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शुक्रवार, 23 मार्च 2012

भगतसिंह के चौदह दस्तावेज



भगतसिंह के चौदह दस्तावेज

किसी ने सच कहा है- "सुधार बूढ़े आदमी नहीं कर सकते, क्योंकि वह बहुत ही बुद्धिमान और समझदार होते हैं। सुधार तो होते हैं युवक के परिश्रम, साहस, बलिदान और निष्ठा से, जिन्हें भयभीत होना आता ही नहीं और जो विचार कम तथा अनुभव अधिक करते हैं।"
( भगतसिंह के 'स्वाधीनता के आन्दोलन में पंजाब का पहला उभार' लेख से)

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

किसी को याद न आये शहीद

23 मार्च 2011 को हमारे देश की संसद में यह तय किया जा रहा था कि कौन सा पक्ष ज्यादा दोषी है। मनमोहन सिंह सरकार और विपक्ष भाजपा में यह हल्ला था कि कौन बेदाग है। हमारी संसद के सारे लोग आरोप-प्रत्यारोप में जी-जान से लगे हुए थे। उन्हें याद ही नहीं आ सका कि आज 23 मार्च 2011 है यानि भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के शहीद होने के अस्सी साल पूरे हो रहे हैं। अब कोई भी आदमी सोचें कि इनकी हरकतों को क्या कहा जाए? हमारा देश क्रिकेट, सिनेमा, चुनाव को कितने जोर-शोर से याद करता है! लेकिन 23 मार्च में न तो ग्लैमर है, न मार्केट वैल्यू, न कोई टी आर पी है फिर क्यों कोई याद रखे। अपनी क्षणिक खुशी के लिए क्रिकेट के पीछे साल के पचासों दिन खर्च करने वाले युवा, कभी सोचते ही नहीं कि वे चैन से खेल देख पाते हैं तो इसके पीछे भी कितनी बड़ी बात है। सवा अरब का शोर हर तरफ़ हो रहा है। मीडिया कमीनेपन की हद पार कर चुका है। भगतसिंह के अरबवें हिस्से में नहीं आने वाले इस देश के ऊपर शासन करते हैं। बीस पेज के अखबार में बीस लाइन में हर साल भगतसिंह को निपटा देने वाले मीडिया को क्या कहा जाए, आप खुद सोच लें। लेकिन यही मीडिया अखबार में साल में क्रिकेट के पीछे हजार पेज, सिनेमा के पीछे हजार पेज बहुत आसानी से खर्च करता है। और खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहता फिरता है। लेकिन हकीकत में यह लोकतंत्र के चौकी की एक कील तक नहीं है।