गज़ल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
गज़ल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

इस शहर में हर शख़्स परेशान-सा क्यों है

कुछ पन्ने पलटते समय कुछ नोट किए गए शेर-वेर मिल गए। उन्हें साझा कर रहा हूँ। पिछली बार सन्दर्भ की चर्चा हुई थी। गजल तो है ही एक फालतू किस्म की विधा। कोई भी बात दो पँक्तियों में कहकर मिला देते हैं इसमें। यहाँ फालतू का अर्थ सही परिप्रेक्ष्य में लिया जाना चाहिए। यहाँ गजलों से लिए गए शेर-अशआर (अशआर ठीक से पता नहीं कि क्या है) प्रस्तुत हैं। शुरूआत पद्मश्री गोपालदास नीरज से-

मुझको उस वैद्य की विद्या पे तरस आता है
भूखे लोगों को जो सेहत की दवा देता है।

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

इधर से गुजरा था सोचा सलाम करता चलूँ…


जगजीत सिंह का जाना मीडिया के लिए अमिताभ के जन्मदिन की खबर पर भारी पड़ गया। 40 साल तो दोनों ने गुजारे हैं संगीत और फिल्म जगत में। फिर भी जगजीत का अमिताभ पर भारी पड़ना उनकी हैसियत को दर्शाता तो है ही। अमिताभ ने अपने जन्मदिन की बात तो लिखी है अपने लिखाई-मशीन से लेकिन जगजीत पर नहीं लिखा कुछ। जब ट्वीट पर ही अखबार टूट पड़े हैं, तो वहीं पर अमिताभ ने भी काम चलाया है।
            जगजीत के जाने पर सबसे अलग और बहुत ईमानदारी से याद करते हुए लिखा दिनेश चौधरी जी ने। वे लिखते हैं जगजीत साहब के चले जाने की खबर एक चैनल पर देखकर झटका लगा। पर उम्मीद खत्म नहीं हुई थी, यह सोचकर कि ये चैनलवाले तो उल्टी-सीधी सच-झूठ खबरें देते ही रहते हैं, चलो किसी और चैनल पर देखें। चैनल बदल दिया। लेकिन दूसरे-तीसरे हरेक चैनल पर यही खबर।
और उम्मीद भी की थी कि जगजीत साहब अस्पताल से बाहर आकर फिर से गालिब की ग़ज़लों को गायेंगे। उनके अस्पताल में दाखिल होने के एक दिन पहले ही अखबारों में यह खबर पढ़ी थी कि गालिब की ग़ज़लों के साथ जगजीत व गुलजार साहब की जोड़ी एक बार फिर सामने आ रही है। इसी उम्मीद में मैं ग़ज़लों के पूरे सफरनामे को याद कर रहा था कि जगजीत साहब फिर से अपनी ग़ज़लों की महफिल सजायेंगे, पर अफसोस ऐसा हो न सका क्योंकि इस बार सच बोल रहे थे कमबख्त चैनल वाले! कितने बेरहम होते हैं खबरों पर काम करने वाले कि इधर जगजीत साहब गुजरे नहीं कि वे विकिपीडिया में हैंसे अपडेट होकर थेहो गये।