रविवार, 29 मई 2011

ये टाई काहे को पहनता है भाई?

कल क्या टाई के बगैर गंभीर पत्रकारिता नहीं हो सकती? शीर्षक से एक आलेख देखा तो एक कहानी याद आ गयी। जरा ध्यान से सुनिएगा।
     यह कहानी ठीक से याद नहीं। लेकिन गालिब के बारे में है। एक बार गालिब को बादशाह ने भोजन पर बुलाया। गालिब ठहरे गरीब आदमी। कोई शाही या राजसी वस्त्र तो था नहीं उनके पास। इसलिए पहुंच गए सीधे अपने सादे कपड़ों में। द्वारपाल ने दरवाजे से भगा दिया। गालिब कहते रहे कि मैं गालिब हूं और मुझे भोजन पर बुलाया गया है। 



लेकिन उनकेफटेहाल कपड़ों को देखकर दरबान ने भगा ही दिया। दरबान ने कहा कि तुम गालिब कैसे हो सकते हो, तुम्हें तो बादशाह बुला ही नहीं सकते। बेचारे गालिब लौट गये। इधर बादशाह परेशान हैं कि अभी तक गालिब आये नहीं। उन्होंने अपने आदमियों को भेजा तो पता चला कि गालिब आये थे और चले भी गये थे। अब गालिब को राजसी यानि शाही कपड़े चाहिए थे। यह मुझे ठीक से याद नहीं कि गालिब अपने मित्र से मांगकर ले गये या बादशाह ने बाद में भेजा था। अब जब गालिब शाही कपड़ों में महल पहुंचे, वहां बादशाह के साथ खाने बैठे। गालिब ने अपना टोप उतारा और कहा कि टोप पानी पीओ, फिर अपना कोट उतारा और कहा कि कोट खाना खाओ। बादशान ने कहा कि यह सब क्या है? तो गालिब ने जवाब दिया आपके यहां जब इन अमीरी के शाही कपड़ों से ही गालिब की पहचान होती है तो मैंने गालिब को खाने और पीने को कहा है, बस!


     यह कहानी नहीं तमाचा है टाई वालों पर। मैं आज तक कभी भी यह समझ नहीं पाया कि टाई क्यों पहनना जरुरी है? कल ही एक एम बी ए हैं उन्होंने मुझसे कहा कि मैं यह साबित नहीं कर सकता लेकिन महसूस किया है मैंने कि यह क्यों जरुरी है? उनका तर्क है कि जब आप एक निश्चित यूनिफार्म में होते हैं तब आप के अंदर एक अच्छा और संयमित व्यक्तित्व रहता है। तो इस पर भी बता दिया जाये कि अगर आप पुलिस से कह दें कि मैं चोरी करने जा रहा हूं तो क्या आप पर चोरी का आरोप नहीं लगेगा? जब आप जानते हैं कि टाई लगाने के पहले और बाद आप आप ही हैं तो फिर सोच में बदलाव नहीं यह नौटंकी है। कोई जरुरत नहीं है टाई की। टाई का मतलब होता है वह रस्सी जिसे जानवरों को बांधा जाता है। क्योंकि आपने देखा होगा जानवरों खासकर कुत्ता जी के गले में हम रस्सी बांधते हैं। क्या यही काम टाई के रूप में आदमी नहीं करता। टाई का मतलब होता भी है बांधना तो भाई क्यों गले को बांधा जाय? एक नौटंकी है पर्सनाल्टी डेवलपमेंट। मैंने किसी ऐसे आदमी में जो इन नौटंकी वाले इंटरव्यू में पास कर जाता है या इन कोर्सों में या इन चीजों में रुचि लेता है, कभी ऐसा नहीं पाया जो इंसानियत से पेश आता हो, इंसान जैसा व्यवहार करता हो। अपवाद हो सकते हैं। फिर याद आयी एक बात लाल बहादुर शास्त्री की। सुना है कि एक बार उन्हें इंग्लैंड या किसी दूसरे देश में जाना था। उनका कोट फट गया था। लोगों ने सुझाव दिया कि आप प्रधानमंत्री हैं, नया कोट बनवा लीजिए। लेकिन शास्त्री जी ने नहीं बनवाया और उसी कोट को उलटा बनवाकर पहन लिया और चले गये थे। क्या आप ऐसे नेता के सामने नतमस्तक नहीं होंगे? उनका जवाब था कि अगर मैं इसी तरह जाऊं तो क्या वहां लोग मुझे नहीं पहचानेंगे?
     अब कुछ लोग अगर गालिब और शास्त्री जी से ज्यादा समझदार, ग्लोबल होंगे तो यह सब उन्हें बोर करेगा। कुछ सभ्यता का दिखावा करना चाहते हैं। लेकिन ध्यान रहे सभ्यता इतनी तक तो ठीक  है कि आप अभद्र न लगें लेकिन इतनी ठीक नहीं कि आप सर्कस के भालू, बन्दर या हाथी की तरह बच्चों के आकर्षण का केंद्र हो जायें। सभ्यता दिखावे के अधिकतम सीमा पर असभ्यता बन जाती है। भारत के लोग कुछ ज्यादा हबड़ाई में हैं। इन्हें ग्लोबल दिखना जरुरी लगता है, भले ही ग्लोब इनको पहचाने या नहीं।
     एक ऐसा ही आतंक है जूता। पता नहीं इसके पीछे क्यों स्कूल से लेकर प्रोफेशनल कहे जाने वाले सारे कामों में सब परेशान रहते हैं। आधुनिक जूता प्रतीक है सिर्फ़ दूसरों के पैर कुचलने का और अपने पांव बचाने का।
     यह बिलकुल व्यक्तिगत होना चाहिए कि कोई आदमी क्या पहनकर आयेगा, कम से कम जूता और चप्पल के बारे में तो होना ही चाहिए। जूता वैसे भी पैर को कोमल और डरपोक बनाने में काम आता है। और अगर आप देर हो रहे हों तो यह जूता बताता है कि समय कितना महत्वपूर्ण है। दूसरा आप किसी के घर में आसानी से घुस नहीं सकते। तीसरा आप कहीं जाते हैं तो पैर धो नहीं सकते। चौथा इसे पहनने और खोलने में हमेशा पूरा हाथ व्यस्त हो जाता है। कुछ खाना हो तो हाथ धोइये फिर खाइये।
     मतलब ये है कि अंग्रेज बनाने के लिए ये दो हथकंडे अपनाए जाते हैं। और याद रखें कि आप किसी को प्रभावित तभी करेंगे जब आपमें कुछ अच्छे गुण हों, न कि काला कोट, टाई, जूता लपेट, बांध और पहन कर चलने से। और जो इन चीजों से प्रभावित होते होंगे मुझे अफसोस है कि वे बेचारे प्रभावित करने के लायक होते ही नहीं। किसी अक्लमन्द से पूछ लेंगे तो अच्छा रहेगा कि टाई क्यों पहनते हैं? क्या इसलिए कि दूसरे पहनते हैं। अगर हां तो आप खुद ही समझ लें महानुभाव ……………

2 टिप्‍पणियां:

  1. अब हमें तो ये सब टोटके करने पड़ते हैं। वकालत जो करनी है। वैसे आजकल सिविल कोर्ट के अवकाश हैं तो टाई, कोट से तो मुक्त हैं। पर जूता जरूर पहनते हैं। कार चलाने में सुविधा रहती है।

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  2. आदरणीय द्विवेदी जी,

    मजबूरी है अभी। देश के कानून में कानूनी लोग ही इस तरह का बदलाव खुद करवा लेते तो अच्छा होता। लेकिन आपकी बात फिलहाल तो सही है लेकिन यह है तो अंग्रेजी व्यवस्था ही।
    आप यहाँ आए। बहुत बहुत धन्यवाद

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