शुक्रवार, 24 जून 2011

कहीं यह इलेक्ट्रान ही भगवान तो नहीं है?


जिन लोगों ने थोड़ा सा भी विज्ञान पढ़ा है उन्होंने निश्चय ही परमाणु संरचना पढ़ी होगी। ईश्वर की सत्ता स्वीकार करनेवालों का कहना है कि ईश्वर कण-कण में विद्यमान है। हवा में भी, पानी में भी, जहर में भी, शराब में भी, दूध में भी, माटी में भी, आग में भी, कुर्सी में भी, आदमी में भी, लादेन में भी, जार्ज बुश में भी, मनमोहन सिंह में भी, कांग्रेस में भी, सोनिया गाँधी में भी, भगतसिंह में भी, सैंडर्स में भी, राबर्ट क्लाइव में भी, सिराजुद्दौला में भी, कमीने मीरजाफ़र में भी, आतंकवादी में भी, सेना में भी, भ्रष्टाचार में भी, भ्रष्टाचार के विरोध में लड़ने वाले में भी, चोर में भी कोतवाल में भी यानि हर जगह। क्या अद्भुत विचार है!

      अब देखिए चमत्कार। अगर स्विस बैंकों में पैसा लूट कर जमा करने वाले के लिए या भ्रष्टाचारी के लिए फाँसी की मांग की जाय तो फिर इसका का क्या अर्थ हुआ? यानि एक भगवान(भ्रष्टाचारी) को दूसरे भगवान(जल्लाद) भगवान(फाँसी) पर भगवान(अच्छे लोग) के आन्दोलन छेड़ने के चलते एक अन्य भगवान(न्यायाधीश यानि जज) के आदेश से चढ़ाएंगे। या दूसरा उदाहरण देखिए। कोई बलात्कारी(भगवान) एक निर्दोष लड़की(भगवान) से बलात्कार करे तो इसमें कुछ गलत नहीं है क्योंकि एक भगवान दूसरे भगवान के साथ कुछ भी करे, तो कोई बात नहीं। एक और उदाहरण और लेते हैं। मान लीजिए एक दो महीने का शिशु सोया है और घर में आग लग जाती है। बच्चा भी जलकर मर जाता है। यहाँ तो दोष बच्चे का ही था, क्यो? एक भगवान(आग) ने दूसरे भगवान(शिशु) को जलाकर मार डाला।
अब विज्ञान के नजरिए से इलेक्ट्रान ही सभी चीजों में हो सकता है या प्रोटान भी। लेकिन इलेक्ट्रान का ज्यादा बोलबाला है इसलिए हम यहाँ इलेक्ट्रान की बात करते हैं। और इलेक्ट्रान से किसी को झगड़ा भी नहीं है। इससे किसी को भी चाहे वह किसी धर्म का हो, कोई विरोध भी नहीं है। बिजली भी इलेक्ट्रान का प्रवाह मानी जाती है। यानि कण-कण में इलेक्ट्रान व्याप्त है। अब साबित तो यही होता है कण-कण में रहनेवाले भगवान या इलेक्ट्रान दोनों में कोई अन्तर नहीं है क्योंकि यही दोनों सर्वव्यापी कहे जाते हैं। अब एक इलेक्ट्रान दूसरे इलेक्ट्रान को कुछ भी करे किसी पर कोई फर्क तो पड़ता नहीं। बाकी बाद में……
     लेकिन अभी एक सवाल कहीं यह इलेक्ट्रान ही भगवान तो नहीं है?

3 टिप्‍पणियां:

  1. हमारे खट्टर काका तो इससे भी दस कदम आगे जाकर कहते हैं । अगर कण-कण में भगवान है तो काली की जगह साली का स्त्रोत क्यों नहीं पढते, चंड़ी की जगह .... का चरणामृत क्यों नहीं पीते ।

    भगवान की चर्चा

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  2. शब्‍द बदले से, लेकिन प्रश्‍न चिरंतन.
    आपकी टिप्‍पणियों के माध्‍यम से यहां तक आया.
    संयोग कि कल ही मैंने एक पोस्‍ट परमाणु लगाई है.

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