शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

गाँधी जी पर बहस और मेरी टिप्पणियाँ

पिछले दिनों महाशक्ति के चिट्ठे यानि ब्लॉग पर चला गया। वहाँ मुख्य पृष्ठ पर अंग्रेजी में नामित एक तरफ़ एक स्तम्भ जैसा है जिसमें गाँधी जी पर छ: आलेखों के लिंक हैं। इन आलेखों में मैंने पाँच आलेखों पर अपनी टिप्पणी की। वहाँ देखा कि महाशक्ति भाई और एक अन्य भाई दोनों बड़े परेशान हैं कि गाँधी जी को राष्ट्रपिता नहीं रहने देना है। यह लिखते वक्त मुझे एक एकांकी याद आ रही है जो कुछ साल पहले सुमन-सौरभ में छपी थी जिसमें गांधी जी कहते हैं कि वे साठ सालों से देश में राष्ट्रपिता का पद संभाल रहे हैं और अब उन्हें आराम चाहिए। किसी भी सेवा में कार्यरत आदमी को भारत में साठ-बासठ या पैंसठ साल की उम्र में सरकार सेवानिवृत्त कर देती है, तो उन्हें क्यों अभी तक सेवा से मुक्त नहीं किया गया। 


अपनी टिप्पणियों को मैं पहले भी आपके सामने रख चुका हूँ और इस बार फिर टिप्पणियों के साथ हाजिर हूँ। इस बार बहस नहीं होती है। बस, मैंने अपने विचार रखे और सिर्फ़ एक आलेख पर दो-चार टिप्पणियाँ हैं जिन्हें मैं आपके सामने रख रहा हूँ। अच्छी से समझ में आए इसके लिए तो मूल आलेखों को पढ़ना ही होगा। 

एक और जगह गाँधी जी पर थोड़ी सी बात हुई। मैंने वहाँ भी अपनी टिप्पणी की। ये सारी टिप्पणियाँ मूल आलेख के पते के साथ यहाँ रख रहा हूँ ताकि गाँधी जी पर मेरे विचार आप जान सकें।

मुझे तो गाँधी जी से बहुत हमदर्दी है, भाई!


आपसे निवेदन है कि भगतसिंह के लिखे 4 अक्टूबर 1930 जो पिता को लिखा गया था, उसे अवश्य पढ़ें।

इस बार मुझे कहना पड़ रहा है कि आपमें कोई सम्मान और निष्पक्षता की भावना है भी या नहीं?

कांग्रेस हो या कोई आपके सोच में तनिक भी तार्किकता नहीं दिख रही है। संसद पर हमले में सब सांसद मर जाते और वह संसद की बिल्डिंग ढह जाती तो ही अच्छा था। 2001 के हमले के बाद 2004 तक भाजपा पर कोई आरोप नहीं कि उसने क्यो नहीं कुछ किया? और कांग्रेस पर अब आरोप बिलकुल भाजपाई सोच है।

यह बहाना नहीं चलेगा कि संसद पर हमले के बाद भाजपा ने यह कदम उठाए और वह कदम उठाए। संसद की बिल्डिंग भी गुलामी का चिन्ह है और ये सांसद भी मारे जाने के लायक थे। हमलावर को पुरस्कार देना चाहिए था, ऐसा भी मुझे लगता है। क्योंकि आज भगतसिंह होते तो इन सांसदों की संसद पर पक्का बम फेंक कर खत्म कर दिया होता लेकिन किसी भारतीय ने यह नहीं किया।

बार बार गाँधीवाद की बात क्यों कर रहे हैं? मैं कह चुका हूँ कोई गाँधीवाद नहीं है। और होगा भी तो वह 1947 तक खत्म हो चुका।

संसद के भक्त कभी देशभक्त नहीं हो सकते। मुझे ऐसा लगता है जैसे कांग्रेसी चोर वैसे भाजपाई भी। उनके समय में हमला हुआ तो चिल्ला रहे हैं।

पार्टी में 75 साल पहले क्या हुआ इसका आज की पार्टी पर कोई असर नहीं हो सकता। क्योंकि उस समय का कोई आदमी या विचार कांग्रेस में हैं ही नहीं। गाँधी ने भी कहा था कि खत्म कर दो कांग्रेस को। ये सब ध्यान में नहीं आता।

भगतसिंह या शहीदों की आड़ में आप भाजपाइयों को महत्व दे रहे हैं। यह गलत है महाशक्ति भाई।

आपके हिन्दी चिट्ठे यानि ब्लाग पर अनावश्यक अंग्रेजी देखकर दुख हुआ।


मतभेद जायज है लेकिन यह वाक्य कि कांग्रेस के चमचे ही जानें कि राष्ट्रपिता गाँधी ही क्यों, तो यह आरोप नेताजी पर लगता है। आखिर क्या वजह है नेताजी अपनी फौल में एक रेजिमेंट का नाम गाँधी रेजिमेंट रखते हैं?
नेताजी पर इस तरह की घटिया टिप्पणी करना निंदनीय है भले ही वह अप्रत्यक्ष है।

मुझे किसी तरह की समस्या नहीं है चाहे राष्ट्रपिता भगतसिंह हों या गाँधी जी। यह आर्कुट और फेसबुक इन कामों के योग्य नहीं कि इनपर चर्चाएँ करके हम इतिहास रच दें या बदल दें।
आप मेरी टिप्पणियों पर कोई भी जवाब मेरे ईमेल पर ही दें क्योंकि बहुत जगह टिप्पणियाँ करता जा रहा हूँ और हर जगह मैं आकर फिर देख नहीं सकता।

मूल आलेख: गांधी का अहं

नेता तो नेता ही हो जाता है। भगतसिंह की हिसप्रस में उनका महत्व, आजाद हिन्द फौज में नेताजी का महत्व और कांग्रेस में गाँधी का महत्व हमेशा रहा है।
आप इस बात को कहकर एकांगी बात कर रहे हैं कि गाँधी ऐसे थे।

गाँधी की सबसे भयंकर गलतियों में नेहरु का पक्षपात और नेताजी के साथ भेद है, मैं इससे इनकार नहीं करता।

लेकिन नेताजी के बारे में आप बहुत जानते हों तो बताइए कि घटनाओं का असर नेताजी और गाँधी जी दोनों पर पड़ा। स्वाभाविक क्रान्तिकारी तो दोनों नहीं रहे इस हिसाब से जैसे आपने सोचा है। एक खुद पर अत्याचार से और एक लोगों के अत्याचार से। लेकिन यहाँ गाँधी ने कपड़े और खाने तथा सभी खर्चों में जमकर कटौती की देश के लिए उसका महत्व आपकी नजरों में नहीं है।

अभी याद आया 22 मार्च 1931 को भगतसिंह का लिखा भी देख लें। कुछ समझ में आ जाएगा।

सुभाष चन्द्र बोस और गाँधी या कोई हर क्रान्तिकारी किसी घटना से ही सोचना शुरु करता है जब वह महसूस करता है। वरना नेताजी ने अंग्रेजी सरकार में नौकरी की क्यों, भले इस्तीफ़ा दिया। लोग कहते हैं कि पिता को दिखाने के लिए। लेकिन आपका लिखा बताता है कि वे नौकरी कर रहे थे। और बाद में आहत होकर त्यागपत्र दिया। सवाल है नेताजी ने नौकरी क्यों की जबकि भगतसिंह ने ऐसा कुछ नहीं किया था।
नेताजी अच्छे और नेहरु से ज्यादा योग्य नेता थे, इसमें किसी को संदेह नहीं है। लेकिन 1939 तक यानि उम्र के 48वें साल तक वे कांग्रेस में क्या कर रहे थे जबकि उन्हें मालूम था कांग्रेस सेना और युद्ध नहीं मानती थी। यह साबित करता है सुभाष और गाँधी सभी किसी घटना के बाद अपनी खास नीति से लड़ते हैं। ध्यान से देखिए।

एक बात याद आई कि भगतसिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज देखिए। उसमें नेहरु के प्रति बहुत सम्मान दिखता है भगतसिंह में लेकिन नेताजी के प्रति क्या दिखता है, यह खुद पढ़कर देख लें।

इसलिए बार बार कह रहा हूँ कि आपकी जो इतिहास दृष्टि है उसमें पक्षपात और पूर्वाग्रह हमेशा दिखते हैं। इस बार की टिप्पणी में हर बात के सबूत हैं हमारे पास। अब साबित कीजिए नेताजी 48 साल तक क्या थे? 


आप के मन में यह सवाल उठना गलत नहीं है लेकिन यह किसी काम का नहीं है। जिन लोगों ने गांधी के नाम पर अपनी रोटी सेंकी है उनका संबंध गाँधी से कुछ नहीं है। बस नाम से कोई गाँधी नहीं हो जाता।
वैसे राष्ट्रपिता तो आपमें या मुझमें से किसी ने कहा नहीं था। यह काम नेताजी का है और उन्हीं से पूछते कि क्यों कहते हैं ऐसा?
लेकिन आप गांधी जी पर जो आरोप लगा रहे हैं उनमें उनका हाथ तो है ही नहीं। उनके मरने के बाद किसी ने उनके रास्ते पर चलने की कोशिश की ही नहीं। बस ढोल पीटते रहे। इसमें बेचारे गाँधी का क्या दोष? उन्होंने थोड़े ही कहा था इतिहासकारों से कि मेरा नाम लिखकर और शहीदों का नाम मिटा दो। ये तो कमीनापन है उन चोरों का जिन्होंने यह सब किया। मेरे लिए शहीद और गाँधी दोनों महत्वपूर्ण और सम्माननीय हैं।
पता नहीं किस गाँधीवादी की बात लोग कर रहे हैं? कौन सा गाँधीवादी देखा आपने या लोगों ने? गाँधी पर बहस करनी हो तो चैट पर आइये।
लेकिन आप लोगों में बेवजह यह सब बात उठा रहे हैं।
28 June, 2011 18:03
''गांधी जी के कट्टर भक्त , भारत सरकार और कुछ हमारे अपने भारतवासी जो भारत की संस्कृति और इतिहास से अनभिज्ञ हैँ गांधी जो को राष्ट्रपिता कहते हैं । भारत एक सनातन राष्ट्र हैं तथा यहाँ की संस्कृति अरबों वर्ष पुरानी हैं , इससे पुराना राष्ट्र विश्व में कोई दूसरा नहीं हैं तो इसका पिता अट्ठारहवीं - उन्नीसवीं ईसाई सदी में कैसे पैदा हो सकता हैं ? वस्तुतः राष्ट्रपिता की अवधारणा पाश्चात्य मैकालेवाद की देन हैं , भारत की संस्कृति तो माता भूमि पुत्रोहम पृथ्वियां पर विश्वास करती हैं और अपने आप को इसका पुत्र मानती हैं तो फिर गांधी या कोई भी इस राष्ट्र का पिता कैसे हो सकता हैँ । ज्यादा जानकारी के लिए www.satyasamvad.blogspot.com पर लिखा गया लेख " क्या गांधी जी राष्ट्रपिता हैँ ! " पढा जा सकता हैं ।
31 March, 2011 15:52''
इतनी घटिया टिप्पणी करने की हिम्मत कैसे की विश्वजीत ने!
यह टिप्पणी नेताजी को मैकालेवादी बताती है। यह बताती है कि टिप्पणीकार निष्पक्ष नहीं किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित है।
इतना तो लगने लगा है कि आपको गाँधी जी से नफ़रत सी है और भाजपा या संघी सोच भी है। बुरा मत मानिएगा। मैं कांग्रेस और भाजपा दोनों को महाघटिया मानता हूँ। आप भी गाँधीविरोधी फैशन के शिकार से दिख रहे हैं। 
28 June, 2011 18:14
 vishwajeetsingh said...
श्री चंदन कुमार मिश्र जी गांधी जी को राष्ट्रपिता की उपाधि सर्वप्रथम कवि रविन्द्र नाथ टैगोर ने दी थी , नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने तो केवल उसकी पुनर्नावृत्ति की थी ।
मैं गांधी जी के ग्राम स्वराज का तो समर्थक हूँ , लेकिन गांधी जी द्वारा आधुनिक भारतीय राजनीति में पैदा की गई विभाजनकारी साम्प्रदायिक तुष्टिकरण की नीतियों का विरोधी हूँ ।
कोई भी सच्चा देशभक्त गांधी तो क्या किसी को भी इस देश का राष्ट्रपिता नहीं मान सकता , क्योंकि भारत एक सनातन राष्ट्र है और सनातन राष्ट्र का कोई पिता नहीं हो सकता ।
मैं संघ , भाजपा अथवा कांग्रेस के मन्तव्य का शिकार नहीं हूँ , यह मेरा निश्पक्ष विचार हो गांधी जी के जीवन - चरित्र व दर्शन के गहन अध्ययन के बाद निकला है । 
29 June, 2011 12:29

गांधी को राष्‍ट्रप‍िता कहा जाये अथवा नही यह आज एक महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न है... गांधी को राष्‍ट्रप‍िता उन लोगो ने धोषित किया जो गांधी की चाटुकारिता मे लगे थे और गांधी की कारण उनकी रोजी रोटी चल रही थी। नेहरू को मनमर्जी करनी हुई तो गांधी लाठी का सहारा लिया...कांग्रेस मे लोकतंत्र की रेड़ गांधी ने उस समय ही मार दी जब गांधी ने कहा कि पट्टभिसीता रमैया की हार को अपनी हार घोषित किया था और और गांधी की औकात को तत्‍कालीन काग्रेसी सदस्‍यो ने नेताजी को जीता कर बता दी थी। कहा जाता है कि एक म्‍यान मे दो तलवार नही रह सकती है जबकि एक तरवार बिना काम की सिर्फ बातूनी हो,इसलिये नेताजी ने कांग्रेस को गांधी को सौपकर नया रास्‍ता चुनना उचित समाझा। उस गांधी को राष्‍ट्रपिता की बात किया जाना हस्‍यास्‍पद होगा जिस गाधी का लड़का हरीलाल गांधी अपना पिता न मानते हो।
गांधी क्‍या है और क्‍या थे वह किसी से‍ छिपा नही है..गांधी रहस्‍य के नये नये प‍न्‍ने नित खुल है...जिससे गांधी का नेहरू प्रेम भी उजागर हो रहा है। 
30 June, 2011 08:20


vishwajeetsingh said...
महाशक्ति जी गांधी की ये वैचारिक सन्ताने भारत की सांस्कृतिक अवधारणा को जाने बिना या जानने के बाद भी गांधी को राष्ट्रपिता कहती ही रहेगी और भारत माता का अपमान करती रहेगी ।
वीर गोडसे को पानी पी - पी कर गाली देने वाले मित्रों ने क्या कभी सोचा है कि गोडसे जो की बचपन से ही जाति - पाति , छुत - अछूत आदि कुरूतियों का विरोधी एक सच्चा समाज सुधारक था , हिन्दू राष्ट्र समाचार पत्र का यशस्वी संपादक था , अत्याचारी निजाम हैदराबाद के विरूद्ध आर्य समाज के आन्दोलन में हैदराबाद सत्याग्रह की टोली का नेतृत्वकर्त्ता था , हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने का समर्थक था , नेहरू की मैकालेवादी मानसिकता का विरोधी होने पर भी नेहरू की भारत के उद्योगीकरण करने की नीतियों का समर्थन कर्त्ता था और गांधी का सम्मान करने वालों में भी अग्रिम पंक्ति में था । तो क्या कारण रहे की गोडसे जैसे अहिंसक व्यक्ति को कलम छोडकर रिवाल्वर थामनी पडी और गांधी वध का अपयश अपने ऊपर लेना पडा ?
मित्रों हमे अपने विचार किसी संगठन , दल अथवा पार्टी की विचार धारा पर नहीं बल्कि सच्चाई को जानकर तथ्यों के आधार पर रखने चाहिए । आगे आपकी इच्छा ......


एक बात बताएंगे कि गाँधी से ज्यादा उम्र का नेता और कौन है जो इतना समय खर्चता रहा। अगर गाँधी जी कमजोर हो चुके थे,तो इसमें गलत भी ज्यादा नहीं है।
आप एक गलत बात और कर रहे हैं कि 18 करोड़ मुसलमान रहते हैं तब और 4-5 करोड़ रह लेते, अब ये 17-18 करोड़ हैं। यानि कुल मिलाकर 35-40 करोड़ से अधिक हो जाते अगर बांग्लादेश को मिला दें।
गाँधी जी वाले सभी अलेखों को देखकर टिप्पणियाँ कर रहा हूँ।


आप को यह दिखाई देना चाहिए कि यह कोई इतिहास नहीं एक फिल्म का गीत है। पता नहीं इस बात को इतनी गम्भीरत से लेने की क्या जरूरत थी। मनोज कुमार की फिल्म देखिए, एक जगह वह शहीद में शानदार काम भी करते हैं तो दूसरी जगह उपकार में गाँधी और जवाहरलाल के नाम पर भी गीत गाते हैं।
इस गीत से किसी दूसरे शहीद का अपमान नहीं होता। मैंने खुद गाँधी जी पर गीत और कविताएँ भी लिखी हैं और भगतसिंह पर भी।
सोच का दायरा छोटा है, इसे बड़ा किया जा चाहिए।
एक बात और आपके ब्लाग पर जितने टिप्पणीकार हैं उनमें से किसी ने गाँधीवाद को जाना नहीं है। पहली बात तो यह कि गाँधीवाद कुछ है ही नहीं।
जिस बाबा रामदेव की बात आप यहाँ करते रहते हैं, उनके स्वदेशी के सिद्धान्त और अनशन का श्रेय भी गाँधी को ही जाता है। मैं हिंसा और अहिंसा दोनों को पसन्द करता हूँ लेकिन यह भगतसिंह के अहिंसा वाले तरीके से होगा। लेकिन गाँधी के सामाजिक और आर्थिक सिद्धान्तों को देखें तो मालूम होगा कि गाँधी के विचार कैसे हैं? गाँधी नहीं गाँधी का विचार महत्वपूर्ण है।
यह गीत सिर्फ़ श्रद्धा से गाया है न कि शहीदों से द्वेष रखकर। जैसे आप एक नहीं बहुत से लोगों को प्रणाम करते हैं भले उनके विचार आपसे कितने भी भिन्न हों। 

मैंने लिखा
महाशक्ति और विश्वजीत जी,
मुझे तो किसी ने बताया ही नहीं कि मेरे लिखे पर किसी ने जवाब भी दिया है। यह संयोग है कि मैं खुद यहाँ आ गया।
http://www.hindi.mkgandhi.org/g_hatya.htm पर प्रकाशित तथ्यों का खंडन करें।
http://www.hindi.mkgandhi.org/faqs/faq.htm पर प्रकाशित बातों का भी खंडन करें।
इतना तय है कि गोडसे एक पागल और सनकी था। उसका बयान मैंने पढ़ा है। गाँधी-वध क्यों देखा है। वह किताब बताती है कि गोडसे धार्मिक उन्मादी के सिवाय और कुछ नहीं है भले ही वह देशभक्त हो लेकिन उसकी सनकी को अच्छा नहीं कहा जा सकता।
विश्वजीत जी,
आप पहले उपरोक्त दोनों लिंकों का खंडन करें वह भी तर्कों और तथ्यों के साथ। तब बात आगे बढ़ेगी।
महाशक्ति जी,
यह बिलकुल अनावश्यक प्रश्न है कि कौन राष्ट्रपिता है और कौन नहीं। गाँधी ने कभी अपने नाम में खुद से महात्मा नहीं लगाया था। बस एक बार बैंक से संबन्धित काम में जहाँ अपरिहार्य स्थिति थी वहीं दस्तखत में महात्मा लिखा वरना वे मोहनदास करमचन्द गाँधी ही लिखते थे।
मैं जानना चाहता हूँ कि विश्वजीत जी ने गाँधी पर गहन अध्ययन और चिन्तन कैसे किया और क्या-क्या अध्ययन किया। गाँधी को पूरी तरह पढ़ने के लिए ही कम से कम 3500 से 4000 घंटे चाहिए क्योंकि गाँधी के सम्पूर्ण वांगमय में लगभग 55000 पृष्ठ हैं और फिर उनके उपर जब आप आरोप लगाते हैं और गोडसे को वीर कहते हैं तो गाँधी के उपर कम से कम बीस-तीस किताबें और पढ़नी पड़ेंगी यानि कुल मिलाकर कम से कम 60-70 हजार पृष्ठों आपने पढ़ लिया? ये तो अध्ययन हुआ और फिर चिन्तन का मतलब तो हवाई जहाज चलाना नहीं होता। उसके लिए इससे भी ज्यादा समय लगाना होगा। इसके अलावा भगतसिंह हैं, चंद्रशेखर आजाद हैं , नेताजी हैं और सब ले-देकर आपको कम से कम 10-15000 घंटे तो खर्च करने ही पड़ेंगे। यानि अगर आप रोज पाँच घंटे भी पढ़ते हैं तब 6-7 साल तो सिर्फ़ इन्हीं लोगों को पढ़ने में निकल जाएंगे।
आपके अनुसार गाँधी जी को राष्ट्रपिता टैगोर ने कहा फिर नेताजी ने दुहराया। साल मालूम होगा कस्तूरबा के मरने पर 1944 में नेताजी ने राष्ट्रपिता क्यों कहा? यह साल तो कांग्रेस से मतभेद और आजाद हिन्द फौज के गठन के बाद का है।
क्या आप बता सकते हैं कि नेताजी को अब क्या फायदा होनेवाला गाँधी जी से? या यह बताइए कि बापू नाम की किताब लिखनेवाले दिनकर तो वीर रस के कवि थे, फिर क्यों लिखी बापू?
सुभाष चन्द्र बोस ने खुद को आजाद भारत का राष्ट्रपति घोषित कर रखा था तो वे सत्ता के लालची हो गए? आप सब कुछ नहीं सिर्फ़ गाँधी विरोधी आन्दोलन चलाने की कोशिश कर रहे हैं? पिछली बार मैंने गाँधी जी पर और सुभाष चन्द्र बोस पर जो सवाल उठाए थे, उनका जवाब अभी तक किसी ने नहीं दिया।
वीर गोडसे पर सवाल खड़ा कर लिया आप सबने लेकिन मेरे सवाल जो गाँधी-सुभाष-भगत पर हैं उनके जवाब दीजिए तब आगे बात होगी। भगतसिंह के बारे में मैं कह चुका हूँ वे नेहरु के प्रशंसक हैं और सुभाष के उतने प्रशंसक नहीं हैं। सबूत चाहिए तो मिल जाएगा। सम्पूर्ण दस्तावेज हैं भगतसिंह के, उसमें से दिन भी बता दूंगा।
और भगतसिंह ने जो बम फेंका था वह भी कोई मौलिक सोच नहीं थी। आप खुद पढ़ और जान लें कि फ्रांस में यह घटना हो चुकी थी। उसी से प्रेरणा  लेकर भगतसिंह ने भी बम फेका था।
आप सब एक फालतू सवाल के पीछे पड़े हुए हैं और उसे महत्वपूर्ण बता रहे हैं। उतना शोर मचाइए कि भारत का अंतरराष्ट्रीय नाम भारत हो, अंग्रेजी जड़-मूल से खत्म हो लेकिन आप सब गाँधी-गाँधी कर रहे हैं। वे तो बेचारे मर गए और और आप सब परेशान हैं उनको लेकर। देश के अन्य सवालों को हल करने की बजाय अपना समय मत खराब करिए राष्ट्रपिता में।
मेरे सभी सवालों के जवाब के लिए गाँधी पर जितने आलेख हैं उन्हें देख लें और जवाब दें तब आगे नहीं तो सब बकवास है……


अभी आत्मा की आवाज पर तो नहीं कहूंगा लेकिन गाँधी पर जरूर कुछ कहना चाहूंगा। बेचारे गाँधी जी को न दलितों ने माना, न हिन्दुओं ने और न मुसलमानों ने। फिर भी गाँधी बने हुए हैं और बने रहेंगे।

Bhushan said...
Pallavi Saxena has sent this comment by email:
जैसा की श्री चन्दन कुमार जी ने कहा है। मैं भी कहना चाहूंगी कि आत्मा के विषय में तो कुछ नहीं कहा जा सकता, हाँ गांधी जी और नथुराम गोडसे के बारे में जरूर इतना कहना है। कि वो भी इंसान बुरा नहीं था। यदि आपने India Today का वह अंक पढ़ा हो जो गोडसे पर ही आधारित था तो आप को जरूर पता चलेगा की वो भी बाकी के देश भक्तों के तरह ही एक देश प्रेमी था ,हाँ उसकी सोच कुछ अलग थी। मगर उसका देश प्रेम कम नहीं था। उस में लिखा था ,उसकी आस्तियां तब ही वेसर्जन की जाएँ जिस दिन सिंधु नदी तिरंगे के नीचे से बहने लगे ,जो आज तक न हो सका, और न ही आगे कभी होने कोई संभवना है ,मैं भी कई बार कई मामलों में गांधी जी को सही नहीं मानती,एक इस गोडसे के case में और दूसरा भगत सिंग के case में यदि उस वक़्त गांधी जी ने हस्ताक्षर नहीं किए होते तो भगत सिंग को फासी नहीं हुई होती। खैर यह मेरा मत है ....मगर सर आपने बहुत कम लिखा मेरी गुजारिश है आप से कि आप इस विषय पर और लिखें।

पल्लवी जी,
आपने इंडिया टुडे का जिक्र किया है वैसी बहुत सारी बातें हैं लेकिन शायद ही भरोसे के काबिल हैं। यहाँ तो गाँधी वध को सही ठहरानेवाले लोगों की भी कमी नहीं है। लेकिन मैं या आप सब जानते हैं कि गाँधी के मर जाने से देश को क्या मिल गया? जब मैं नाथूराम गोडसे का बयान पढ़ रहा था तब मुझे गुस्सा आता था कि नाथूराम एक पागल आदमी है, बार बार धर्म की दुहाई की दी है उसने। अन्तर बस यही हो जाता है कि एक को उन्होंने कहा कहते हैं और दूसरे को उसने कहा कहते हैं।
गाँधी वध पर कई किताबें हैं और सब बकवास किस्म की हैं। गाँधी ने भी अपने जीवन में जो सबसे बड़ी भूलें की हैं उनकी संख्या 4-5 ही है।
लेकिन भगतसिंह की बात हमेशा लोगों को गाँधी के खिलाफ़ भड़काने वालों ने कही है। यह बात तो भगतसिंह के भाई कुलतार सिंह भी कह गए हैं लेकिन किसी को 4अक्टूबर 1930 का पिता को भगतसिंह का लिखा पत्र और 22 मार्च 1931 को साथियों को लिखा पत्र नहीं दिखता। सम्भव हुआ तो इन दोनों को अपने ब्लाग पर कभी लाऊंगा।
और हाँ, इंडिया टुडे या किसी पर भरोसा नहीं करके शोध पर भरोसा किया जाना चाहिए। इस विषय पर जान बूझ कर कुछ लोगों द्वारा घृणा फैलाई जाती है। यह सम्भव है कि गोडसे अच्छा आदमी रहा हो लेकिन सनकी तो था ही।
कुछ युवाओं को गाँधी से नफ़रत सिर्फ़ इस वजह से है कि वे जवान नहीं हैं, अगर वे जवान होते और अंग्रेजी सूट पहनते तो उनकी इतनी आलोचना नहीं की जाती। लेकिन जहाँ गाँधी सोचते हैं, वहाँ कोई पहुँच पाए तब तो।
एक और चीज देखिए कि बेचारे गाँधी ही तो हैं जिनके उपर सारे आरोप लगाए जाते हैं, उनके स्मारकों के उपर कचरा साल भर पड़ा रहता है और सभी देखते रहते हैं- गांधी के पक्षधर भी! इस हिसाब से अच्छा ही है कि भगतसिंह के उतने स्मारक नहीं हैं वरन उनके उपर भी 363 दिनों तक गंदगी, मुरझाए सूखे फूल, पक्षियों की गंदगी ही होते!
गाँधी और भगतसिंह को समग्रता में जोड़कर देखने की जरूरत है।

5 टिप्‍पणियां:

  1. श्रीमान चन्दन मिश्र जी मैन आपकी टिप्पणीयां गाँधीजी वाले लेखों पर पढी ।आप गाँधी जी के पक्षधर हैँ ,तो सुनिए !गाँधी जी का सत्य व्यवहार जिसकी शिक्षा उन्हे बचपन मेँ ही हरिश्चन्द्र नाटक देख कर मिल ग ई थी ।मालाबार मेँ हिन्दुओँ की क्रूरता से हत्या करनेवाले मोपला मुसलमानोँ को वेँ शांति दूत श्रीमान चन्दन मिश्र जी मैने आपकी टिप्पणीयां गाँधीजी वाले लेखों पर पढी ।आप गाँधी जी के पक्षधर हैँ ,तो सुनिए !गाँधी जी का सत्य व्यवहार जिसकी शिक्षा उन्हे बचपन मेँ ही हरिश्चन्द्र नाटक देख कर मिल ग ई थी ।मालाबार मेँ हिन्दुओँ की क्रूरता से हत्या करनेवाले मोपला मुसलमानोँ को वेँ शांति दूत व भगत सिँह ,चन्द्र शेखर ,पं रामप्रसाद आदि को आतंकवादी कहते थे व भगत सिँह ,चन्द्र शेखर ,पं रामप्रसाद आदि को आतंकवादी कहते थे ।उन्होने मुसलमानो द्वारा मालाबार ,क्वेटा , मुलतान ,नोआखोली आदि स्थानो पर हिन्दुओं पर की गयी सामूहिक हिँसा पर कभी कुछ नही बोला ।स्वामी श्रद्धानन्द के शुद्धि कार्यक्रम के विरोध का असफल कुप्रयास किया व कराया ।स्वामी श्रद्धानन्द के हत्यारे अब्दुल रशीद को भाई अब्दुल रशीद कहा और उसका पक्ष लिया ।वेँ महात्मा कहलाते थे लेकिन क्रान्तिकारियोँ व सुभाष बाबू जैसे व्यक्तियोँ उनके हृदय मेँ व्यक्तिगत ईर्ष्या थी जो समय -समय पर परिलक्षित होती रही ।मुस्लिम तुष्टिकरण की नीव गाँधी ने डाली जो आज भी काँग्रेस की सदाबहार नीति है ।गाँधी ने मुसलमानो के लिए क्या नही किया (पाकिस्तान का निर्माण ,55करोड का दान , हिन्दु शरणार्थियोँ काअपमान , मुसलमानो का सम्मान ,फिर भी बापू महान ) गाँधी जी की सबसे बडी गलती थी कि जनसंख्या के आधार पर बाँट कर भू भाग दे देने के बाद भी मुसलमानोँ को यहाँ रोक कर रखना ।और रही बात देशभक्त वीर विनायक नत्थूराम गोडसे के सनकी होने की तो उनके अभियोग के एक न्यायधीश आत्माचरण जी गोडसे जी की प्रशंसा मेँ क्या लिखते हैँ पढकर देख लेना । लिख तो अधिक भी सकता हूँ लेकिन फोन से लिखने मेँ असुविधा होती है ।
    पं राकेश आर्य गाँधीजी वाले लेखों पर पढी ।आप गाँधी जी के पक्षधर हैँ ,तो सुनिए !गाँधी जी का सत्य व्यवहार जिसकी शिक्षा उन्हे बचपन मेँ ही हरिश्चन्द्र नाटक देख कर मिल ग ई थी ।मालाबार मेँ हिन्दुओँ की क्रूरता से हत्या करनेवाले मोपला मुसलमानोँ को वेँ शांति दूत श्रीमान चन्दन मिश्र जी मैने आपकी टिप्पणीयां गाँधीजी वाले लेखों पर पढी ।आप गाँधी जी के पक्षधर हैँ ,तो सुनिए !गाँधी जी का सत्य व्यवहार जिसकी शिक्षा उन्हे बचपन मेँ ही हरिश्चन्द्र नाटक देख कर मिल ग ई थी ।मालाबार मेँ हिन्दुओँ की क्रूरता से हत्या करनेवाले मोपला मुसलमानोँ को वेँ शांति दूत व भगत सिँह ,चन्द्र शेखर ,पं रामप्रसाद आदि को आतंकवादी कहते थे व भगत सिँह ,चन्द्र शेखर ,पं रामप्रसाद आदि को आतंकवादी कहते थे ।उन्होने मुसलमानो द्वारा मालाबार ,क्वेटा , मुलतान ,नोआखोली आदि स्थानो पर हिन्दुओं पर की गयी सामूहिक हिँसा पर कभी कुछ नही बोला ।स्वामी श्रद्धानन्द के शुद्धि कार्यक्रम के विरोध का असफल कुप्रयास किया व कराया ।स्वामी श्रद्धानन्द के हत्यारे अब्दुल रशीद को भाई अब्दुल रशीद कहा और उसका पक्ष लिया ।वेँ महात्मा कहलाते थे लेकिन क्रान्तिकारियोँ व सुभाष बाबू जैसे

    उत्तर देंहटाएं
  2. आदरणीय राकेश आर्य जी,

    आप यहाँ आए। इसके लिए धन्यवाद! लेकिन आपने जो कुछ कहा वह मेरी किसी बात का जवाब नहीं है। मैंने उपर जिन लिंकों के बारे में कहा है, आप उनका खंडन तथ्यों के आधार पर करें न कि भावावेश में बस गाँधी से द्वेष के कारण। मुस्लिम तुष्टिकरण और सावरकर के बारे या गोपाल गोडसे के बारे में जो कहा गया है वह गलत है, आप यह साबित करें। मैं गाँधी का कोई बड़ा पक्षधर नहीं हूँ। लेकिन उनके सार्वजनिक जीवन या उनमे सिद्धान्तों का प्रशंसक हूँ। विश्वजीत सिंह जी गाँधी जी पर बड़ा गहन चिन्तन और अध्ययन करने के बाद निष्कर्ष पर पहुँचे है, मैंने उनसे कई सवाल किए थे, लेकिन उनका जवाब अभी तक नहीं आया। नेताजी पर भी मैंने कुछ सवाल उठाए हैं, उनका जवाब दिया जाय महाशय, न कि गाँधी पर आरोप लगाने के लिए कुछ भी कह दिया जाय। गोडसे के पक्ष में लिखने वाले की मानसिकता भी गोडसे जैसी हो सकती है। वैसे आखिर गोडसे को मिल क्या गया?

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  3. आदरणीय श्री चंदन कुमार मिश्र भाई जी सादर वन्दे
    मैंने आपके कुछ ब्लॉग लेख पढें , यह जानकर प्रसन्नता हुई कि आप विचारधारा से नास्तिक तथा स्वदेशी व हिन्दी भाषा के प्रबल समर्थक है । सच्चा नास्तिक होना मनुष्य का एक दिव्य गुण है , इससे मनुष्य के अन्दर पक्षपात से रहित ज्ञान का प्रकाटय होता है । मैं पिछले कुछ दिनों से गांधी जी के अधखुले पन्नों के स्थान पर कुछ रचनात्मक लिखने का प्रयास कर रहा था , आज आपके ब्लॉग पर अपनी टिप्पणियाँ देखी तो फिर गांधी जी पर कलम चलाने को विवश होना पड रहा है । महाशक्ति के ब्लॉग पर सुझाये गये ब्लॉग के लिंकों पर अलग से दो - तीन लेख लिखने पडेगे । रही बात वीर गोडसे जी की तो गोडसे की मांग पर उनका चिकित्सीय परिक्षण हुआ था , जिसमें डॉक्टरों ने उन्हें पूर्ण स्वस्थ मस्तिष्क वाला घोषित किया था , इसका प्रमाणपत्र आज भी न्यायालय की फाईलों में दबा हुआ है । मैने वीर गोडसे के भतीजे श्री नाना गोडसे जी से उसकी प्रतिलिपी न्यायालय से निकलवाने हेतु कहा है , देखते है गोडसे की मैडिकल रिपोर्ट कब तक मिल पाती है । आप गांधी जी व हिन्दी भाषा के समर्थक है तो आपको शायद इतना तो पता ही होगा कि प्रारम्भ में हिन्दी के प्रबल समर्थक व प्रचारक रहे गांधी जी ने साम्प्रदायिक तुष्टिकरण हेतु हिन्दी के स्थान पर हिन्दुस्तानी ( उर्दू लिपि में लिखी जाने वाली ग्रामीण हिन्दी ) का प्रचार किये जाने की अपनी जिद न मानने पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन से त्यागपत्र दे दिया था और अपने मित्रों को साथ लेकर हिन्दुस्तानी का प्रचार करने लगे थे । खैर टिप्पणी लम्बी हो चली है अतः इस विषय पर भी एक लेख अलग से लिखना पडेगा ।
    भाई किसी का समर्थक होना अच्छी बात है । गलती किसी से भी हो सकती है गोडसे से भी गांधी से भी , लेकिन किसी एक के प्रति अन्ध श्रद्धा रखकर दूसरों को पागल कहना सही बात नहीं है । आप तो नास्तिक हो अतः स्वयं ही समझदार हो , आगे क्या कहूँ -
    वन्दे भारत मातरम्

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  4. आदरणीय विश्वजीत भाई,

    अगर थोड़े से सामाजिक और राजनीतिक हालातों को समझें तब उस समय मुसलमान पाकिस्तान में भी थे। यानि उर्दू के पक्षधर भी बहुत कम नहीं थे। और प्रेमचन्द भी हिन्दुस्तानी के पक्षधर थे। उर्दू को गैर भाषा नहीं है। उर्दू हिन्दी ही है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं। लिपि का प्रचलन तो हुआ और आज भी है। अरबी लिपि में लिखने मात्र से भाषा थोड़े ही बदलती है। आज भी लोग मोबाइल पर संदेश भेजते हैं रोमन में उससे वह भाषा हिन्दी न होकर अंग्रेजी नहीं हो सकती। भले वह बहुत ज्यादा प्रशंसनीय नहीं है। गाँधी जी के विचारों का न मैं कोई समर्थक हूँ और न विरोधी। लेकिन गोडसे की मानसिक स्थिति ठीक होने की बात मात्र से किसी काम को सही नहीं ठहराया जा सकता। उसने जो किया, उसका लाभ न मिला और न मिल सकता है। मानसिक हालत तो सारे भ्र्ष्टाचारियों और ठगों की भी कुछ बुरी नहीं होती, इसलिए चिकित्सकीय प्रमाण से उद्देश्य और लक्ष्य की स्पष्टता और ईमानदारी का पता नहीं चल सकता।

    अब मैं गोडसे का अपमान न करके आपका भी अपमान नहीं करना चाहता। गलती तो किसी से भी हो सकती है, सहमत हैं। मैंने गांधी पर ही कुछ कहा जब लगा कि एक बेजान बात को घसीटा जा रहा है वरना मुझे तो मार्क्स ही पसन्द हैं।

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  5. आदरणीय श्री चंदन कुमार मिश्र भाई जी आपने मेरी बात का संयमित भाषा में और सटीक उत्तर दिया , इसके लिए आपका हार्दिक आभार ।
    मैं आप की बात से सहमत हूँ , लेकिन गांधी जी के विषय पर अब आप ही निर्देश करे कि महाशक्ति जी के ब्लॉग पर आपने जो दो लिंक दिये है उन पर लेख लिखे जाये अथवा नहीं , क्योंकि विद्वेष से कुछ अच्छा नहीं होता , सृजनात्मक दृष्टिकोण से सभी कुछ अच्छा होता है ।

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