सोमवार, 4 जुलाई 2011

भगवान बहुत दयालु है(लघुकथा)

मूर्तिकार बहुत सुन्दर मूर्तियाँ बनाता था। एक महीने पहले सुबह-सुबह उसके पास दो बच्चे पहुँचे। एक ने गणेश की, दूसरे ने क्राइस्ट की मूर्ति मांगी। मूर्तिकार ने दोनों को दो सुन्दर मूर्तियाँ बेच दी। रास्ते में मूर्ति को लेकर झगड़ा शुरु हो गया। इसी बीच मूर्तियाँ टूट गईं। हाथापाई शुरु हो चुकी थी। झगड़ा बच्चों के माँ-बाप तक पहुँचा। जमकर मार-पीट हुई। मुकद्दमा शुरु हो गया है। वकीलों की चांदी है। हाँ, मूर्तियाँ फिर खरीद ली गई हैं। मूर्तिकार भी फायदे में है। और मूर्तियों में समाए भगवान चुपचाप देख रहे हैं क्योंकि उन्हें ही तो वकील और मूर्तिकार का धंधा चलाना है!

      झगड़ा अब हिन्दू-ईसाई का हो गया है। हथियार भी बिकने शुरु हो गए हैं। उनकी भी चांदी है। सचमुच भगवान बहुत दयालु है। सबों का खयाल रखता है।

5 टिप्‍पणियां:

  1. चलो देखते हैं,
    कौन से भगवान् जीतते हैं आखिर ||
    हम भी तमाशबीन बन जाएँ ||

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  2. रविकर जी,
    दुख इस बात का है कि यह कथा और बड़ी करनी चाहिए थी। लेकिन अब छोड़िए। अभी तो आगे और कई लोग थे जिनकी देखभाल भगवान करता है जैसे मरने पर लाखों पेड़ों का, फिर कफ़न बेचनेवालों का, ताबूत बेचने वालों का।

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  3. अच्‍छी कथा लिखाई भगवान ने.

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