मंगलवार, 31 मई 2011

वरदान का फेर (नाट्य रुपांतरण, भाग -2)

वाचक: दोनों जून 1-1 कटोरा साबूदाना उबालकर महात्माजी पीते थे। आइए हम देखते हैं कि वे किस तरह नित्य मूर्खोपनिषद् का पाठ करते हैं। (महात्माजी के हाथ में एक मोटी पुस्तक है। वे पढ़ते हैं।
ॐ नमो मूर्खेश्वराय मूर्खतां देहि मे सदा।
वंदे मूर्खोपनिषदम् ग्रंथम् पठति मूर्खशिरोमणि:॥

श्रृणु जना संसारस्य सर्वश्रेष्ठ: मूर्खो जायते।
य: पठति नित्यम् एतम् अश्रद्धया चाशुद्धिम् सह॥
निश्चय सैव अंतकाले मूर्खलोकम् प्राप्नोति।
भविष्यति महामूर्खश्च मा संशय: कुरु जना:॥
(अर्थ: हे मूर्खों के भगवान मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मुझे सदा मूर्खता प्रदान करें। मैं मूर्खोपनिषद ग्रंथ की वंदना करता हूँ जिसे पढने से व्यक्ति मूर्खशिरोमणि हो जाता है। हे संसार के लोगों सुनो जो मनुष्य इसे अश्रद्धा और अशुद्धि के साथ प्रतिदिन पढता है वह संसार का सबसे बड़ा मूर्ख हो जाता है। वह अंत में निश्चय ही मूर्खलोक को प्राप्त होता है, लोगों इसमें संदेह न करो।)
(एक भक्त 4 मिठाईयाँ लेकर आता है।) महात्मा: इन चीजों को देखने से लार टपकती है। इन्हें फ़ौरन मेरे सामने से हटाओ। मैं दोनों जून केवल साबूदाना खाया करता हूँ। मेरे व्रत का हाल नहीं जानते? भक्त: वाह! देखो कितने बड़े तपस्वी हैं। केवल साबूदाना खाकर ही जीवन धारण करते हैं। धन्य हैं! ( अचानक महात्मा जी सोचते हैं) महात्मा: ऐं! महात्मा तो हो चुका। अब न जाने किधर से तपस्वी भी हो गया। (लंबी सांस के साथ) अच्छा, जब तपस्वी हो ही गया तो थोड़ी तपस्या भी कर लेनी चाहिए। वाचक: जंगल तो उन्होंने देखा नहीं था। जंगल की खोज में एक शहर में आ निकले। मुश्किल से एक बहुत बड़े बाग में घुस गए। (महात्मा जी मंच छोड़ चुके हैं। वे नेपथ्य से 2 बार ॐ ब्रह्मदेवाय नम: की आवाज करते हैं) वाचक: कभी हड़बड़ी में पानी में घुस गए और सात दिन तक वहीं किसी टीले पर बैठे रहते। कभी उचक कर किसी पेड़ पर चढ़ गए और उसकी डाल पकड़ कर 3-4 दिनों तक लटकते रहे। कभी फल खाते थे कभी कंद-मूल, कभी मौज आ गई तो किसी पेड़ की सारी पत्तियां नोच कर चबा जाते। इसी तरह उन्होंने सात वर्षों तक घोर तपस्या की। (नेपथ्य से आवाज आती है ॐ ब्रह्मदेवाय नम: - 1 बार)

द्वितीय दृश्य

(मंच पर ब्रह्मलोक का दृश्य। एक तरफ़ वाचक बैठा हुआ है। इंद्र घबड़ाकर नेपथ्य से मंच पर आते हैं। ) इंद्र: त्राहिमाम्, त्राहिमाम् परमपिता, अब मैं बिना मारे मरा, यह गिद्धार्थ जरुर मेरी गद्दी लेगा। ब्रह्माजी: ठहरो वत्स, घबड़ाने की कोई जरुरत नहीं। बुद्धूदेव को मैं तुरंत हटा देता हूँ। (मंच पर महात्मा तपस्यारत है। 3 बार आवाज ॐ ब्रह्मदेवाय नम:। ब्रह्माजी प्रकट होते हैं, इंद्र मंच छोड़ जाते हैं) ब्रह्माजी: बेटा, वर मांग। (बुद्धूदेव घबड़ा गए। वे सोचने लगे।) बुद्धूदेव:- अब कौन सा वर मांगूं? (धीरे से) प्रभो जरा ठहर जाइए, मैं सोचकर कहता हूँ।( वे सोचते रहे।) वाचक: यह कहकर बुद्धूदेव ने सोचना शुरु किया, 3 घंटे सोचते ही रह गए। आख़िर ब्रह्माजी कितनी देर खड़े रहते। ब्रह्माजी: (खींझ कर) तुम्हें वरदान लेना है कि नहीं? वाचक: डपट सुनते ही बुद्धूदेव जी का मिजाज सरक गया। जो कुछ सोच-सोचकर मांगना चाहा था, वह भी भूल गए। ब्रह्माजी: (क्रोधित हो कर) जल्दी 3 वरदान मांग ले, नहीं तो मैं जाता हूँ। बुद्धूदेव: (हाथ जोड़कर) हे प्रभो, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे यह वरदान दीजिए कि हजाम मुफ्त में ही मेरी हजामत बना दिया करे। ब्रह्मा: तथास्तु, अब जल्दी से दूसरा वरदान मांग। बुद्धूदेव: हे प्रभो यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे दूसरा वरदान यह दें कि जब मैं झोली सीने के लिए किसी दर्जी को कपड़ा दूं तो वह उसमें से एक अंगुल भी न चुरावे। वाचक: बुद्धूदेव जी ने जी-भर कर वरदान मांगा नहीं था। ब्रह्माजी को क्रुद्ध देखते ही इनके हवास गुम हो गए थे) बुद्धूदेव: हे प्रभो तीसरा वरदान यह दें कि जब मैं चाहूँ आप से और 3 वरदान मांग लूं। (ब्रह्माजी चले आते हैं। सेठ मंच पर आता है।) सेठ: ( हाथ जोड़कर) आप मेरे घर पधारिए प्रभो! मैं धन्य हो जाऊंगा। महात्मा जी: हाँ, हाँ, चलो आज ही चलता हूँ।( मंच पर से महात्माजी चले जाते हैं।) वाचक: महात्माजी ने सेठ के घर खूब छक कर खाया।
जारी……

2 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय चन्दन कुमार मिश्र जी आपने मेरे ब्लॉग पर एक टिप्पणी दी थी की अपना मेल देखें ..मैंने अपना मेल देखा है वहां आपके नाम से कोई मेल नहीं मिली...कृपया बताएं किस नाम से मेल भेजा है व कब भेजा है...और Yahoo अथवा Gmail किस आईडी पर भेजा है...

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  2. pndiwasgaur@gmail.com पर 30 मई को मैंने मेल भेजा है। chandan शीर्षक से मेल था। अब फिर से भेजा है। चंदन कुमार मिश्र नाम से। Chandan-mishra नाम लिखा होगा।

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