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बुधवार, 7 दिसंबर 2011

ग्यान और भाखा - राहुल सांकिर्ताएन


भाषा एक अत्यन्त महत्वपूर्ण मुद्दा है। इस चिट्ठे का नाम भी हिन्दीभोजपुरी है। तो जाहिर है कि भाषा सम्बन्धी लेख यहाँ अक्सर पढने को मिलेंगे ही। राहुल सांकृत्यायन की किताब ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’ या ‘भागो नहीं बदलो’ से एक अध्याय यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। इस किताब पर एक विस्तृत लेख इसी महीने पढने को मिलेगा। फिलहाल यह अध्यायजो किताब का सत्रहवाँ अध्याय हैयहाँ प्रस्तुत है। इस किताब की भाषा बड़ी लचकदार है। शुद्धतावाद के पक्षधरों के लिए यह भाषा एक चुनौती है। राहुल जी ने इस किताब की भूमिका में ही लिखा है कि यह किताब छपराबलिया इलाके की भाषा के असर के साथ हिन्दी में लिखी जा रही है। इस किताब में ‘’ के लिए ‘’, ‘’ के लिए ‘’, ‘ज्ञ’ के लिए ‘ग्य’ जैसे कई प्रयोग थे। हमारे इलाके में ऐसी ही भाषा बोली जाती है। किताब में कुछ पात्र हैं और पूरी किताब संवादात्मक शैली में लिखी गयी है। ‘भैया’ कोई गप्पी नहीं बल्कि एक प्रबुद्ध चिन्तक और विद्वान है। ‘संतोखी’ और ‘दुखराम’ सामान्य किसान हैं और ‘सोहनलाल’ एक पढ़ा-लिखा और शहर में रहनेवाला युवक है। किताब की भूमिका से लगता है कि ‘संतोखी’ और ‘दुखराम’ नाम के दो व्यक्ति थेऔर एक साधारण पढा-लिखा व्यक्ति जो मात्र  6-7 तक पढ़ पाया होवह भी समझ सकेराहुल जी के लिए इस किताब की भाषा को इस लायक मानने के आधार भी थे।
यहाँ ध्यान देने की बात है कि यह किताब 1945-46 के आस-पास की हैतो जाहिर हैकिताब पर उस समय का असर कई जगह दिखता है। बँगला और उर्दू को लेकर बंग्लादेश में चले लफड़े का पूर्वानुमान भी राहुल जी ने लगाया थाइसका अन्दाजा इस अध्याय के आखिरी वाक्य से लगता हैजो इंदिरा गाँधी के समय सच भी साबित हो गया।
एक महत्वपूर्ण बात यह भी है इस अध्याय को पूरी तरह टंकित भी मैंने नहीं किया है। इसे ओसीआर साफ्टवेयर की सहायता से यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।
राहुल जी ने इस किताब में अपना नाम ‘राहुल सांकिर्ताएन’ लिखा है। इसे अलग-अलग टुकड़ो में देना उचित नहीं लगाइसलिए पूरे अध्याय को एक ही बार में यहाँ रखा जा रहा है। थोड़ा अधिक समय लगेगा पढने में। इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

सोमवार, 28 नवंबर 2011

योद्धा महापंडित: राहुल सांकृत्यायन (भाग-3)


योद्धा संन्यासी का जीवन 


पहला भाग यहाँ पढ़ें     दूसरा भाग यहाँ पढ़ें

अपने सत्तर वर्ष के जीवन में वे निरंतर सक्रिय रहे और एक साथ कई मोर्चों पर! हर मोर्चे पर उनका एक खास मकसद दिखाई देता है। भारतीय इतिहास के अत्यंत महत्वपूर्ण कालखंड में उन्होंने अपना लेखन कार्य शुरू किया। भारत की स्वाधीनता का आंदोलन प्रथम विश्व युद्ध के बाद तेज हुआ और उसमें विभिन्न धाराओं का संघर्ष ज्यादा स्पष्ट दिखाई देने लगा। समाज सुधार की धारा बंगाल से विकसित हुई जिसका प्रभाव संपूर्ण देश के बुद्धिजीवियों पर पड़ा। राहुल ने अपना जीवन समाज सुधारक संन्यासी के रूप में शुरू किया; यह महज एक संयोग नहीं। वे प्रेमचंद की तरह आर्यसमाज के प्रभाव में आए और फिर कांग्रेस से भी प्रभावित हुए। लेकिन प्रेमचंद की ही तरह उनका इन धाराओं से मोहभंग भी हुआ। फिर उन्होंने पतनोन्मुख भाववाद के विरुद्ध बौद्ध दर्शन को एक वैचारिक-आधार के रूप में ग्रहण किया। भारतीय समाज की संरचना, जाति, वर्ण और वर्ग की विशिष्टता एवं शोषण के विभिन्न रूपों की जटिलता आदि तमाम सवालों से लगातार जूझते रहे। इनका समाधान उन्हें मार्क्सवादी दर्शन में दिखाई पड़ा। वैज्ञानिचेतना और समग्र विश्वदृष्टि के लिए अनवरत आत्मसंघर्ष उनकी प्रारंभिक रचनाओं में खुलकर व्यक्त हुआ है। ज्ञान की पिपासा और निरंतर कार्य करने की बेचैनी उनके व्यक्तित्व की विलक्षण विशेषताएँ हैं। उनका मानना था कि ज्ञान, विचार द्वारा वस्तु को जानने की एक चिरंतन तथा अंतहीन प्रक्रिया है और ज्ञानात्मक चेतना मनुष्य के सामाजिक अस्तित्व से निर्धारित और प्रभावित होती है।

सोमवार, 21 नवंबर 2011

योद्धा महापंडित: राहुल सांकृत्यायन (भाग-2)


योद्धा संन्यासी का जीवन

महापंडित राहुल सांकृत्यायन एक महान् रचनाकार, अन्वेषी इतिहासकार और जनयोद्धा थे। भारतीय नवजागरण की चेतना के इस महान् अग्रदूत ने हिन्दी भाषा और साहित्य को प्रगतिशील और प्रौढ़ वैचारिक मूल्यों से जोड़ते हुए एक नई रचना-संस्कृति विकसित की। व्यक्तित्व की तरह उनका रचना-संसार भी व्यापक और बहुआयामी है। सचमुच, आश्चर्य होता है कि किशोरवय में ही घर-बार छोड़कर संन्यासी बन गये राहुल व्यवस्थित शिक्षा-दीक्षा और समय एवं सुविधा सम्बन्धी कठिनाइयों के बावजूद इतने महान् रचनाकार और बुद्धिजीवी कैसे बने!
जिज्ञासा और संघर्ष की प्रखर चेतना ने साधारण परिवार में जन्में बालक केदारनाथ को राहुल सांकृत्यायन के रूप में विकसित किया। ग्यारह वर्ष की अवस्था से शुरु हुई उनकी ज्ञान-यात्रा स्मृति लोप होने तक जारी रही। बुद्ध के इस वचन को उन्होंने हमेशा अपने जीवन-संघर्ष का एक महत्वपूर्ण सूत्र माना –“मैंने ज्ञान को अपने सफर में नाव की तरह लिया है, सिर पर एक बोझ की तरह नहीं।

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

योद्धा महापंडित: राहुल सांकृत्यायन (भाग-1)


राहुल सांकृत्यायन भारत ही नहीं संसार के लेखन-जगत में एक अलग और महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। एक साथ बहुत से क्षेत्रों में असाधारण विद्वत्ता के स्वामी लेखकों और चिंतकों में उनका नाम पहली पँक्ति के लेखकों-चिंतकों में भी शायद सबसे पहले ही लिया जा सकता है। रामकृष्ण परमहंस को सब धर्मों की उपासना के लिए जाना जाता है लेकिन एक चेतन यात्रा का जो दर्शन राहुल जी में होता है, वह परमहंस में नहीं। राहुल जी की यात्रा एक सगुणोपासक संन्यासी से निर्गुणोपासक तक और फिर बौद्ध से मार्क्स तक आती है। ऐसी यात्रा का दूसरा उदाहरण और वह भी इस अन्दाज में कि मनुष्य और समाज की समझ विकसित होती जाये, शायद ही है।
आज से यहाँ उनके उपर उर्मिलेश की किताब को प्रकाशित किया जा रहा है। अन्त में उसे पीडीएफ़ में उपलब्ध करा दिया जाएगा। आज किताब में शुरु में दिए गए वक्तव्य और भूमिका से शुरु करते हैं।

योद्धा महापंडित:

राहुल सांकृत्यायन

लेखक- उर्मिलेश

बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना
प्रकाशन वर्ष- 1994



वक्तव्य