(आज से लगभग डेढ़ साल पहले एक आलेख लिखा था, वही आपके सामने है। मेरे विचारों में थोड़ा अन्तर भी आया है और समय के साथ आते रहना चाहिए क्योंकि यही चेतन होने का प्रमाण है। जड़ चीजों में परिवर्तन नहीं होता।
कुछ बातें अगर किसी को दु:ख पहुँचायें तो माफी चाहूंगा।)
दुनिया के प्रायः सभी धर्म ईश्वर को ही इस संसार का रचयिता मानते हैं। ईश्वर को सर्वशक्तिमान, अत्यंत दयालु और न जाने क्या –क्या कहा जाता है। कोई भी पूरी तरह से सुखी नहीं है। गरीब के दुखों के बारे में पूछना तो बेकार ही है। अमीरों के दुखों की कहानी भी कम नहीं है। किसी को औलाद नहीं है, का दुख है। कोई बेरोजगार है, इसलिए दुखी है। जिसके पास नौकरी है, औलाद है, दौलत है सब कुछ है, उसे भय है चोरी का, औलाद के बुरे हो जाने का, नौकरी छिन जाने का और न जाने और कितने ही भय से वह आक्रांत है।