ण जानकारी से नास्तिक कतराते हैं। दस हजार शब्द लिख डाले होंगे मैंने इनके लिए तर्क और तथ्य के साथ। लेकिन दूसरी जगह जाकर निंदा-रस का आनंद ही अलग है। यह तो साहब की तरह की ही कोई-कोई प्रमाण लाता है, इस वाक्य की शल्य-क्रिया करते हैं। जब मैं किसी किताब का हवाला दूँ और लेखक का नाम लूँ तो वह प्रमाण नहीं लेकिन अखबारों से उठाकर लानेवाली बात प्रमाण बन जाती है। मुझसे तो भगतसिंह के दस्तावेज के ही प्रमाण माँगे जाते हैं लेकिन ये साहब के अन्धभक्त उनके उपर इतना विश्वास करते हैं कि उनकी कही बातों को कृष्ण की गीता से कम नहीं मानते। इतने अच्छे भक्त तो काल्पनिक कथाओं में भी नहीं मिलते होंगे।
कहते फिरते हैं कि नास्तिकों से कोई दिक्कत नहीं और नास्तिकों का सम्मान करते हैं। लेकिन इनकी हर टिप्पणी बताती है कि ये कितने उन्मादी और अलगाववादी हैं। नास्तिकों के बारे में जितना जहर उगलते हैं उतना भजन ही गाइये, शायद कुछ काल्पनिक खुशी मिल जाय। नास्तिकों के पास इतनी फुरसत नहीं कि वे भजन गा सकें।
     अच्छा है, भाइयों खूब मेहनत करो। बस अपनी एक आदत है कि जवाब दे ही देता हूँ। क्योंकि भागना पसन्द नहीं।
      मतलब ये कि मैंने जो कहा या लिखा उसका जवाब अभी तक किसी ने भी दिया नहीं लेकिन मेरा कहा बेकार और झूठा है लेकिन साहब की चमचागीरी करता हुआ यह आदमी उनके द्वारा लिखे को शोधपूर्ण कहता है। क्या शोध है भाई? जरा शोध देख लेते हैं।

     उनके द्वारा बताए और सुझाए गए लिंक देखिए।

 

1)      जेल में गीता मांगी थी भगत सिंह ने

 

     जागरण की खबर को बनाया भारी शोध और अन्य सभी बातें बन गईं निराधार। मैंने जो लिखा या कहा वह किताबों से नाम और पते के साथ था लेकिन ये जनाब दैनिक जागरण जो आजकल बिहार में नीतीश के गुणगान करने में सारी सीमा को तोड़ता जा रहा है, उसकी बात को सौ साल तक किया गया भारी शोध समझते हैं। यहाँ नीतीश के बारे में यह बात याद रखी जाय कि वे कांग्रेस के नहीं हैं। यानि भाजपा और जदयू के हैं। नीतीश वाली यह बात आवश्यक नहीं लेकिन कह दिया क्योंकि दैनिक जागरण की सच्चाई देख रहा हूँ।


      बीबीसी की साइट से इसका हवाला दिया गया है। इसके लेखक कौन हैं, जरा ध्यान दीजिए -

साम्यवाद से प्रभावित थे भगत सिंह  जो चमनलाल का आलेख है, की तरफ़ कोई ध्यान नहीं दिया। जबकि यह आलेख उनके द्वारा सुझाए गए लेख के ही लिंक में है। क्यों? क्योंकि सम्भवत: ये लोग कांग्रेस भगाओ आन्दोलन के पक्षधर हैं न कि पूँजीवाद हटाओ के? ये सारा तामझाम सिर्फ़ कांग्रेस के खिलाफ़ करते हैं। ये भाजपा के खिलाफ़ कब बोलते हैं। मैंने पिछली पोस्ट में भाजपा को लेकर कुछ बातें बताईं थीं। अभी तक उनका जवाब नहीं आया है। आएगा तो बता दूंगा।
कांग्रेस अगर नागनाथ है तो भाजपा भी साँपनाथ तो है ही। मैं इन दोनों का विरोध करता हूँ और साथ में भारत के नकली कम्युनिस्ट लोगों का भी। जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपने एकदम निंदनीय कार्य को अंजाम दिया। राहुल सांकृत्यायन जैसे लोग यूँ ही पार्टी से अलग नहीं हुए थे।

3) भगवद्गीता से ली थी भगत सिंह ने प्रेरणा?


     मतलब अखबारों ने जो लिख दिया वह सब शोध और आप लिखें तब इनके लक्ष्य में अवरोध। ये कैसा सत्य-बोध है? जब मैने अपने चिट्ठे पर भगतसिंह के गीता मँगाने के बारे में लिखा तो किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन देखने और सोचने की चीज तो यह है कि सब के सब बन्धु कितनी चाटुकारिता के साथ वन्दना करने में लगे हैं कि वाह क्या शोध है, मुझे पढ़ना चाहिए। यहाँ एक बात बताने का मन हो रहा है कि मेरे ब्लाग पर सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पोस्ट भगतसिंह की ही है। मैं ब्लागिंग में मात्र 10-15 दिनों से सक्रिय हूँ। अगर आप समझते हैं कि पहले से हूँ तो यह भ्रम है क्योंकि मेरे मई तक के सारे आलेख तेवरआनलाइन डाट काम पर प्रकाशित हैं और मैंने इन्हें अपने ब्लाग पर डाल दिया है। जिस दिन तेवर पर जो भी आलेख छपा उसी दिन की तारीख में अपनी वह पोस्ट मैंने अपने ब्लाग पर डाल दी है।

      गीता और भगतसिंह के संबंध में मैंने अपने तर्क और विचार पिछले दिनों रखे था। और जब तक आपके पास मेरे सवालों या तर्कों के जवाब नहीं हैं, आप कैसे अपनी बात को शोध करार दे सकते हैं।

      गाँधी जी आस्तिक थे(आस्तिक मतलब वह जिसे समाज आस्तिक कहता है)। मैं उनका प्रशंसक हूँ और उनके अधिकतम बातों के समर्थन में हूँ। तो क्या मैं उन्हें आस्तिक-नास्तिक की नजर से देखता हूँ। नहीं, बिलकुल नहीं! लेकिन भगतसिंह पर, उनके विचारों पर कोई अंगुली उठाए तो मैं अपनी बात तो रख ही सकता हूँ। बस वही किया और लोग हैं कि परेशान हो गए हैं। गाँधी जी पर मेरी बात से साफ-साफ पता चलता है कि मैंने सुभाष चन्द्र बोस पर भी सवाल उठाए हैं। जब तक मेरी समझ में सच नहीं आता तब तक मैं सवाल करूँ या छानबीन करूं तो कौन सा गुनाह कर रहा हूँ मैं?

    

लेकिन नहीं। मैं मूर्ख हूँ और देश का बुरा चाहता हूँ!

11 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय चन्दन जी,
    आपके विचार सुलझे हैं... आपके प्रश्न जरूर पुनर्चिन्तन को बाध्य करते हैं.
    आपका अंदाज कटुक्ति करने वाला अवश्य है किन्तु आपकी संवाद शैली सभ्य है.
    मुझे तो आपका व्यक्तित्व 'थार-थार को गही रहे, थोथा देय उड़ाय' ... जैसा प्रतीत होता है.

    इतना ही कहूँगा... कुछ व्यक्ति जिन्हें हम भावुक कहते हैं... वे अतिवादी मानसिकता के हो सकते हैं. वे आपको मूर्ख या देशद्रोही तक कह देंगे ... केवल इसलिये कि वे अंध 'राष्ट्रभक्ति' करते हैं. उन्हें हर वो व्यक्ति बुरा ही लगेगा जो उनके सुर में सुर मिलाता नज़र नहीं आयेगा.
    .
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    मैं जानता हूँ... कुछ व्यक्ति विपरीत बोलकर या विपरीत बातें करके सीधी बातों की (मतलब सत्य की) स्थापना करते हैं.
    मुझे मेरे एक प्रिय प्रोफ़ेसर (गोपीनाथ प्रधान) मिले .... उन्होंने कहा मैं बाबा रामदेव और कपिल सिब्बल में ... कपिल सिब्बल को पसंद करता हूँ.
    ...... मैंने कहा मैं जानता हूँ ...... आप इसलिये ऐसा कहते हैं कि आप मुझे आंदोलित कर मुझसे अभी काफी कुछ सुनने की फिराक में हैं.

    चन्दन जी, आप जैसे उत्प्रेरक व्यक्ति न हों तो विवादास्पद विषयों पर पुनर्चिन्तन संभव न हो पाये.
    सच्चे मायनों आप गुरु की भूमिका निभाते हैं.

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  2. 'सार- सार को गही रहे, थोथा देय उड़ाय'...... उक्ति को इस तरह पढ़ा जाये.

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  3. आदरणीय प्रतुल जी,

    आप यहाँ आए और अपनी बात कही। अच्छा लगा। लेकिन दोहे का अर्थ जरा विस्तार से बताएँ, मैं समझने में असमर्थ हूँ।

    और हाँ, इस पोस्ट को कुछ मिनटों में अपग्रेड(हिन्दी शब्द सूझ नहीं रहा) करने वाला हूँ। क्योंकि अभी ध्यान से देखा तो पता चला एक दो लोग ऐसे हैं जिनकी बार मैंने ध्यान से नहीं देखी थी।

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  4. dohe ka arth ki --

    mukhy ansho ko svikaar kar liya aatmsaat kar liya aur jo faaltu chijen thi unko chhod diya, ssar ko svikaar karne vaale hain aap.

    बहुत-बहुत आभार महोदय ||

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  5. 'सार- सार को गही रहे, थोथा देय उड़ाय'.
    @ गुरु का स्वभाव सूप की भाँति होता है... जो सार-सार (उपयोगी) को रखकर थोथी (हल्की और निरर्थक) वस्तुओं को उड़ा (बाहर) कर देता है.
    शिष्य में आचरण डालते हुए वह व्यर्थ बातों को दरकिनार कर देता है. ........ केवल यही आशय था.

    अपग्रेड को हम प्रोन्नत कह सकते हैं... फिलहाल यही सूझ रहा है. यदि कोई अन्य शब्द दिमाग में आया तो अवश्य कहूँगा.

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  6. ठीक है। अब तो परिवर्धित संस्करण लिख चुका हूँ।

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  7. चंदन जी,
    अच्छा किया आप ने उत्तर दे दिया। हालाँकि वहाँ जो कुछ हो रहा है उस का उत्तर देना जरूरी नहीं था। जो लोग अपने कुएँ में ही मस्त रहना चाहते हों उन्हें वहाँ से कौन बाहर निकाल सकता है?

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  8. भगतसिंह के दस्तावेज़ों को नेट पर भी उपलब्ध कराए जाने की जरूरत है...
    उन्होंने काफ़ी कुछ, ख़ुद कहा है...

    इसलिए ही भगतसिंह के विचारों से बचते हुए उन्हें भी, उनकी आम लोकप्रियता की वज़ह से सिर्फ़ एक पत्थर की मूर्ति का प्रतीक भर बना देना चाहते हैं...कुछ हितों को यही उचित लगता है...

    उनके विचारों की सीधी, आम प्रस्तुति की जरूरत है...

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  9. श्रीमान चन्दन कुमार मिश्र जी,
    सवाल करने का थोड़ा बहुत शौक मुझे भी रहा है, लेकिन मेरे सवाल आपके स्तर के नहीं होते, प्राय: निम्नस्तरीय ही होते हैं इसलिये ईमेल नहीं कर रहा और यहीं कमेंट कर रहा हूँ।

    कोई मुझे इस तरह से समझाने की कोशिश करे कि अमुक ब्लॉगर बहुत बड़ा ब्लॉगर है या ज्ञानी है तो मैं भी नहीं मानने वाला था, इसलिये आपको यह सलाह मैं भी नहीं दे रहा। बल्कि मैं खुद इस बड़े छोटे वाले वर्गीकरण के खिलाफ़ अपने तरीके से आवाज उठाता रहा हूँ, बेशक अपने अनगढ़ अंदाज में। मैं खुद अपने को बहुत तल्ख इंसान मानता हूँ, इसलिये जिससे बिगड़नी हो तो जल्दी बिगड़े, अपनी कोशिश भी यही रहती है। लेकिन इस पोस्ट के पहले पैरा में अपनी भाषा शैली देख लें - सहमति असहमति अपनी जगह पर रहे और अभिव्यक्ति का ढंग ठीक रहे तो बड़े बुजुर्ग उसे अच्छा ही बता गये हैं। ’इस सलिल ने जो पटना के ही है’ ये भाषा का क्या स्तर है?

    रही बात भगत सिंह पर विचार रखने की तो शहीद किसी एक की व्यक्तिगत पूँजी नहीं होते कि पेटेंट करा लिया, और जो आप कहेंगे या कोई और कहेगा वही शाश्वत सत्य हो गया। अपमान वाली बात हो तो उबलना स्वाभाविक है लेकिन विचार न मिलने पर ताने कसना या गलत तरीके से बोलना कहीं से ठीक नहीं है।

    आपने लिखा है कि आप ब्लॉग जगत में दस-पन्द्रह दिन से सक्रिय हैं, इस लिहाज से मैं थोड़ा सा पहले आ गया था सो बहुत से तमाशे देखे हैं और अब इनपर हँसी आती है। ऐसी पोस्ट्स(तथाकथित सार्थक बहस वाली) बहुधा मनोरंजन के लिये देख पढ़ लेते हैं, लेकिन यहाँ कमेंट करने की धृष्टता कर दी है।

    एक जगह पर आपका लिखा कुछ देखा था, हिंदी पट्टी में प्रचलित कुछ बात वगैरह - देश हिंदी पट्टी से इधर उधर भी है, कभी मौका लगा तो कुछ पंजाबी और हरियाणवी कहावतों, मुहावरों से भी परिचय करवाते हैं आपका। इसी बहाने मूड फ़्रेश हो जायेगा और देश की विविधता को जान लेंगे हम लोग:)

    इस कमेंट को बहुत ज्यादा सीरियसली लेने की जरूरत नहीं है क्योंकि मैं खुद बहुत सीरियस ब्लॉगर नहीं हूँ। हाँ, बनने बिगड़ने की अपने को भी कोई परवाह नहीं है क्योंकि यहाँ कोई किसी का आका नहीं है।

    शुभेच्छा स्वीकार करें।

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  10. आदरणीय संजय जी,
    आपने अपने विचार यहाँ रखे इससे मुझे किसी तरह की आपत्ति नहीं है। हाँ, एक बात साफ करना चाहता हूँ कि 'इस सलिल ने जो पटना के ही हैं' लिखा है, इस बारे में। 'हैं' लिखा है जो आदरसूचक है। 'है' नहीं लिखा है, ध्यान से देखिए। और इससे पहले भी मैंने 'उन्होंने' यह संबोधन दिया है जो आदरसूचक ही है। मेरे हिसाब से समस्या नहीं है। हाँ 'इस' पर मतभेद हो सकता है। लेकिन मैंने अपनी हिन्दी की समझ से 'इन' नहीं लिखकर 'इस' लिखा है क्योंकि मुझे लगता है एकवचन के लिए कम से कम यहाँ पर इन नहीं लिखा जा सकता। हो सकता है कि मेरा व्याकर्ण का ज्ञान कम या गलत हो।

    बाकी आपकी बातों से मुझे कोई दिक्कत नहीं।

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  11. @ है\हैं:
    ठीक है बन्धु, ’हैं’ ही लिखा दिख रहा है। व्याकरण विशारद तो मैं भी नहीं हूँ, आप के कथनानुसार आदरसूचक ही लिखा है तो ठीक ही लिखा होगा। अपनी तो खुद की भाषा ही बिगड़ी पड़ी है।
    कमेंट का उद्देश्य यही था कि पहल अपनी तरफ़ से न हो।
    असहमति से मुझे भी कभी दिक्कत नहीं होती, न जाहिर करने में और न स्वीकार करने में।

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