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शुक्रवार, 10 जून 2011

वरदान का फेर (नाट्य रुपांतरण, तीसरा और अन्तिम भाग)



पहला भाग       दूसरा भाग                      


तीसरा दृश्य

( मंच पर एक चारपाई है। उसपर महात्माजी आराम कर रहे हैं। )
वाचक: चारपाई में बहुत अधिक खटमल थे। इनके सोते ही खटमलों ने धावा बोल दिया। इतना अधिक भोजन किया कि करवट बदलने में भी तकलीफ होती थी। खटमलों ने काटना शुरु किया। महात्माजी त्राहि-त्राहि करने लगे।) बुद्धूदेव: ब्रह्माजी! मैं अभी आपसे 3 वरदान मांगता हूँ। पहला वरदान मुझे यह दीजिए कि अभी फौरन इन खटमलों को मार डालिए। अभी मेरा पेट दुख रहा है। इसलिए मुझे दूसरा वरदान यह दीजिए कि किसी वैद्य के यहाँ से कोई पाचक की गोली मांग लाइए और तीसरा वरदान मैं यही सोचता हूँ कि जब मैं चाहूं तब आपसे 3 वरदान मांग लूं। ( ब्रह्माजी खटमलों को मारना शुरु करते हैं। फिर मंच से चले जाते हैं )

मंगलवार, 31 मई 2011

वरदान का फेर (नाट्य रुपांतरण, भाग -2)

वाचक: दोनों जून 1-1 कटोरा साबूदाना उबालकर महात्माजी पीते थे। आइए हम देखते हैं कि वे किस तरह नित्य मूर्खोपनिषद् का पाठ करते हैं। (महात्माजी के हाथ में एक मोटी पुस्तक है। वे पढ़ते हैं।
ॐ नमो मूर्खेश्वराय मूर्खतां देहि मे सदा।
वंदे मूर्खोपनिषदम् ग्रंथम् पठति मूर्खशिरोमणि:॥

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

वरदान का फेर (नाट्य रुपांतरण, भाग -1)


यह एक छोटी सी नाटिका है। यह शायद 1978-80 के आस-पास बिहार में दसवें वर्ग के हिन्दी की किताब में पहले अध्याय के रूप में पढाई जाती थी लेकिन शायद कहानी के रूप में। जब मैं 15-16 साल का था तब (यानि 2004-2005) में मैंने इसे मंच पर खेलने लायक बनाने के लिए इसे थोड़े से परिवर्तन के साथ नाटिका में बदल दिया था। इसमें संस्कृत के कुछ श्लोक भी जोड़े गये थे। इन श्लोकों की रचना भी मैंने की थी। मैंने श्लोकों का अर्थ नाटिका में तो नहीं दिया था पर यहां दे रहा हूँ। तो पढ़िये और इसका लुत्फ उठाइये। कखग की जगह उस जिले का नाम और अबस की जगह उस अनुमण्डल का नाम दे देना चाहिए जहां यह नाटिका खेली जा रही हो। आगे कपालवस्तु नामक जगह आयी है। यह जगह कोई गांव है ऐसा मान लीजिए।