मंगलवार, 28 जून 2011

भगतसिंह के नास्तिक होने की बात को ही झुठलाने की कोशिश

भगतसिंह और नास्तिकता का मुद्दा अभी भी जोरों पर है। कल वाली पोस्ट के बाद भी टिप्पणियों का शोर थमा नहीं है। मैं खुद चकित हूँ कि इस तरह टिप्पणियाँ होती रहीं, तो कुछ ही दिनों में किताब का रुप अख्तियार कर लेंगी। फिर मैं आपके सामने आगे की टिप्पणियाँ दे रहा हूँ। कुछ चीजें जो व्यक्तिगत हैं, उन्हें देने की कोई जरूरत तो नहीं है लेकिन उन्हें हटाने से कुछ बातें स्पष्ट नहीं हो पाएंगी और वैसे भी चिट्ठा यानि ब्लॉग है तो कुछ कुछ डायरी जैसा भी। 

पहले की टिप्पणियों के लिए पिछली पोस्ट देखें। इस बार दो नए लोग बहस में शामिल हुए हैं। पहले आते हैं अमर कुमार जो कुछ देर के लिए अपनी बात या कहिए आपत्ति रखते हैं और बाद में स्मार्ट साहब अपनी बात कह जाते हैं। थोड़े गुस्से में हैं। तभी आगमन होता है इस नाटक के एक नए पात्र ग्लोबल अग्रवाल का जो भगतसिंह के नास्तिक होने पर ही सवाल खड़ा करता आलेख थमा जाते हैं। मैंने उनकी हर बात का जवाब अपनी समझ से देने की कोशिश की है। यह बहस अभी चलती रहेगी या समाप्त भी होगी, यह नहीं कहा जा सकता। 


इस पोस्ट में अमर कुमार जी और दिनेशराय द्विवेदी जी की कुछ बातें इस पोस्ट के लिए आवश्यक नहीं हैं लेकिन इतनी टिप्पणियों में हर बार काट-छाँट आसान नहीं हो पाया है। पहले की तरह यह पोस्ट फिर लम्बी ही होगी। पढ़ने में समय भी ज्यादा लगेगा। तो  शुरु करते हैं अमर कुमार जी की टिप्पणी से। 
डा० अमर कुमार,  27 June 2011 4:37 AM

आदरणीय पँडित जी..
लीजिये 108वीं हमारी भी... पर मुझे आश्चर्य तब होता है, जब बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग एक सामान्य तर्क को अपने विपरीत पाकर व्यक्तिगत आक्षेप समझ बैठते हैं और फिर मूल प्रश्न को दरकिनार कर तर्क की गोल-गोल गलियों में घूमते आरोप-प्रत्यारोप का चक्र चलाने लगते हैं ।
( यहाँ यह बात दीगर है कि इस प्रकार टिप्पणियों की सँख्या बढ़ने पर बधाईयों का आदान-प्रदान भी होता है !? )
बिना वकालतनामा के मैं यह कहना चाहूँगा कि अनुराग शर्मा ने मूल प्रति की जानकारी ही मांगी थी और बाद में गोलमोल जवाब मिलने पर इतना ज़रूर कहा कि बिना देखे किसी बात का प्रचार भी एक किस्म की आस्तिकता ही हुई तो चन्दन कहते हैं: 
"यह एक छोटा सा पत्र है कोई चंद्रमा को दो टुकड़े करने की बात तो नहीं थी कि इसपर इतना शक हो गया। हम भला चमत्कार की बात करते तो कुछ सही भी था लेकिन यह क्या ?"
यह क्या है... क्या इसे टिप्पणीकार की आवेशित प्रतिक्रिया का सहज लड़कपन ही मान लिया जाये ? यहाँ तक भी बात बन सकती थी, पर आपका यह कथन कि "भगतसिंह के जिस लेख को सारी दुनिया प्रामाणिक मानती है । आप उसे गलत सिद्ध करना चाहते हैं तो इस खोज में जुट जाइए । आप घर बैठे उसे गलत मानते हैं तो मानते रहिए ।".. कम से कम मुझे बुरी तरह आहत कर रहा है ( व्यथित मन लेकर सोने गया पर आखिर किसी वजह से ही.. सुबह चार बजे बिस्तर से उठ यहाँ अरदास लगा रहा हूँ )
मैं मानता हूँ कि एक नामधारी और एक बेनामी, यह दोनों लड़के अपने ज्ञान के जोश से अभद्रता की हद तक उबलने लगते हैं.. यह उनका व्यक्तित्वदोष हो सकता है... पर आपका यह कथन कि, "हमारी भी इस मामले में आप से बहस करने में कोई रुचि नहीं है । हम यह बहस करने गए भी नहीं थे । आप ही यहाँ पहुँचे हुए थे ।" प्रश्नकर्ता के क्षोभ को किस कदर बढ़ा सकता है.. यह आप स्वयँ ही विचार करें । एक तर्कजीवी से साक्ष्य को लेकर उठाये गये बिन्दु पर ऎसी प्रतिक्रिया की अपेक्षा नहीं की जा सकती ।
पिछले चार वर्षों के मेरी जानकारी के आधार पर आपका व्यक्तिगत द्वेष किसी से भी नहीं रहा है, और फिर व्यक्तिगत द्वेष तो व्यक्तिगत ही होता है अतः किसी सार्वजनिक मँच पर सामाजिक महत्व के प्रश्न यथा आस्तिकता, नास्तिकता, प्रोपेगेंडा, राजनैतिक मिशन आदि पर विचार विनिमय एवँ जानकारियों के स्रोत के आदान प्रदान की सँभावनाओं को व्यक्तिगत परिप्रेक्ष्य से परे होना चाहिये । लगता है, टिप्पणी अनधिकृत रूप से लम्बी हो चली है.. इससे पहले कि आप मुझे दौड़ायें, मैं स्वयँ ही निकलता लेता हूँ :)
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 5:25 AM

माननीय श्री अमर कुमार जी,

आपने अपने विचार रखे। अति उत्तम।(इसे भी व्यक्तिगत आक्षेप मत मान लीजिएगा)
सवाल के अनुसार मैंने कोई गोलमोल जवाब नहीं दिया था। यह आपको लगता है, कोई बात नहीं। बेनामी लड़के, जी हाँ। उम्र बताऊँ 22 साल से कम। टिप्पणियों की संख्या यहाँ किसी महाभारत रचाने के लिए नहीं लिखी थी। मैंने यूँ ही कहा कि 100 हो गईं। लेकिन फिर भी आपको इससे दुख पहुँचा तो मैं माफ़ी चाहता हूँ(वैसे यह बोलने से क्या होता है?।

मैं हमेशा वही बोलता हूँ जो मुझे लगता है लेकिन मुझमें व्यक्तिगत दोष हैं तो शायद समय के साथ-साथ दूर हो जाय।

आप कहते हैं- 'क्या इसे टिप्पणीकार की आवेशित प्रतिक्रिया का सहज लड़कपन ही मान लिया जाये ?' बोलिए इसे क्या मानूँ? आप जो कहें मैं मान लूंगा।

http://shrut-sugya.blogspot.com/2011/06/blog-post.html
देख लेते तो बेहतर होता। आक्षेपों का क्रम वहीं से जारी है। मैं अपनी समझ से जवाब देता गया। 

एक बार फिर से देख लें महाशय, द्विवेदी जी ने टिप्पणी संख्या 101 में क्या कहा है, उन्होंने टिप्पणियों पर कोई टिप्पणी नहीं की है। यह आपका खुद से निकाला हुआ अर्थ है। इसलिए आपके इस आरोप को मैं सिरे से खारिज करता हूँ क्योंकि 100वीं टिप्पणी लिखनेवाला व्यक्ति मैं ही हूँ।

आपसे जब अगर आपके घर का छोटा सदस्य पैसे मांगे जैसे दस साल का बच्चा 100 रु मांगे, तो आप उसका उद्देश्य पूछते हैं। मैंने भी उद्देश्य पूछा है और मैं शायद जानता भी हूँ, इसलिए आप उपरोक्त लिंक देखते तो समझ पाते कि माजरा क्या है।
और अन्त में एक परम सत्य।

अगर आपमें किसी के प्रति व्यक्तिगत द्वेष अल्पमात्रा में भी नहीं है तो आप बुद्ध हैं और हम बुद्धू। साधारण आदमी में ये गुण अगर नहीं हैं(भले ही ये दुर्गुण हैं)तो वह मिलावटी आदमी है, ऐसा मेरा अभी तक का(शायद आपके अनुसार बहुत कम)अनुभव और समझ दोनों है।

जवाब में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण वाक्य था-
'
एक मिनट के लिए मान लेते हैं कि वह आलेख उन्होंने नहीं लिखा तब भी क्या फर्क पड़ जाता है? उसमें ऐसा क्या लिखा है? उसके सवालों के जवाब हैं?'

और चमनलाल जी के मेल को देने का उद्देश्य था कि यह जान लिया जाय कि चमनलाल झोला छाप लेखक नहीं हैं बल्कि योग्य और भगतसिंह के अधिकृत लेखकों में हैं।
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 6:45 AM

आदरणीय डॉ अमर कुमार जी,
भगतसिंह के पत्र के बारे में एक बात और कहना चाहता हूँ कि दिल्ली कहीं मंगल ग्रह पर भी नहीं है। वहाँ जाकर चमनलाल जी ने जो पता दिया है वहाँ पर देखा जा सकता है। और इसमें कुछ गलत हो तो चमनलाल सहित आधार प्रकाशन या सभी वेबसाइटों पर मुकद्दमा चलाया जा सकता है कि हर जगह झूठ प्रचारित किया जा रहा है। सब के परिचित दिल्ली में होंगे ही। इतनी जिज्ञासा हो तो उन्हीं से दिखवा लें। इसमें आपको क्या गलती नजर आती है? हम किसी अदृश्य शक्ति की तो बात नहीं कर रहे थे। पूरा पता और विवरण भी मैंने पता लगाकर दिया था।

दूसरी बात, हो सकता है इससे द्विवेदी जी मुझसे भी नाराज हों जाय लेकिन मैं फिर भी कहूंगा।

मैंने किसी ऐसे ब्लागर को नहीं देखा जो दूसरों को व्यक्तिगत आक्षेप से बचने की सलाह देता हो और खुद कई जगहों पर व्यक्तिगत आक्षेप नहीं करता रहा हो। इसी पोस्ट से, आप खुद देखें- रोहित को आपने क्या कहा? गिनिए पहला टुच्चेपन करनेवाला, दूसरा शिखंडी जैसा व्यवहार, तीसरा उनकी टिप्पणियों को पकाऊ, चौथा अधजल गगरी, पाँचवा हिज मिस्ट्रेस वाइस, छठा अंग्रेजी में साफ शब्दों में वेस्ट,सातवाँ बघारने वाला और आठवाँ टट्टी की आड़ में जवाब देने वाला। 

बस यही बात खटकती है सबको जब मैं उनकी कमियाँ गिनाता हूँ। इंटरनेट से यह सुविधा भी है कि आपको या मुझको जल्दी ही खोज सकता है कि कैसी जगह क्या लिख कर आते हैं?

अब आप ही बताइए कि आप आठ गलत संबोधन या शब्द इस्तेमाल करते हैं और व्यक्तिगत आक्षेप नहीं करने की भी बात करते हैं। मैं मानता हूँ कि बहुत जगह आपकी टिप्पणी सही भी हो सकती है लेकिन यह मैं जानता हूँ कि हर आदमी कहीं न कहीं आक्षेप लगा डालता है, कम से कम ब्लाग जगत में।

इसलिए इस व्यक्तिगत आक्षेप के प्रवचन को सभी साइटों से विदा हो जाना चाहिए। मैं पिछले 5-6 दिनों से ब्लाग जगत में सक्रिय हूँ और सिर्फ़ तीन पोस्टों पर 400 टिप्पणियों में लगभग 170-80 में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से शामिल हूँ। और यह बात मुझे लगने लगी है कि गुटबाजी हो रही है। और होना बुरी बात भी नहीं क्योंकि एक समान विचार के लोगों का ही समूह गुट है।

फिर मैं कहूंगा कि इस व्यक्तिगत आक्षेप के प्रवचन को बन्द किया जाय। मैं हर जगह यह प्रवचन सुन चुका और सारे प्रवचनकर्ता खुद यही करते हैं और दूसरों से उम्मीद करते है कि धैर्यवान बने रहो। यह बनावटीपन अच्छा नहीं। 

मैं कह सकता हूँ ब्लाग जगत में बहुत और बहुत कम लोगों में इतना धैर्य है कि वे सब तटस्थ भाव से सुन लें या कहें। गाँधी या बुद्ध बनने की कोशिश नहीं करें।
( इसी बीच एक और टिप्पणीकार अपना सवाल रख जाते हैं। )
संजय @ मो सम कौन ?,  27 June 2011 8:09 AM

एक छोटा सा सवाल है अगर किसी की भावनाओं को ठेस न पहुँचे तो - 
"बिना नास्तिक हुये भी कोई भगत सिंह(और उन जैसों पर) श्रद्धा रख सकता है या इसके लिये भी किसी नास्तिक आचार्य से ..?"
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi,  27 June 2011 8:18 AM

@डा० अमर कुमार
आदरणीय,
तर्क तक तो ठीक था। लेकिन प्रमाणों की तीन खेप के बाद भी यह कहा जाए कि 'आप ने जिस चिट्ठी को देखा नहीं है उसे प्रचारित करना आस्तिकता ही है,' फिर यह कह देना कि उन की लंबी बहस में कोई रुचि नहीं है, का क्या अर्थ है? यह उन की निकल लेने की घोषणा है। उन्हें शायद आशा नहीं थी कि चंदन या मैं प्रमाण प्रस्तुत कर सकेंगे। उन का सोचना रहा होगा कि अब हम यहाँ से निकल लेंगे। उन के पास भी प्रमाण पा कर इस तरह निकल लेने के सिवा कोई चारा नहीं रहा था। 

ऐसे में मेरा उन्हें यह कहना कि बहस के लिए तो वे स्वयं ही पहुंचे हुए थे, अनुचित व्यहार नहीं है। हाँ, उसे कुछ रूखा अवश्य कहा जा सकता है। पर क्या करूँ बड़े भाई! बिना किसी चिकित्सक के बोले ही पिछले आठ-दस वर्षों से बिना चिकनाई की रोटियाँ खा रहा हूँ, शायद उसी का असर हो। स्मार्ट जी ने बोल्ड अक्षरों वाली अतिरिक्त टिप्पणी वहाँ चिपकाई न होती तो शायद मुझ से यह धृष्टता भी न होती। 
चंदन मिश्र की ऊर्जा दाद देने लायक है। मुझे तो उन्हों ने स्मार्ट जी के निकल लेने के बाद भी अपनी बात को पूरा किया और प्रमाण प्रस्तुत किए। यदि इस ऊर्जा के साथ कोई आस्तिकता को प्रमाणित कर रहा होता तो भी मैं दाद दिए बिना नहीं रहता। 

हाँ स्मार्ट जी भी इस के लिए दाद के काबिल तो हैं ही कि वे ही अंत तक टिके रहे।
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi,  27 June 2011 8:47 AM

@संजय @ मो सम कौन ? 
संजय भाई, 
क्यों नहीं। किसी व्यक्ति का आदर उस के कार्यों से होता है, न कि उस की विचारधारा के कारण। नास्तिक और आस्तिक दोनों ही प्रकार के लोगों में निंदनीय और आदरणीय लोगों की संख्या कम नहीं है। 
इस पोस्ट में प्रश्न सिर्फ इतना था कि ईश्वर को न मानने पर दोजख़ (नर्क) में जाना पड़ेगा तो शायद भगतसिंह भी वहीं होंगे। 
यदि वास्तव में कोई नर्क स्वर्ग हुए तो क्या उस का पैमाना ईश्वर को मानने और न मानने का विचार रखना होगा या उस के वे कर्म जो वह अपने जीवन में करता है। 
वैसे आज जीवित लोगों में नर्क और स्वर्ग को मानने वालों और उसकी परवाह करने वालों की संख्या कितनी है यह सब जानते हैं।

(इसके बाद एक अन्य टिप्पणीकार आते हैं और अपनी बात कह जाते हैं लेकिन इस पोस्ट से उसका कोई खास संबंध नहीं है। इसलिए उसे यहाँ नहीं दिया जा रहा है। तभी आते हैं मेरे जवाबों के केंद्रीय पात्र स्मार्ट इंडियन।)
Smart Indian - स्मार्ट इंडियन,  27 June 2011 8:55 AM

अपने वादे के अनुसार यहाँ हाज़िर हूँ। अब तक जो दिखा और समझ आया और जो बहस के जाल में उलझने से पहले फिर से स्पष्ट करना ज़रूरी है:

1. मैने उस पत्र को कहीं भी झूठा नहीं कहा। मैंने तो यह भी नहीं कहा कि भारत माता ने भगत सिंह जैसी बहुत सी आस्तिक संताने भी जन्मी हैं । मैंने तो यह भी नहीं याद दिलाया कि भगत सिंह नास्तिक होने के अलावा भी बहुत कुछ थे। मैने तो सिर्फ उस पत्र की मूल प्रति की जानकारी मांगी थी। फिर भी आपने ऐसे आरोप लगाये जैसे कि मूल प्रति की जानकारी मांगना पत्र को झूठा कहना हो। एक वकील यदि इन दो बातों का अंतर स्पष्ट न देख सके (या ऐसा जताये) तो उसका मतलब क्या होता है आप अच्छी प्रकार समझते होंगे। 

2. अशफाक़ उल्लाह खाँ, सरदार भगत सिंह, पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्र शेखर आज़ाद, नेताजी बोस, तात्या टोपे, मंगल पाण्डे जैसे शहीद हम भारतीयों के दिल में सदा ही रहेंगे, उनके व्यक्तिगत या धार्मिक विश्वासों से उनकी महानता में कोई कमी नहीं आने वाली है। वे अपने धार्मिक विश्वास के कारण श्रद्धेय नहीं है बल्कि अपने कर्मों के कारण हैं । उनके व्यक्तित्व को छांटकर उन्हें एक देशभक्त हुतात्मा मानने के बजाय बार बार उन्हें सिर्फ़ एक नास्तिक बताकर या उनके श्वेत-श्याम चित्र में उनके साफ़े को लाल रंगकर उनके क़द को कम करने की आदत बुरी बात है। वे अविवाहित भी थे, सिर्फ़ इतने भर से दुनिया भर के अविवाहित श्रद्धेय नहीं हो जायेंगे। 

3. भगत सिंह जीवन भर आस्तिक रहे हों या बाद अपने अंतिम दिनों में नास्तिक हो भी गये हों इससे यह बात झुठलाई नहीं जा सकती कि उन्होंने जीवनभर अनेकों आस्तिक क्रांतिकारियों के साथ मिलकर काम किया है, उनसे निर्देश लिये हैं और उनके साथ प्रार्थनायें गायी हैं। उनका आस्तिकों से कोई झगडा नहीं रहा। आस्था उनके लिये एक व्यक्तिगत विषय थी जैसे कि किसी भी समझदार व्यक्ति के लिये है। उसकी नास्तिकता का अर्थ न तो आस्तिकों का मुखर विरोध था न उनकी आस्था की खिल्ली उडाना और न ही उन्हें अपना विरोधी साबित करना। पुनः, उनके व्यक्तिगत विश्वास उनके नितांत अपने थे। 

5. मूल पत्र या उसकी प्रति आप लोगों ने नहीं देखी है, आपके प्रचार का काम केवल इस आस्था/श्रद्धा पर टिका है कि ऐसा पत्र कभी कहीं था ज़रूर। मेरे प्रश्न के बाद अब आप लोगों के देखने का काम शुरू हुआ है तो शायद एक दिन हम लोग मूल पत्र तक पहुँच ही जायें। जब भी वह शुभ दिन आये कृपया मुझे भी ईमेल करने की कृपा करें। मुझे आशा है कि आयन्दा से यह तथाकथित नास्तिक अन्ध-आस्था के बन्धन से मुक्त होने का प्रयास करके साक्ष्य देखकर ही प्रचार कार्य में लगेंगे। अगर ऐसा हो तो हिन्दी ब्लॉगिंग की विश्वसनीयता ही बढेगी। 


6. @ हमारी भी इस मामले में आप से बहस करने में कोई रुचि नहीं है। हम यह बहस करने गए भी नहीं थे। आप ही यहाँ पहुँचे हुए थे।
आप बडे हैं, विद्वान हैं, शायद राजनीतिज्ञ भी हैं। आपकी आज्ञा सिर माथे। अगर आपको दुख हुआ तो अब नहीं आयेंगे। जो कहना होगा अपने ब्लॉग पर कह लेंगे।

शुभकामनायें!

(यहाँ स्मार्ट जी चौथे बिंदु को भूल गए से लगते हैं या भूलवश तीन के बाद पाँच हो गया है।)
@स्मार्ट इंडियन
आप का यहाँ सदैव स्वागत है। 
यदि विरोधी विचार न टकराएँ तो संवाद का कोई अर्थ नहीं। पर यह कह कर निकल लेना कहाँ तक उचित है कि मुझे लंबी बहस में रुचि नहीं? 
इतनी देर तक टिके रहने के बाद कोई अरुचि प्रकट करे तो उसे क्या कहा जाए?
पर मेरा प्रश्न तो अनुत्तरित ही रह गया। उस का उत्तर तो दे दें।
यदि यह मान लिया जाए कि नर्क और स्वर्ग हैं, तो क्या नास्तिक होने से भगतसिंह नर्क में होंगे?
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 9:56 AM

आदरणीय स्मार्ट जी,

'कुछ लोग तो इतने से जोर ईश्वर का खूँटा गाड़ देते हैं कि बेचारा ईश्वर होता तो एक ही बार में चिपटा हो जाता। '

खैर हम तो अपने को गलत ही समझ रहे हैं(कम से कम आप लोगों की बयानबाजी के बाद से) लेकिन आप सही होते हुए बार-बार वही कर रहे हैं जैसे 'हम इस खुशी में पिएंगे शराब छूट गई'।
आपने स्टालिन। माओ का उदाहरण मेरे लिए दिया था वह भी नास्तिकता के सवाल पर। क्या आप खुद बार-बार इस डाल से उस डाल पर नहीं जा रहे।
nationalarchives.nic.in/writereaddata/html_en_files/pdf/Microfilms_Web.pdf

http://www.nehrumemorial.com/catalog.php

http://59.180.241.203/NMML/NMMLSearch/ClassificationSearch.aspx


आप यहाँ भी जा सकते हैं। कम से कम भारतीय अभिलेखागार वाली किताब से पृष्ठ 16 पर ऐसी बात जरूर पढ़ेंगे जिससे कुछ मिल पाएगा। कुछ ज्यादा नहीं।

आप बार-बार मेरे सवालों का जवाब नहीं देते और अपनी बात कह देना चाहते हैं।

मैंने अमर कुमार जी से कहा कि सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण वाक्य क्या था? 

हम सब ही कौन सा बरछी-भाला या लाठी-डंडा या मिसाइलें लेकर पहुँच गए थे मार-पीट करने के लिए।

'जहां सभी लोग एक तरह से सोचते हों, वहां समझना चाहिए कि दरअसल कोई भी सोचने का कष्ट नहीं करता । - वाल्टर लिपमैन'

सीमोन द बोउवार, कार्ल मार्क्स. जॉन स्टुअर्ट मिल, नागार्जुन, फ्रेडरिख नीत्शे, बर्ट्रेंड रसेल, ज्याँ पाल सार्त्र, जावेद अख्तर, चार्ली चैपलीन, जेम्स रैंडी, सावरकर, बाबा आम्टे, तसलीमा नसरीन, एच जी वेल्स, माओत्से तुंग, सुभाषिणी अली, करुणानिधि, जवाहर लाल नेहरु, पेरियार, प्रकाश करात, लेनिन, स्टालिन, ट्राटस्की, गोर्बाचोव, लक्ष्मी सहगल आदि लोग आस्तिक नहीं हैं। भले इनमें से कुछ विवादास्पद हैं। लेकिन आस्तिकों की संख्या कम नहीं ज्यादा ही है।

लेकिन बार-बार नास्तिकों को नीचा दिखाने में कुछ बोल जाते हैं। इसलिए नास्तिक और आस्तिक की बात को ध्यान देकर लिखा गया है। 

आप हों या मैं हम रोज नई नई पोस्ट बना सकते हैं और लिख सकते हैं। मुल्ला नसरुद्दीन वाली कहानी जिसमें कपड़े के बारे में अपने मित्र के साथ घूमने निकलता है, जैसी हालत में क्यों आ जाते हैं आप बार-बार। कहते हैं कि नास्तिक से मतलब नहीं लेकिन उद्देश्य बार-बार वही नजर आ जाता है। लेकिन अगर आप सच में इस ब्लाग पर नहीं आना चाहते तो यह आपकी इच्छा है। वैसे तीखी बहस के बाद मित्रता और अच्छी हो सकती है।

आपने फिर बिन्दुवार जवाब दिया है। लेकिन मैंने भी जवाब दिया तो आप देख चुके हैं मेरे पास आपके जवाबों की किताब ही एक-दो दिन में बन जाएगी। 

संजय जी,

आपको नास्तिक आचार्यों से कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं है क्योंकि भगतसिंह हमारे ब्रांड नेता नहीं और हमने पार्टी नहीं बनाई है कि अपना अधिकार उनपर इस तरह दिखाएँ कि आपको श्रद्धा भी पूछकर करनी पड़े। और किसी के कहने से श्रद्धा उत्पन्न की जा सकती है, यह सौ प्रतिशत सफ़ेद झूठ है। 

आप अगर मेरे नास्तिक शब्द का अर्थ जानना चाहें तो पूरी बहस में मेरे शुरु के टिप्पणियों को पढ़ें।

कोई यहाँ लड़ने नहीं आए हैं।

वैसे भी इस तरह का सर्वाधिकार मठाधीशों आदि के पास होता है हमारे पास तो अपना मठ भी नहीं है।

(यहाँ से कुछ अंश मैं हटा रहा हूँ क्योंकि यहाँ इनकी कोई जरूरत नहीं है।)


…लेकिन मैं इतनी बात तो फिर कहूंगा कि मेरे किसी सवाल का कोई जवाब दिया नहीं गया है। बस घसीटने की कोशिश हो रही है।

... आज भी उस पत्र के लिए नेहरु मेमोरीयल को मेल भेज रहा हूँ।

लेकिन अब भगतसिंह की एक एक चिट्ठी की खोजबीन शुरु करें तो सिर्फ़ अविश्वास ही दिखता है जो आस्तिकों में इस कदर तो नहीं होना चाहिए।

आप किसी को कहें सिगरेट पीना अच्छी बात नहीं और बार-बार कहें। और यह भी कहें मैं उस आदमी के सिगरेट पीने से कोई मतलब नहीं रखता, यह कैसे सम्भव है। अभी आपके हर वाक्य पर जवाब देने की इच्छा है भी और नहीं भी। लेकिन जाने दें।
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 10:08 AM

पहली बात मेरे ही लिखे से है।
भगतसिंह के आस्तिक होने के आधार पर या नास्तिक होने के आधार पर हमने कोई निष्कर्ष नहीं निकाले हैं। 

लेकिन आपके इस वाक्य ने फिर ठेस पहुँचाया कि हम भगतसिंह के व्यक्तित्व को छाँटकर लाल साफा पहना रहे हैं। यह बात इतनी गंदी है कि आप खुद समझिए कि आप कैसा सोचते हैं। अब मुझे इसका कोई दुख भी नहीं है कि कुछ कड़े शब्द निकलें। इसका मतलब क्या है जनाब! आप कुछ भी लिखें तो भजन हो जाता है क्या? सारा संसार अपने उपर लादने की कोशिश मत करिए। अब मैं पूरे मूड में हूँ। अजीब सोचते हैं और बहाना बना रहे हैं या बना लेंगे कि ऐसे देखते हैं, वैसे देखते हैं।

सारे अविवाहितों के बारे में आप चाहे जो सोचें लेकिन सूरदास के बाद सभी अन्धे लोगों को सम्मान से सूरदास ही कहा जाता है। 

अब आपको जवाब तो देने का मन अच्छा से कर रहा है लेकिन द्विवेदी जी का ब्लाग है, वे आज्ञा दें तब। मैं एक भी वाक्य छोड़नेवाला नहीं। ये पहली कक्षा नहीं है कि आप जो चाहें कहते रहें, बच्चा परम सत्य समझकर सीखता रहे।

इतना ध्यान रखिए। आपके हर बिन्दु को सागर बना देन कहीं से बुरा नहीं है। क्योंकि आप बार बार घूम कर आते हैं नास्तिक को बुरा साबित कर देन पर लेकिन कोई फायदा नहीं क्योंकि आपले सारे सवालों के जवाब हम देते गए हैं और आपने मेरे एक भी सवाल का जवाब दिया नहीं है अभी तक ठीक से।
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 10:22 AM

मुझे अपनी टिप्पणी को बोल्ड करने नहीं आता और करने से मिलेगा क्या? वही लोग किताबों में रेखांकित करतते हैं जिन्हें कुछ काम का और कुछ बेकार लगे। बोल्ड करना कुछ वैसा ही है। हमें हमारी बात इस तरह की नहीं लगती रेखांकित किया जाए। अब हम का अर्थ भी नया नया नहीं निकालिएगा क्योंकि मैं बिहार का हूँ और मैं की जगह हम ज्यादा चलता है। भोजपुरी भाषी भी हूँ जिसमें एकवचन भी हम ही होता है।

इन्तजार है बस आज्ञा का। लेकिन फायदा भी तो नहीं है क्योंकि आपके जैसे दस आदमी फिर कल मिलेंगे । वही कहेंगे। आस्तिक और नास्तिक की समझ आपको अभी तक नहीं हुई जैसा कि तीन दिन पहले आपको कह चुका हूँ। 

हर बार आपकी जयकार करें, हम कोई ठेके के आदमी नहीं हैं। पत्र का बहाना लेकर आपने नास्तिकों पर अपने बयान देने शुरु कर दिए हैं। 
आपके पाँचवीं बिन्दु को क्या कहें? आप चाहे सैकड़ों टिप्पणी करें, कहीं अलग कुछ दिखता नहीं। बार-बार आपको कुछ भी कहा जाय लेकिन आप वस्तुनिष्ठ नहीं व्यक्तिनिष्ठ तरीके से ही देखते आ रहे हैं। बिन्दु संख्या पाँच पर तो एक एक शब्द का जवाब देने का मन है। 

आपके सवाल उठाने पर हम तो पत्र के पीछे पड़ गए लेकिन आप हमारे सवाल उठाने पर किसी भी चीज के पीछे नहीं पड़िएगा, यह तय ही लग रहा है। तीसरे बिन्दु के जवाब के पहले लाला लाजपत राय के लिए भगतसिंह ने लड़ाई लड़ी। इसका अध्ययन जरूर कर लें कि लालाजी और भगतसिंह क्या और कैसे विचार रखते थे। अब इतना आलसी मत बनिएगा कि बार बार हमीं आपको सब कुछ खोजकर भेजते रहें। अन्तिम बात ध्यान रखिए।

(तभी आते हैं हमारे आज के केंद्रीय पात्र ग्लोबल अग्रवाल यानि गौरव अग्रवाल। अब देखिए वे क्या कहते हैं?)
Global Agrawal,  27 June 2011 11:58 AM

सच बोलूं इस चर्चा को पढ़ नहीं पाया हूँ फिर भी ये लेख आपको पेश करना चाहूँगा

http://my2010ideas.blogspot.com/2010/12/blog-post_15.html 

अगर इससे किसी प्रकार विषयांतर होता है तो क्षमा चाहता हूँ ...
Global Agrawal,  27 June 2011 12:31 PM

हम कल भी आदरणीय अमर कुमार जी की टिप्पणियों के कायल थे.... हैं .....आगे भी रहेंगे , उनकी टिप्पणियाँ पढ़ कर जा रहा हूँ , बाकी चर्चा समय मिलने पर पढूंगा :)
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 1:42 PM

ग्लोबल अग्रवाल यानि गौरव अग्रवाल,

आप यहाँ आए। आते ही अपना अच्छा-सा संदेश हमें सुनाया। इसके लिए धन्यवाद दूँ?

इसे कहते हैं आदमी के पेट से पीपल का पेड़ पैदा होना। क्यो?

प्रोफ़ेसर चमनलाल की बात http://hindi.webdunia.com/news/news/national/0803/23/1080323063_1.htm पर एक जगह तो पूरी तरह स्वीकार है क्योंकि यह आपके या आपके मित्रों के विचारों के अनुकूल है लेकिन उसी चमनलाल जी की अन्य कोई बातें आपको नहीं माननी।
अप यह न समझिएगा कि मैं इतनी आसानी से भाग जाऊंगा। वैसे भागूंगा ही नहीं आसानी और मुश्किल का सवाल बाद में।

पहले तो तो यह बताइए कि आप कहते हैं आपने पूरी चर्चा पढ़ी भी नहीं और लिंक दे गए। माफ़ी के साथ दी या नहीं, इसे मैं ध्यान देने लायक नहीं मानता। आपने शुरुआत ही की इस गलती से कि आपने बिना पढ़े हमें अपना लिंक दिया। अगर आप पूरी चर्चा को पढ़ें और मेरे लिखे को समझें तो आप समझ जाएंगे कि भगतसिंह को मैं क्या मानता हूँ और क्यों उन्हें नास्तिक बताने पर सहमति जता रहा हूँ। मैं कोई चापलूस नहीं कि किसी भी बात तब तक प्रसन्नता जताऊँ जब तक फायदा या वाहवाही मिलती रहे।

नास्तिक लोगों पर क्या-क्या किसने कहा ह, सब देख लिया। आप लोगों ने विदूषक और जोकर किसे कहा है और क्यों कहा है, यह भी मैं समझ सकता हूँ। क्योंकि किसी के नहीं रहने पर उसके बारे में टिप्पणी करने में दोनों जगह कमी नहीं देखी मैंने। आपसे निजी तौर पर कहना चाहता हूँ कि आपकी हर बात का मेरे पास जवाब है और विस्तार से दे भी सकता हूँ। आपने पुनर्जन्म वाले आलेख पर भी अपना बयान दर्ज करा दिया है। कराते रहिए।

मेरे कहे में कुछ व्यक्तिगत टिप्पणियाँ होंगी, यह तय है क्योंकि किताब और लेखक दो वस्तु नहीं हैं।

आपके आलेख में या कहीं भी हमेशा इतना दिख ही जाता है कि बेचारे आस्तिक लोग(जिन्हें आप आस्तिक कहते हैं और समाज आस्तिक कहता है) पता नहीं किस डर से नास्तिक लोगों पर अपनी बयानबाजी ज्यादा करते हैं। यहाँ अनुरोध है कि आप मेरी सभी टिप्पणियों को पढ़ें।

आपके सभी शुभचिन्तकों और आपसे भी यह कहना है कि जिन चार-पांच बिन्दुओं को आपने परोसा है उनमें कोई जान नहीं है। 

अब लीजिए विस्तार से सुन लीजिए जवाब:

1) 'शहीद भगत सिंह का परिवार उन्हें नास्तिक नहीं मानता। ....'

पहली बात उनके परिवार के लोगों में मेरी दिलचस्पी नहीं है क्योंकि वे सब भगतसिंह नहीं हैं।
भगतसिंह की भतीजी वीरेन्द्र संधू जिन्होंने भगतसिंह के मृत्युंजय पुरखे नाम की किताब लिखी है और शायद लंदन में रहती हैं(अगर यह सही है कि वे लंदन में स्थाई तौर पर रहती हैं, तो उनके लिए मेरे मन में कोई सम्मान नहीं है, वजह आप खुद सोचें या न समझ आए तो बाद में), उनके भाई कुलतार सिंह जो उनकी शहादत के समय 12 साल के थे और चमनलाल की किताब का प्राक्कथन लिखा है उन्होंने कोई ऐतराज नहीं किया और आप और आपके मित्र इस पर सवाल खड़ा कर देते हैं, रणधीर सिंह जिन्होंने भगतसिंह से मिलने से एक बार इनकार किया था जिसके बाद भगतसिंह ने वह आलेख लिखा, इन सबोंने और सम्भवत: मन्मथनाथ गुप्त ने, शिव वर्मा ने, भूपेंद्र हूजा ने (इन सबका परिचय यहाँ देना सम्भव नहीं है), इनमें से किसी ने ऐसा नहीं कहा कि भगतसिंह 1928 के बाद आस्तिक थे या किसी काल्पनिक ईश्वरीय सत्ता में उनका विश्वास था। आप बहुत ज्यादा सबूत पर विश्वास रखते हैं तो इतना कह देना चाहता हूँ कि आपनए किसी भी धर्मग्रन्थ का कोई सबूत नहीं देखा होगा। वहाँ तो यह भी स्पष्ट नहीं है गीता की रचना किसने की? 

इसलिए अपना चश्मा उतारकर सच देखने की कोशिश करें और चमनलाल के एक शोध को मानने और दूसरे शोध को न मानने का महान कार्य अंजाम न दें।

आप ज्यादा जिज्ञासु हैं और शोध के इच्छुक हैं तो मैं आपके साथ हूँ। क्योंकि शोध में मुझे मजा भी आता है। आपमें से यानि आपमें या आपके किसी मित्र में चमनलाल को गलत साबित करने की क्षमता हो तो अदालत का दरवाजा खुला है। अखबात पढ़कर शोध नहीं किया जाता। और हाँ विष्णु प्रभाकर को भी देख लें(वे गाँधीवादी होते हुए भी नास्तिक थे और राममनोहर लोहिया भी वैसे ही थे, कुछ कुछ जयप्रकाश नारायण भी वैसे ही थे, चन्द्रशेखर आजाद भी कुछ कुछ वैसे ही रहे होंगे जैसा कि संगठन के नाम से लगता है।)

इसलिए चमनलाल का इस्तेमाल नहीं करें। मैं भगतसिंह या किसी की खोजबीन में पीछे नहीं हटनेवाला।
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 2:20 PM

उम्मीद करता हूँ आपके पहले बिन्दु का जवाब मैंने दे दिया। अब दूसरे बिन्दु को उठाते हैं।

2) 'भगतसिंह द्वारा लाहौर सेंट्रल जेल में लिखी गई डायरी में उर्दू में लिखी कुछ पंक्तियों से भी इस बात का अहसास होता है | डायरी के पेज नंबर 124 पर भगतसिंह ने लिखा है- दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे, जो गम की घड़ी को भी खुशी से गुलजार कर दे। इसी पेज पर उन्होंने यह भी लिखा है- छेड़ ना फरिश्ते तू जिक्र-ए-गम, क्यों याद दिलाते हो भूला हुआ अफसाना।'
ओह क्या सोचते हैं और लिख देते हैं? यह बात चमनलाल ने छुपाई है क्या? उनकी किताब के 2009 संस्करण में चमनलाल स्पष्ट लिखते हैं कि शेर किसके हैं यह पता नहीं चल है। पृष्ठ 379 पर देखें। भगतसिंह की जेल डायरी के 124वें नहीं 24वें (वास्तव में पृष्ट 27) पर है यह अंश।

चमनलाल ने इसे तोड़-मरोड़कर तो लिखा नहीं है। जब वे इसे देने से नहीं डरते तो आस्तिकों को डर हो जाता है, अजीब बात है!

अब देखिए घटिया शोध की बात। जिन महानुभाव ने यह शोध किया है उनसे पूछिए कि भगतसिंह की डायरी में सिर्फ़ यही छ: पंक्तियाँ हैं या और कुछ है। आप जान लें उनकी डायरी में 90 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ़ अनीश्वरवादी दार्शनिकों, लेखकों का है और बहुत कुछ पूँजीवाद के विरुद्ध है। इतना ही नहीं साम्यवाद के पक्ष में भी बहुत कुछ है और इतना है कि किसी एक पन्ने के फुटनोट जितना भी आपके द्वारा बताए शोध का छ: वाक्य नहीं है। इसलिए सनसनी फैलाकर पचासों साल से चल रही विचारधारा पर अपना हाथ-पाँव मारने से पहले सोचना चाहिए कि आप आवारा मसीहा के लेखक नहीं हैं।

कुछ बात आपके मित्रों के लिए।

संयोगवश वहाँ भी स्मार्ट इंडियन साहब हैं। लेकिन मैं यह नहीं समझा कि अगर वे सचमुच निष्पक्षता वाले और जिज्ञासु आदमी हैं तो 2010 में 15 दिसम्बर को लिखे आपके आलेख के बाद 16+31+28+31+30+31+26= 193 दिनों तक कहाँ थे? भगतसिंह के लिखे पर उन्होंने पहले क्यों नहीं संदेह किया? आप खुद उन्हें और अपने को फँसा रहे हैं यह लिंक देकर। आखिर आपलोग कहाँ थे इतने दिन तक। नाम लेकर बोलता हूँ - हंसराज कहाँ थे? यह इसलिए पूछा गया कि आप सच यानि सत्य के अन्वेषी नहीं बल्कि हमारे जैसे नास्तिकता के पक्षधर लोगों से द्वेष भावना रखने वाले लोग हैं। बहाना बनाते हैं कि नास्तिक आस्तिक में क्या रखा है, भगतसिंह को मत बाँटो लेकिन आप सब क्या कर रहे हैं? आपका लेख क्या दिखाना चाहता है? यही तो कि आप सब भले, देशप्रेमी और अच्छे लोग हैं और नास्तिक बुरे हैं। कभी कभार कुछ अच्छी बातें तो कोई भी कर देता है, आपने भी की है टिप्पणियों में।

सिर्फ़ नास्तिकों को परेशान करने में और उन्हें जैसे मौका मिले गलत साबित करने में ही आपसब अपनी ऊर्जा खर्च कर जाते हैं।
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 2:21 PM

और एक बात सभी मित्रों तक पहुँचाइये कि विपत्ति में सही चरित्र का पता चलता है। तो आप सब जो शीलवान और सदाचारी होने का अभिनय करते फिर रहे हैं, मेरी कुछ टिप्पणियों से घबड़ा क्यों गए? क्यों अपशब्दों की बरसात करनी शुरु की? क्यों व्यक्तिगत आक्षेप को आगे बढ़ाया? धैर्य था तो बुद्ध की तरह गालियाँ भी सुन सकते थे। सच तो यह है कि आप सब नकाब पहन कर देश का, सदाचार का बस नास्तिकों के पीछे हाथ-धोकर पड़े हैं लेकिन याद रखिए नास्तिक खासकर भारतीय नास्तिक कभी भी इतना बेवकूफ़ नहीं होता जनाब। 

अनुपस्थिति में बीसियों विशेषण कह डालते हैं आप सब। जी हाँ आप क्योंकि बचकानी कहानियों पर आनन्द तो आपको भी आता है। आपको भी मैं तीनों पोस्ट पर देख रहा हूँ। मैं हट क्या गया सब बहादुर और ज्ञानी लोग वहाँ आ पहुँचे। 

स्मार्ट इंडियन की छ: महीने पहले की टिप्पणी यही है न!
"उनके लिये एक छोटे से जीवनकाल में नास्तिकता, गीतापाठ, देशभक्ति और शहादत सभी कर पाना सम्भव था। मगर याद रहे कि वे नास्तिक थे धर्मविरोधी नहीं। हंसी तो तब आती है जब धर्म-विरोधी विचारधारा (यथा कम्युनिस्ट, मार्क्सवादी, माओवादी, हिरण्यकश्यपवादी आदि) नास्तिकता का मुखौटा लगाकर घूमते हैं। 

भगत सिंह की बात समझने के लिये आस्तिक, नास्तिक और धर्मविरोधी का अंतर समझना ज़रूरी है।

एक बार फिर आभार!"

मैं कम्युनिस्ट नहीं लेकिन इतना दावा करता हूँ कि आपमें से कोई मार्क्स के सिद्धान्त तक कभी वैचारिक रुप से पहुँच ही नहीं पाया और शायद पाएंगे भी नहीं।

यहाँ बार बार आपसब मिलकर नास्तिक-नास्तिक-नास्तिक-नास्तिक और सिर्फ़ नास्तिक शब्द को पीस रहे हैं, चबा रहे हैं और घोल कर पी रहे हैं। जितनी फुरसत किसी नास्तिक को यह सोचने की नहीं है कि वह नास्तिक नहीं है उससे कई गुनी ऊर्जा और फुरसत आप जैसे लोगों को है। तो कीजिए यही दिनभर।

इस बिन्दु के लिए इतना तो बहुत है। लेकिन एक बार कह देता हूँ कि भगतसिंह की डायरी के आधे पन्ने को आधार बनाकर शोध कर डालनेवाले लोगों से कहिए कि बाकी के 145 पन्नों पर जिनपर भगतसिंह ने लिखे हैं(कुल पन्ने 404 थे जिनमें से अलग-अलग 145 पन्नों पर भगतसिंह ने लिखा है लेकिन 100 पन्ने कहाँ हैं, इसका पता नहीं चला है क्योंकि 305 से लेकर 404 तक डायरी में नहीं हैं) उसके एक प्रतिशत के आधे का आधे से भी कम सिर्फ़ छ: पँक्तियाँ ज्यादा महत्व की कैसे हो जाती हैं। उनमें न कोई विचार है न कोई तथ्य है यानि चिन्तन और अध्ययन से नोट की हुई हैं वे।

ऐसे अगर मैं आपके प्रोफ़ाइल को देखकर आपकी जीवनी लिख डालूँ तो कैसा होगा? समझिए, उन्मादी लोगों को समझाइए।
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 2:40 PM

अब तीसरे बिन्दु को लेते हैं।
अब देखिए जब भगतसिंह को फाँसी हुई तब उनके पौत्र की कल्पना तो हम कर ही नहीं सकते। उनकी बातों को कोई महत्व देना बेकार है। लेकिन देखने की बात तो यह है कि कुलतार सिंह को ऐतराज नहीं है वरना वे चमनलाल से कुछ कहते जरूर लेकिन यह बच्चा अब जवाब उनके बारे में उनसे ज्यादा जानता है। उस बच्चे यानि पौत्र में और हममें कोई फर्क नहीं है। क्योंकि हमने भी भगतसिंह की तस्वीरों से उनको देखा है और उनके पौत्र ने भी। और उनके परिवार के लोगों में कौन इतना महान था जितना भगतसिंह, ध्यान रहे बात भगतसिंह के बाद की कर रहा हूँ। 

भगतसिंह के पिता 1937 से 44 तक पंजाब में एम एल ए रहे(यह बात कुलतार सिंह कह रहे हैं)।

उनके यहाँ आर्यसमाज का महत्व ज्यादा रहा।

परिवारवाद को मैं ज्यादा महत्व नहीं देता। उदाहरण चाहिए तो देता हूँ। आप नहीं सोच सकते लाल बहादुर शास्त्री जैसे महान आदमी के पुत्र आज भी कांग्रेस की मुख्य पत्रिका में हैं और पार्टी से जुड़े हैं। या गाँधी जी के खानदान के बहुत से लोग विदेशों में रह रहे हैं और भारत के लिए गाँधी का सपना कुछ हद तक भी पूरा नहीं हुआ। इसलिए कहा कि परिवार के लोग हमेशा महान नहीं रहे। आप देख सकते हैं पूरे इतिहास में कि कितने महान लोगों के माँ-बाप-भाई-बहन-रिश्तेदार के नाम लोग जानते हैं। ऐसे उदाहरण एकदम शून्य जितने हैं।

एक और बात जान लीजिए कि मैं गाँधी के सिद्धान्तों को भगतसिंह से ज्यादा महत्व देता हूँ और वे आस्तिक हैं। मैंने नास्तिक होने के बाद जाना कि भगतसिंह नास्तिक थे।

इसलिए अपने लोगों से कहिए कि बेकार में अपना खून न जलाएँ। कम्युनिस्ट भारत में तो बिल्कुल नकली जैसे हैं। मार्क्सवादी चिन्तन की आप आलोचना करते करते दस टन कागज पर स्याही उड़ेल लीजिए लेकिन यह परम सत्य है कि कार्ल मार्क्स ने एक मौलिक और उच्च सिद्धान्त प्रस्तुत किया। यह संभव है कि वह भारत के लायक उसी रुप में नहीं हो लेकिन उसकी मौलिकता और सुन्दरता पर आप जैसे सोच सकते हैं, इसमें मुझे सन्देह है। मैं धार्मिक ग्रन्थों को आदर दे सकता हूँ लेकिन आस्तिक लोग नास्तिक दर्शन को नहीं दे सकते।
इसका सबूत जल्दी मिलेगा कि मैं पुराणों पर एक आलेख लिखने वाला हूँ जिससे पता चलेगा कि मेरे जैसा नास्तिक क्या सोचता है इन ग्रन्थों के बारे में।
Global Agrawal,  27 June 2011 2:56 PM

शायद आप यकीन ना करें ..... ऐसी चर्चा में ही मुझे भी आनंद आता है , लेकिन अभी जितना कह सकता था उतना ही कह कर जा रहा हूँ ....आपने लेख पर विचार व्यक्त करने के लिए जो समय निकाला उसके लिए आभारी हूँ आपका ..दिल से आभारी हूँ ...ये लिंक भी शायद इसलिए दिया हो ? है ना ?:)
Global Agrawal,  27 June 2011 2:57 PM

अपने मित्रों का झुण्ड बना कर चर्चाएँ की आदत अपनी भी नहीं है दोस्त , बस ये बात है की कभी कभी वक्त से मित्रता नहीं रहा पाती :)
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 2:58 PM

आपके धार्मिक वचन हैं- समत्वं योग: उच्यते। लेकिन मार्क्स ने बताया कि कैसे?
सर्वभूतहितेरता:, समानता चिल्लाते रहे धर्म और समता की बात बताई मार्क्स ने। यह अलग बात है कि उसे भारत में उस रुप में लागू नहीं किया जा सका। और वह कुछ असफल भी है। लेकिन इलेक्ट्रान के बारे में बताने वाले से पहले के वैज्ञानिक का महत्व इससे घट नहीं जाता।

अब 4)'उनके दादा भगतसिंह भगवान, किस्मत तथा कर्मों के फल के नाम पर लोगों के अकर्मण्य बन जाने के खिलाफ थे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह नास्तिक थे।
http://hindi.webdunia.com/news/news/national/0803/23/1080323063_1.htm'

मतलब कुछ भी कहो, कहते और तर्क-प्रमाण देते देते मर जाओ लेकिन वे आस्तिक ही थे। नहीं?
उनके दादा यह बात कितनी बेवकूफी वाली है।
बुद्ध के दादा हिन्दू थे, ईसाई यहूदी थे, मेरे पिता घोर आस्तिक हैं तो क्या मैं उनका सम्मान नहीं करता? दादा और पोते की बात कहते समय यह सोचने में कटौती क्यों कि उनके दादा भगतसिंह क्यों नहीं बन गए?

मेरा कहने का मतलब कहीं से यह नहीं है कि आस्तिक होना या नास्तिक होना देशभक्त के लिए अनिवार्य है। सबूत खुदीराम बोस जो भगतसिंह के जन्म के अगले साल 19 साल की उम्र में फाँसी चढ़े और भारत में उन्होंने जिस तरह के काम किए वही काम भगतसिंह ने भारत में और ऊधम सिंह ने इंग्लैंड में किया।

मैं बहुत से आस्तिक लोगों के विचारों को मानता हूँ, सम्मान देता हूँ लेकिन आपलोग खूँटा वहीं गाड़े रहेंगे कि नास्तिक पापी है। 

यह किसने कहा कि नास्तिक होना भगतसिंह के देशभक्ति का प्रमाण है? कैसी उलूल-जलूल बातें कह देत हैं आप सब बिना जाने समझे? 

भगतसिंह की पहली गिरफ़्तारी मई 1927 में हुई, जिसका संबन्ध 1926 के दशहरे के मेले में हुए बम विस्फ़ोट से था। आप सब भगतसिंह की जो फोटो देखते हैं जिनमें उनके केश हैं लेकिन खुले यानि पगड़ी नहीं है और बगल में डीएसपी गोपाल सिंह उनसे पूछताछ कर रहा है। इस समय उनकी उम्र 20 साल भी नहीं थी। और उस समय तो उन्होंने नास्तिक वाला आलेख भी नहीं लिखा था। कहने का अर्थ यह है कि नास्तिकता से देश का की ऐसा सम्बन्ध तो है ही नहीं लेकिन आप सब अपने को श्रेष्ठ साबित करने पे तुले हुए लोग हैं जिनके पास सिवाय गुस्सा और ऊटपटांग शोध के कुछ नहीं है।

आपसब बार-बार नारा लगाते हैं कि देश का संबन्ध नास्तिकता से नहीं है लेकिन यह लेख क्यों लिखा? यही बताने के लिए या कहिए भगतसिंह पर संदेह पैदा करने के लिए या अपने को महान सत्यान्वेषी बनाने के लिए।
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 3:32 PM

आप भूल कर भी ऐसा नहीं करें कि कहीं कुछ देखा और लिख डाला बड़ा सा लेख। खासकर तब जब वह देश और महान लोगों से जुड़ा है।

आखिर वजह क्या है कि आप सब भगतसिंह के उस बयान के खिलाफ़ उठ खड़े हुए हैं? हमने आपके गप्पों का प्रमाण इस तरह से नहीं मांगा। लेकिन इतना तय मान लीजिए कि शोध में हम भी किसी हद तक जाने को तैयार हैं। लिखने से पहले कुछ तो सोच ही लेते।

मुझे लगता है कि बहुत से लोग मेरी इस टिप्पणी में फिर आक्षेप निकालेंगे, उनको मैंने पहले ही जवाब दे दिया है। मैं बुद्ध नहीं हूँ। 

आपने शीर्षक रखा है
'भगत सिंह नास्तिक थे या आस्तिक ? चर्चा और आज का युवा'
आपका अगर यही मानना है कि सारे नास्तिक मूर्ख होते हैं तब क्या जरूरत है नास्तिकों पर समय और मेहनत खर्च करने की।

अगर किसी का नास्तिक होना इतना खटकता है तो जाइए भारत में इसके खिलाफ़ कानून बनवा लीजिए, मुकद्दमा हम जीतेंगे, दावा है।

अब कहिए चारों बिन्दुओं का जवाब मिल गया या नहीं? और कुछ सवाल हैं तो अब इस तरह मुझे लगने लगा है कि आप लोगों के किताब लिखनी पड़ेगी या अपने ब्लाग पर एक अलग सवाल खंड बनाना पड़ेगा ताकि आप आएँ, अपने सवाल पूछें और मैं जवाब दूँ।

अभी इतना काफ़ी है। काम नहीं चल पाए तो मैं भागने वाला नहीं हूँ कम से कम इस बार तो जरूर। दो ब्लागों पर सीधे लिखा कि अब टिप्पणी नहीं करूंगा लेकिन वे दोनों ब्लाग मेरे खिलाफ़ नोटिस जारी करें तो मैं हट गया। और कोई कुछ भी कह ले मेरा अपना ब्लाग तो है ही इनसब कामों के लिए।

मुझे भी लगता है कि इस टिप्पणी में मैंने विषय से हटकर जमकर व्यक्तिगत बातें की। आखिर मैं कब तक झेलता। आप लोगों के भगवान शिशुपाल की 100 गाली तक जा सकते हैं तो मैं भी 200 तक पहुँच गया हूँ। 

मन हल्का करना हो तो http://hindibhojpuri.blogspot.com/2011/06/blog-post_17.html पढ़ लें।

अब आगे आप कहिए, क्या हाल है?
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 3:33 PM

अब एक बात राहुल सांकृत्यायन की और भगतसिंह के गीता मांगने की।
पहली बात आस्तिक उधार के ज्ञान पर ज्यादा चलता है।(कुछ अपवाद सम्भव हैं)नास्तिक स्वयं हासिल करता है। कौन बड़ा वैज्ञानिक है, स्वयं तय कर लें। भगतसिंह ने गीता क्या मांग ली, आप तो उन्हें महा आस्तिक साबित कर लेंगे इतने भर से?
अब मैं छठ में घर जाता हूँ तो घाट पर सूप या अर्घ्य देने वाले पात्र को लेकर जाता हूँ, तो क्या इससे मैंने छ्ठी मैया जैसे काल्पनिक शक्ति को स्वीकार कर लिया? घर पर घर के सदस्यों की सहायता करना जब वे नास्तिक नहीं हैं, ये भी आपकी समझ में आस्तिकता है ही? आप तो मेरे एक साल में सिर्फ़ दो समय कुछ सौ मीटर घाट पर जाने को लेकर आस्तिक साबिर कर लेंगे, क्यों? मूर्खतापूर्ण कु-शोध से बचिए।

आप जानते हों तो ठीक नहीं तो बता दूँ कि रामप्रसाद बिस्मिल और खुदीराम बोस(सम्भवत:)गीता लेकर फाँसी चढ़े। हो सकता है कि गीता के जोर शोर को देखकर भगतसिंह ने गीता मांगी हो। मैं स्वयं अपने कम्प्यूटर में बहुत सारे धर्मग्रन्थों को रखे हुए हूँ लेकिन पढ़ने के लिए।

अब एक ऐसे शख्स के बारे में जिसे आप जानते ही होंगे।

नाम राहुल सांकृत्यायन, किताबें लिखीं 110 से ज्यादा, 24 या 36 भाषाओं के विद्वान माने जाते हैं और जानकारी यानी बोलने-लिखने-पढ़ने भर 100 से अधिक भाषाओं की, वस्त्र-लगभग धोती-कुर्ता, काम- भारत के सबसे विद्वान लेखकों में से अन्यतम।

सबसे पहले युवा हिन्दू संन्यासी थे। बाद में आर्य समाजी, फिर बौद्ध और अन्त में पुनर्जन्म को नहीं मानने से मार्क्सवादी। कम्युनिस्ट लेकिन भाषा के इतने आग्रही कि हिन्दी को लेकर पार्टी से अलग हो गए। हिन्दी में 80-90 से अधिक किताबें। दर्शन-इतिहास-धर्म-नाटक-कहानी-विज्ञान-समाजशास्त्र आदि पर शानदार रचनाएँ। 

धर्मग्रन्थों और धर्म पर भी कई किताबें। उदाहर्ण के लिए अभी इसी वक्त मेरे पास है इस्लाम धर्म पर उनकी किताब।

तो क्या वे धर्मों पर किताब लिखने और पढ़ने से आस्तिक हो गए? संयोगवश मेरे जिले से उनका अत्यन्त निकट और अपरिहार्य संबन्ध।

उनकी जीवनी पढ़ें। अब देखिए शोध किसे कहते हैं। पटना संग्रहालय में एक विशेष भाग है जिसे उनके नाम पर राहुल सांकृत्यायन दीर्घा कहते हैं। खच्चरों पर लाद कर छ: सौ से ज्यादा पांडुलिपियाँ आदि तिब्बत आदि जगहों से लाए। वैसे वैसे ग्रन्थों की प्रति जो भारत में नष्ट हो चुके थे लेकिन कहीं बचे हुए थे उसे भी खोजकर लाए।
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 3:55 PM

और हाँ, यह तो हमेशा याद रखिए कि हमें नास्तिक होने के लिए भगतसिंह की जरूरत भी नहीं है क्योंकि भगतसिंह के जन्म के पहले भी हजारों नास्तिक रहे हैं।

मैंने उपर कहा है कि नास्तिक होने के बावजूद भगतसिंह का उदाहरण हम क्यों देते हैं? यह पढ़े और समझे बिना अपने सवाल मत किया करें। लिखने में भी समय लगता है। आप खुद समझ रहे होंगे कि इतने लम्बे जवाब में समय कितना लगता है। वैसे आप सबों ने धर्मशाला समझ रखा है या कम्प्यूटर का सर्च इंजन? इतनी बातों का जवाब किसी को ऐसे नहीं देता, लेकिन नहीं देना पसन्द नहीं था इसलिए दिया। 

गीता क्या मांग दी, मानो पहाड़ टूट गया। यानि इस हिसाब से कामसूत्र पढ़नेवाली हर स्त्री वेश्या या सिर्फ़ कामाचारिणी हो गई? देखिए बन्धु तर्क और शोध समोसे नहीं हैं जो दुकान पर गए, जेब से पैसे निकाले और खा कर चल दिए। शोध अगर किया भी तो इतनी जल्दी तो नहीं कर डालना चाहिए कि एक आलेख(नवभारत टाइम्स या कोई अखबार कुछ लिखे और शुरु हो गए!)देखा और भगतसिंह पर 70 टिप्पणियों वाला विद्वत्तापूर्ण आलेख छाप दिया। 

हम कोई नास्तिकता की पार्टी नहीं खड़ी कर दें तो आप सब पता नहीं किस किस रुप में हमले कर डालेंगे? अभी तो सिर्फ़ विचार व्यक्त किया और आपके विचार सुने भी, तो इतनी परेशानी में हैं।

एक कहानी सुनिए और अपना नजरिया बदलिए। हम आपको आस्तिक से नास्तिक नहीं बना रहे हैं। अब आपके सभी बिन्दुओं पर विस्तार चर्चा कर ली है।

कहानी सुनिए।

एक आदमी सड़क से गुजर रहा था। रास्ते के बगल में उसने देखा बहुत से लोग एक घर बनाने के लिए पत्थर तोड़ रहे थे। वह वहाँ गया और पहले मजदूर से पूछा-' क्या हो रहा है?' मजदूर ने जवाब दिया- 'देख नहीं रह हो? पत्थर तोड़ रहा हूँ।'

आगे बढ़कर दूसरे मजदूर से वही सवाल। इस बार जवाब मिला-'रोजी-रोटी के लिए काम कर रहे हैं'

फिर आगे जाकर तीसरे मजदूर से वही सवाल और जवाब मिल-'घर बना रहे हैं।'

बस समझिए कहानी और मेरी टिप्पणियों पर सवाल खड़ा करने से पहले मेरी सभी टिप्पणियों को पढ़ और समझ डालिए। तब जाकर कोई सवाल कीजिए। क्योंकि जवाब देना आसान नहीं है सवाल कर देना बहुत आसान है।

(इसी बीच अभिषेक ओझा नाम के एक पाठक आते हैं और अपनी टिप्पणी कर जाते हैं, उसे मैं यहाँ नहीं दे रहा हूँ।)
चंदन कुमार मिश्र,  27 June 2011 8:52 PM

जरा ध्यान दीजिए चमनलाल क्या लिखते हैं:
भगतसिंह के संबंध में उनके चिंतन के संबंध में पंजाब में शायद कुछ अन्य स्थानों पर भी काफी भ्रामक बातें फैलाई गईं। भगतसिंह के जीवन व कार्यकलापों पर बनी आठ फिल्मों द्वारा भी भगतसिंह की छवि काफी विकृत की गई। पंजाब में खालिस्तानी आन्दोलन के दिनों के बाद भी कुछ धार्मिक अंधविश्वासियों द्वारा भगतसिंह को शहादत के निचले स्तर का शहीद बता कर या अपने नास्तिक विश्वासों को छोड़कर धर्म में पुन: आस्थावान होने संबंधी बातें बहुत ओछे स्तर पर कही गई हैं।(20 मार्च 2003) 

यहाँ एक बात याद आई कि लेनिन की जीवनी अपनी फाँसी के दिन पढ़ना मार्क्स या नास्तिकता की तरफ़ झुकाव नहीं है? 

उनके विचारों को तोड़ने-मरोड़ने का सबसे अच्छा का इस पोस्ट पर श्याम गुप्त द्वारा की गई है।

एक बात ध्यान दीजिए कि 1908 में खुदीराम बोस की फाँसी के पहले की तस्वीर है लेकिन भगतसिंह की बम फेंकने बाद 1929 से 1931 तक कोई तस्वीर क्यों नहीं है? या तो तस्वीर ली नहीं गई या नष्ट कर दी गई। उनके जेल में चार किताबों के लिखने की बात भी आती है, शायद उन्हें भी इधर-उधर कर दिया।

और मैंने एक जगह लिख दिया है कि अंधविश्वास कुछ नहीं होता। विश्वास होता ही अंधा है तो ये अंधविश्वास क्या चीज है? इसलिए भगतसिंह पर विश्वास करनेवाले को अंध-श्रद्धा करनेवाला कोई न कहे। क्योंकि मानव के व्यवहार में या भगतसिंह के व्यवहार में कोई चमत्कार नहीं है।

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गौरव ने जो लिंक भेजा था उसमें आँकँड़ों को बिगाड़कर अपनी मर्जी से निष्कर्ष निकाला गया है कि भगतसिंह नास्तिक नहीं थे। 

फिर भी सभी बहस करनेवाले लोगों का धन्यवाद जिनकी वजह से भगतसिंह और अन्य विषयों पर इतना सोचने और कहने का अवसर प्राप्त हुआ।

5 टिप्‍पणियां:

  1. चर्चा को आगे बढाने के लिए धन्यवाद मित्र
    अभी परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनी हुयी हैं मेरी और से कुछ भी कहना काम बिगाड़ेगा ही .खैर ...... मैंने इन सभी चर्चाओं को इन्टर लिंक कर दिया है (ये कोई नयी बात नहीं है की मैं विपरीत विचारों को अपने लेख से जोड़ रहा हूँ )
    उम्मीद है यहाँ मुझे इस टिपण्णी के जवाब में कईं सारी टिप्पणियाँ देखने को नहीं मिलेंगी ..शुभकामनाएँ

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  2. तथ्य दे कर आपने अपना पक्ष दृढ़ किया है.

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  3. जितना अच्‍छा आपका ब्‍लाग है उतना ही अच्‍छा शीर्षक

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  4. भगत सिंह नास्तिक ही थे । अपने लेख 'मैं नास्तिक क्यों हूं' में उन्होंने -बाकुनिन, मार्क्स, लेनिन और त्रात्सकी जैसे कई साम्यवादी और अराजकतावादी विचारकों से प्रभावित होने की बात का भी ज़िक्र किया है । जो सभी नास्तिक थे । उनका यह लेख काफी विस्तृत और प्रभावशाली है । पूरा लेख यहां पढ़े-
    मैं नास्तिक क्यों हूं ।

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  5. पोस्ट पढ़कर अच्छा लगा। खासकर चंदन के तेवर और जबाब! भगतसिंह हमारे समाज के सबसे बेहतरीन नायकों में हैं। उनके बारे में शोध किये जायें जानकारी जुटाई जाये लेकिन उनको हल्का साबित करने वाली बातें करना अच्छी बात नहीं है।

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