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सोमवार, 14 मार्च 2011

आम आदमी क्या करे, अंधी है सरकार (दोहे)


हिन्दी साहित्य में एक बहुत ही मशहूर छंद रहा है दोहा। दो पंक्तियों में कुछ कहने के लिए यह भक्तिकालीन युग में काफी इस्तेमाल में लाया गया। कुछ लोगों का तो मानना है कि अब इसमें कोई शक्ति शेष बची ही नहीं या यूं कहें कि इसकी सारी शक्ति निचोड़ ली गयी। फिर भी आज दोहे लिखे जा रहे हैं। पहले के कवियों को धर्म, भक्ति, राजा के गुणगान और स्त्री के रूप श्रृंगार के अलावा और कोई विषय शायद ही मिलते थे। जब राजा महाराजा कवियों को सोने की मुद्राएं दे रहे हों तो भला उन्हें और समस्याएं कहां से दिखतीं। कबीर के दोहों को सब लोगों ने सुना है। दोहा इस अर्थ में भी खास है कि इसका सहज प्रवाह और तुकांत होने का गुण लोगों को आसानी से अपनी ओर खींचता था और शायद है भी। जब कोई छंद लय में बंधा हुआ हो तो उसे दुहराना या याद रखना सरल हो जाता है। जैसे हम अक्सर शेर याद रखते हैं और उनका इस्तेमाल अलग-अलग जगहों पे करते हैं ठीक वैसे ही दोहों को भी याद रखा जा सकता है। मुक्तक काव्य में दोहे अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।