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सोमवार, 14 मई 2012

मनोहर पोथी बेचते बच्चे (कविता)


हाल की एक कविता जिसके कुछ भाव आजादी कविता से मिलते हैं... 

दस रुपये में चार किताबें
बेच रहे थे बच्चे
उस दिन
रेलगाड़ी में
जिनकी उम्र दस साल भी नहीं थी।

रविवार, 11 सितंबर 2011

स्कूल की घंटी (कविता)



घंटियां
बजती हैं
किसी के मरने पर
उसकी अर्थी के साथ
लेकिन स्कूल में
आखिर किसलिए बजती हैं घंटियां
किसके मरने पर
किसकी अर्थी पर
शिक्षा की
या
पढ़ाई के बोझ से दबे
शिक्षकों को देखते ही
सहमे-से मासूम बच्चों की
या
उनके दिलों में
जगने वाली उमंगों की । 

(शिक्षक दिवस पर नहीं लिख सका था। यह कविता आज से 5-6 साल पहले की है।)

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

ईश्वर तुम्हें धिक्कार है! (एक अधूरी कविता)

निर्मल  हृदय की  प्रार्थना
निष्कपट मन की  भावना
कोई    नहीं   सम्भावना
फिर   भी तुम्हारी साधना
यह  कर  रहा  संसार है!
ईश्वर  तुम्हें  धिक्कार है!

सोमवार, 18 जुलाई 2011

21वीं सदी का समय(कविता)

सात महीने पहले की एक कविता पोस्ट कर रहा हूँ। कुछ लोग सोच सकते हैं कि मैं पुराना माल ठेल रहा हूँ। लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि मेरे पास इन दिनों विचारों की कमी नहीं है। बस थोड़ी शान्ति और समय मिले तो प्रस्तुत करूंगा। तो लीजिए पढ़िए 2011 में 21वीं सदी की कविता।

बिल्ली ने कहा ।
दूध नहीं पिउंगी,
दूध में मिलावट है,
पानी मिलाया गया है उसमें
और वो भी, वो पानी
जिसमें पहले से मिलावट है ।

शनिवार, 16 जुलाई 2011

ऊर्जा की बचत( भोजपुरी कविता का हिन्दी अनुवाद)

कुछ दिन पहले एक कविता लिखी थी। अपनी मातृभाषा में यानि भोजपुरी में। उसका अनुवाद यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। अपने व्यस्तता और कुछ परेशानियों की वजह से बहुत सारे विचारों को लिख नहीं पा रहा हूँ। आप मूल कविता यहाँ पढ़ सकते हैं।


गरीब का पेट
एक मशीन है
जो एक दिन के खाना से भी
चला लेता है दो-चार दिन तक काम।

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

कर सफ़र जा रहे (गीत)

सात साल पहले मैं दसवीं कक्षा में पढ़ता था। स्वतंत्रता दिवस से पहले 31 जुलाई 2004 को एक गीत लिखा जो मशहूर गीत कर चले हम फ़िदा की तर्ज पर था। शुरु-शुरु में तो लिखनेवाले प्रसिद्ध तर्जों पर ही गीत लिखा करते हैं, ऐसा मैं समझता हूँ। उसी तरह मैंने भी यह गीत लिख दिया। 15 अगस्त 2004 को इसे गाना था। अब तो गीत नहीं गाता, बस सुनने का शौक है। पूर्वाभ्यास(रिहर्सल) के समय इसे गाने के दौरान कर चले हम फ़िदा की पँक्तियाँ जुबान पर अपने आप आ जाती थीं। गीत कुछ है ही इस तरह का कि अगर आप गाएँ तो कर चले हम फ़िदा बीच में आ ही जाता है। मैं अपनी लिखी कविताओं और गीतों में बहुत कम को ही पसन्द करता हूँ लेकिन आज भी यह गीत मुझे पसन्द है और शायद हमेशा रहेगा। पढ़िए वह गीत और बताइए कैसा लगा? यह गीत भी, मानकर चलिए उसी दृश्य पर है जिसपर कर चले हम फ़िदा फिल्माया गया है। ध्यान रहे यह आज से सात साल पहले लिखा था। इसलिए इसमें कोई सुधार नहीं करनेवाला। लीजिए पढ़िए वह गीत।

सोमवार, 4 जुलाई 2011

भगवान बहुत दयालु है(लघुकथा)

मूर्तिकार बहुत सुन्दर मूर्तियाँ बनाता था। एक महीने पहले सुबह-सुबह उसके पास दो बच्चे पहुँचे। एक ने गणेश की, दूसरे ने क्राइस्ट की मूर्ति मांगी। मूर्तिकार ने दोनों को दो सुन्दर मूर्तियाँ बेच दी। रास्ते में मूर्ति को लेकर झगड़ा शुरु हो गया। इसी बीच मूर्तियाँ टूट गईं। हाथापाई शुरु हो चुकी थी। झगड़ा बच्चों के माँ-बाप तक पहुँचा। जमकर मार-पीट हुई। मुकद्दमा शुरु हो गया है। वकीलों की चांदी है। हाँ, मूर्तियाँ फिर खरीद ली गई हैं। मूर्तिकार भी फायदे में है। और मूर्तियों में समाए भगवान चुपचाप देख रहे हैं क्योंकि उन्हें ही तो वकील और मूर्तिकार का धंधा चलाना है!

गुरुवार, 30 जून 2011

ज़िंदग़ी(कविता)


कल मुझे मिला
    एक दवा का दुकानदार
    उसने कहा मुझसे
    साहब! नज़र नहीं आ रहे काफ़ी दिनों से
         दवा नहीं ले जा रहे मेरी दुकान से
       घर में सब ठीक तो हैं?

(यह कविता 2009 में लिखी गई थी। हो सकता है इसका शीर्षक उतना उचित नहीं जान पड़े।)

शुक्रवार, 24 जून 2011

कैमरा (कविता)


कैमरा
फोटो खींचकर
बचा लेता है आदमी को
कम-से-कम
एलबम में भी।

सोमवार, 14 मार्च 2011

आम आदमी क्या करे, अंधी है सरकार (दोहे)


हिन्दी साहित्य में एक बहुत ही मशहूर छंद रहा है दोहा। दो पंक्तियों में कुछ कहने के लिए यह भक्तिकालीन युग में काफी इस्तेमाल में लाया गया। कुछ लोगों का तो मानना है कि अब इसमें कोई शक्ति शेष बची ही नहीं या यूं कहें कि इसकी सारी शक्ति निचोड़ ली गयी। फिर भी आज दोहे लिखे जा रहे हैं। पहले के कवियों को धर्म, भक्ति, राजा के गुणगान और स्त्री के रूप श्रृंगार के अलावा और कोई विषय शायद ही मिलते थे। जब राजा महाराजा कवियों को सोने की मुद्राएं दे रहे हों तो भला उन्हें और समस्याएं कहां से दिखतीं। कबीर के दोहों को सब लोगों ने सुना है। दोहा इस अर्थ में भी खास है कि इसका सहज प्रवाह और तुकांत होने का गुण लोगों को आसानी से अपनी ओर खींचता था और शायद है भी। जब कोई छंद लय में बंधा हुआ हो तो उसे दुहराना या याद रखना सरल हो जाता है। जैसे हम अक्सर शेर याद रखते हैं और उनका इस्तेमाल अलग-अलग जगहों पे करते हैं ठीक वैसे ही दोहों को भी याद रखा जा सकता है। मुक्तक काव्य में दोहे अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।