हमेशा की तरह आज दो अक्तूबर को गाँधी जी अधिक, लाल बहादुर शास्त्री कम ही याद किए जाएंगे। हम भी गँधियाते थे पहले। कई बार गाँधी जी कविताई का विषय बनते रहे थे। लेकिन अब यह सब 2004-05 के बाद बन्द है। विवेकानन्द भी इसी तरह कई बार अपने विषय होते थे। अभी थोड़े दिनों पहले ही आपने गाँधी जी पर जय हे गाँधी! हे करमचंद!! कविता पढ़ी थी यहाँ। आज गाँधी जी के प्रति सम्मान तो है लेकिन पहले जितनी श्रद्धा तो नहीं ही रही। उनपर एक कविता या गीत जो कहें, गाँधी जयंती, 2004 पर गाने के लिए ही मानिए, लिखा था। क्योंकि ‘गाँधी जी लोकप्रिय क्यों’ विषय पर भाषण प्रतियोगिता आयोजित हुई थी, तो सोचा कि एक गीत भी हो जाए। हालांकि इसे गाया नहीं जा सका और बाद में 26 जनवरी, 2005 को इसे गाया गया। अब इन दिवसों में रुचि तो है नहीं। …इस रचना में भावनाएँ हैं, अब थोड़ा रूखा हूँ। पहले की अधिकांश मान्यताएँ एकदम बदल गईं है। फिर भी मेरी सबसे प्रिय खुद की रचनाओं में यह रचना आज भी शामिल है। अगर आप मोहम्मद रफ़ी का गाया ‘क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी फ़ितरत छुपी रहे’ या इधर चलने वाला गीत ‘कलियुग बैठा मार कुंडली’ की तर्ज पर इस रचना को गाकर देखें, तो आपको पसन्द जरूर आएगा। मुझे इसकी कुछ पँक्तियाँ बहुत पसन्द हैं, अब यह अपनी प्रशंसा ही सही, लेकिन सच है।
"कैसा प्रदर्शन, क्या सिर्फ पुलिस की गालियाँ और मार खाने के लिए…हरगिज नहीं! इस तरह का कोई भी कदम मैं उस समय तक नहीं उठाऊंगा, जब तक मेरे पास एक अदद बंदूक न हो" - चे ग्वेरा
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रविवार, 2 अक्टूबर 2011
मंगलवार, 5 जुलाई 2011
कर सफ़र जा रहे (गीत)
सात साल पहले मैं दसवीं कक्षा में पढ़ता था। स्वतंत्रता दिवस से पहले 31 जुलाई 2004 को एक गीत लिखा जो मशहूर गीत ‘कर चले हम फ़िदा’ की तर्ज पर था। शुरु-शुरु में तो लिखनेवाले प्रसिद्ध तर्जों पर ही गीत लिखा करते हैं, ऐसा मैं समझता हूँ। उसी तरह मैंने भी यह गीत लिख दिया। 15 अगस्त 2004 को इसे गाना था। अब तो गीत नहीं गाता, बस सुनने का शौक है। पूर्वाभ्यास(रिहर्सल) के समय इसे गाने के दौरान ‘कर चले हम फ़िदा’ की पँक्तियाँ जुबान पर अपने आप आ जाती थीं। गीत कुछ है ही इस तरह का कि अगर आप गाएँ तो ‘कर चले हम फ़िदा’ बीच में आ ही जाता है। मैं अपनी लिखी कविताओं और गीतों में बहुत कम को ही पसन्द करता हूँ लेकिन आज भी यह गीत मुझे पसन्द है और शायद हमेशा रहेगा। पढ़िए वह गीत और बताइए कैसा लगा? यह गीत भी, मानकर चलिए उसी दृश्य पर है जिसपर ‘कर चले हम फ़िदा’ फिल्माया गया है। ध्यान रहे यह आज से सात साल पहले लिखा था। इसलिए इसमें कोई सुधार नहीं करनेवाला। लीजिए पढ़िए वह गीत।
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