शनिवार, 25 जून 2011

ईश्वर है ?

(आज से लगभग डेढ़ साल पहले एक आलेख लिखा था, वही आपके सामने है। मेरे विचारों में थोड़ा अन्तर भी आया है और समय के साथ आते रहना चाहिए क्योंकि यही चेतन होने का प्रमाण है। जड़ चीजों में परिवर्तन नहीं होता।

      कुछ बातें अगर किसी को दु:ख पहुँचायें तो माफी चाहूंगा।)

दुनिया के प्रायः सभी धर्म ईश्वर को ही इस संसार का रचयिता मानते हैं। ईश्वर को सर्वशक्तिमान, अत्यंत दयालु और न जाने क्या क्या कहा जाता है। कोई भी पूरी तरह से सुखी नहीं है। गरीब के दुखों के बारे में पूछना तो बेकार ही है। अमीरों के दुखों की कहानी भी कम नहीं है। किसी को औलाद नहीं है, का दुख है। कोई बेरोजगार है, इसलिए दुखी है। जिसके पास नौकरी है, औलाद है, दौलत है सब कुछ है, उसे भय है चोरी का, औलाद के बुरे हो जाने का, नौकरी छिन जाने का और न जाने और कितने ही भय से वह आक्रांत है।
भूख से बिलबिलाते करोड़ों निर्दोष लोग, रोटीकपड़ामकान की किल्लत से जाती करोड़ो जानें, असंख्य असह्य दुख, दर्द, निराशा ये किसी विवेकशील दिमाग की शासन-व्यस्था नहीं हो सकती।
जो भी लोग धार्मिक हैं, ईश्वर-विश्वासी हैं उनमें 99 प्रतिशत से ज्यादा लोग धर्मग्रंथों तथा भावनाओं को भी नहीं समझते। ईश्वर जैसा कि लोग बताते हैं, जरूर होता पर अफसोस की बात यह है यह सिर्फ़ एक काल्पनिक सत्ता है।
जितने भी धर्मग्रंथ हैं, चाहे वे किसी भी धर्म के हों जैसे हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई आदि सबमें ईश्वर कहता है कि मेरी स्तुति करो, मेरी वंदना करो, प्रार्थना, पूजा-पाठ, जप-तप, ध्यान-योग करो। कोई भी अक्लमंद आदमी समझ सकता है कि अगर समाज में ऐसा कोई कहे तो हम उसे क्या कहते हैं। अपने मुँह से अपनी ही बड़ाई करने वाले को हम धिक्कारते हैं, उसका सम्मान नहीं करते। जब यह काम आदमी के करने पर हम उसकी निंदा करते हैं तो हमें ईश्वर के साथ क्या बर्ताव करना चाहिए?
सत्य का सिर्फ़ एक ही रूप हो सकता है। जैसे या तो धरती घूमती है या नहीं घूमती है। संसार के निर्माण की कथा भी एक ही होनी चाहिए। 18 पुराणों में संसार के निर्माण की अलग-अलग कथा है। शिव पुराण में शिव मूल है तो विष्णु पुराण में विष्णु ही सब का मूल है। देवीभागवत में देवी ही सब कुछ है। हिन्दू मरता है तो स्वर्ग, नरक जाता है। कोई मुक्ति पाता है। पर जब मुस्लिम मरता है तो कयामत के दिन तक इंतजार करता है। लेकिन सब आदमी एक जैसे हैं। मरने में कोई अंतर नहीं है। जन्म लेने में कोई अंतर नहीं है। तो मरने के बाद सभी की गति एक जैसी ही होनी चाहिए।  क्या किसी ने कभी किसी हिन्दू या मुसलमान के आग में जलने में कोई अंतर देखा है? क्या कभी प्रकृति ने कोई ने भेदभाव किया है, वह भी इस आधार पर कि यह हिन्दू है या वह मुस्लिम है? अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग सिद्धांत यह बताते हैं कोई सत्य नहीं है। विज्ञान अगर कहता है कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को एक निश्चित अनुपात में मिलाने से पानी बनता है तो यह दुनिया के हरेक कोने में हर आदमी के लिए सही है। यह हर जगह देखा जा सकता है। लेकिन धर्म की ऐसी कोई बात नहीं जो सार्वभौमिक हो। सिर्फ़ विज्ञान ही सत्य बताता है। न तो धर्म न ही ईश्वर। फिर भी अचरज की बात यह है कि आज तक जिसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिल सका, वह हर जगह छाया हुआ है। जाति धर्म की ही देन है। धर्म के नाम पर भारत में और विश्व में आदमी ने सिर्फ़ दंगा-फसाद किया है।
धर्म सत्य नहीं असत्य का पक्ष लेता है। वह तर्क से दूर भागता है। अगर कोई कहे कि मोबाइल का आविष्कार नहीं हुआ, वह हमेशा से है, तो आप क्या कहेंगे? कुछ ऐसा ही बात ईश्वर के साथ भी है। ईश्वर न था, न है और न कभी होगा। अमीरों, शोषकों ने ईश्वर का आविष्कार किया था, अपने फायदे के लिए।
 ईश्वर पर कभी हमारे युवा सोचने का कष्ट नहीं उठाते। क्या आपने कभी सोचा है कि आप ईश्वर की सत्ता को क्यों स्वीकारते हैं? सिर्फ़ इसलिए कि आपके माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी पूजा करते हैं, नमाज पढ़ते हैं? नहीं जरा सोचें कि ईश्वर को क्यों माना जाय
वेश्या-वृति, दहेज, जाति, संप्रदाय सब धर्म के कारण ही है। धर्म तो एक पेशा है जिससे भारत में सब कुछ पाया जा सकता है। भारत में धर्म की सहायता से सब कुछ लूटा जा सकता है  धन से इज्जत तक । चोर चोरी करता है तो दंड मिलता है, लेकिन लाइसेंस वाले चोर (साधु-महात्मा) कुछ भी करें तो सब कुछ माफ़। मैं यह नहीं कह रहा कि सारे संत-महात्मा गलत हैं , लेकिन 90 प्रतिशत से ज्यादा जहर से भी खतरनाक हैं- यह मेरी गारंटी है।
क्या आप बता सकते हैं कि आपके समाज में वेश्या कैसे पैदा हुई ? अगर आप सोचें तो धर्म ही इन सबके मूल में पाया जायेगा। आज तक लगभग सभी संत-महात्मा यही कहते आए हैं कि ईश्वर की पूजा करो, जप करो, लेकिन किसी ने मानव की सेवा करने की बात शायद ही जोर देकर कही हो।

5 टिप्‍पणियां:

  1. ईश्वर और धर्म के बारे में आपकी राय से सहमत हूँ. हमारी अधिकतर सामाजिक समस्याएँ इन्हीं के कारण हैं. व्यक्ति को धार्मिक बनने की उतनी आवश्यकता नहीं जितना मानवीय होने की है. विवेक आवश्यक है.

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  2. आज दुनिया में स्त्री की जो स्थित है । वह कहीं पर भी पुरूष के बराबरी का स्थान नहीं पा सकी है । इसका भी कारण धर्म के द्वारा बनायी गई पुरूष प्रधान व्यवस्था है । धर्म चाहे कोई भी हो स्त्री को वो दोयम दर्जा ही देते हैं ।

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  3. कुछ क्या मैं तो बहुत हद तक स्त्रियों को भी दोषी मानता हूँ। अगर आप कमजोर बनेंगे तो हारना तय है।

    हिन्दू धर्म में एक साथ स्त्री नरक का द्वार और देवी कैसे हो सकती है? सोचने की बात है? कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ हुई ही है। इसलिए हम ग्रन्थों को ज्यादा दोष नहीं दे सकते।

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  4. bahut badhiya.Mai aap sab k vicharon se sehmat hu.Lekin ye baaten dharmmon k kitaabo me hi namud ki gaayi hai.Jaati bhed,ling bhed aur sirf bhed hi nahi ,is bhed k naam par julm.Ye sab baatein inke "pavitra" grantho me likhi hai.Ye granth yadi koi dharmandh lekin aisa vyakti jisme insaniyat bachi hai,wo agar padh le,to dharm tyagne me bilkul deri nahi karega.

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  5. I came to your blog for the first time following the link posted by Nischal Hansi in Nirmukta's group. I very much agree to the points that you have raised in your blog. Religion and god is a tool designed to utilize the benefits from a mere concept. I got impressed by the very beginning of your post "Change should happen over time". I think this is most negative thing about religion or god. Everything change, technologies provided by science are being adopted by religion yet it is said, whatever written in our sacred texts are absolute truth.
    Please accept my gratitude!!

    Regards
    Fani Raj

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