मंगलवार, 13 सितंबर 2011

सिर्फ़ एक बार (हिन्दी दिवस पर विशेष)


सब जानते होंगे कि ब्लागर ने पोस्ट के लिए संदेश शब्द अपनाया है। यह हिन्दी में ब्लागर का इस्तेमाल करने वाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं। लेकिन हमने पोस्ट को ही माना। ठीक यही हाल चिट्ठा शब्द का हुआ। जब पहली बार ब्लॉग के लिए इस शब्द का इस्तेमाल हुआ तब हिन्दी के कई नए शब्द उभरे जैसे- चिट्ठाकारी या चिट्ठेकारी, चिट्ठा-जगत, चिट्ठेकार आदि। लेकिन जैसा कि हम हिन्दी लोगों की आदत है, हमने अंग्रेजी शब्द को ऐसे स्वीकारा जैसे वह अमृत हो। शब्द तो कोई बुरा नहीं होता। लेकिन मैंने सुना है कि अंधे को सूरदास कहना अधिक सम्मानजनक है और उचित भी। आज कितने प्रतिशत ब्लॉगर चिट्ठा शब्द इस्तेमाल करते हैं? शायद बहुत कम। मैं स्वयं भी अधिकांशत: ब्लॉग शब्द का इस्तेमाल करता हूँ, चिट्ठे का कम। इसका कारण मैं स्वयं भी हूँ और अन्य लोग भी। शब्दों का भाषाओं में आना-जाना लगा रहता है लेकिन वह स्वाभाविक होता है। हमने जानबूझकर इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया है। उदारवाद हमेशा मूल रूप से खतरनाक साबित होता आया है, क्योंकि वह कहीं-न-कहीं नाव में छेद कर देता है। चाहे वह भाषा के मामले में हो या सुरक्षा के मामले में। उदार होने के साथ-साथ स्वयं के अस्तित्व को बनाए रखना भी अनिवार्य है।

      यह था आज का बकवासी बयान।

      14 सितम्बर कल है। सब जगह, अखबार में, ब्लॉग पर (और पता नहीं चैनलों पर क्या हाल है) हिन्दी का जोर चल रहा होगा। एक-से-एक विद्वान, अनुभवी और बड़े लोग इस विषय पर यानि हिन्दी दिवस पर या तो लिख चुके हैं या आज-कल में लिख डालेंगे। अब जरा एक मूर्ख और अनुभवहीन का भी लिखा उसी क्रम में आप देख लीजिए।
      1949 में जब 14 सितम्बर को हिन्दी को भारत की राजभाषा स्वीकार किया गया तब से लेकर आज तक हिन्दी के पक्ष में सारे काम सरकार करती आई है और लोग भी, आप यह जानते ही हैं! तो आइये हम भी हिन्दी के क्षरण-मरण(?) दिवस को मना ही लेते हैं।
      हमारे यहाँ रवींद्र कालिया, सुधीश पचौरी, प्रसून जोशी जैसे लोग भी खुश हैं हिन्दी की हालत से, जिनका खाना-पीना ही हिन्दी से चलता है। विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों ने कितना काम किया है, यह इसी से साफ होता है कि महीने में एक लाख रुपये तक या अधिक ही, उनकी जेब में तनख्वाह के रूप में आते हैं। हिन्दी दिवस हो या प्रेमचन्द जयन्ती, बड़े जोर-शोर से मना लिया जाता है इनके द्वारा। निजी स्कूलों में तो हिन्दी के शिक्षक होते ही हैं अंग्रेजी का प्रसार करने के लिए। अब इसमें बेचारगी है या आवारगी, यह तो वे ही जानें? और ये सारे हिन्दी के नाम पर खाने वाले लोग 364 दिन तक हिन्दी के लिए क्या करते हैं, यह आप भी जानते हैं और हम भी। सब के अन्दर आज-कल हिन्दी-प्रेम उमड़ रहा होगा। तो आइए, हम हिन्दी का अन्तिम संस्कार होने से पहले रो-गा लें।

आप अगर हिन्दी को लेकर चली 1948 और 1949 की पूरी बहस पढ़ें, तो स्वयं जान लेंगे कि हिन्दी को लेकर तथाकथित महान लोगों के कैसे विचार थे? कैसे-कैसे दोमुँहे लोग संविधान-सभा में बैठते थे और बोलते थे, यह सब आप उस बहस से जान सकते हैं। अन्तर्जाल पर अंग्रेजी में मौजूद है वह हिन्दी वाली बहस। 

अब इसी क्रम में जरा दो धुरंधरों की बात यहाँ रख देता हूँ। पहले राममनोहर लोहिया और दूसरे हरिशंकर परसाई।

"अंग्रेजी राज्य के खत्म होने पर भाषा का सवाल उग्र रूप से उठा। अगर मध्यदेशियों में शिवाजी या सुभाष बोस जैसा बड़प्पन होता तो अंग्रेजी हटाने और हिंदी चलाने के लिए समय-सीमा की बात कभी सोची या स्वीकारी नहीं जाती। 1950 में 1965 की सीमा बाँधना महान मूर्खता और महान क्षुद्रता थी। जो कोई उस  समय के शक्तिशाली राजपुरुष थे, अच्छी तरह देख रहे थे कि समय के प्रवाह से अंग्रेजी का मामला सुधरेगा और हिंदी का बिगड़ेगा। कसम और संकलो की लड़ाई थी। कसम खाते थे हिंदी के लिए और संकल्प रहता था अंग्रेजी को चलाते रहने के लिए। ऐसी हालत में कसम खाली रस्मी और ऊपरी रह जाती है। सब काम कसम से उलटा होता रहा हैसमय-सीमा बाँधने की जरूरत हुई, एक इसलिए कि हिंदी को समृद्ध बनाना है, दो, इसलिए कि इसे तट देश की स्वीकृति, प्रचार इत्यादि के जरिए दिलाना है।
- राम मनोहर लोहिया
भाषा, भूमिका, पृ 9-10

और कितने लोग समझते हैं कि सरकारों ने हिन्दी के लिए बड़ा भारी काम किया है, तो यह देखिए-

प्रगति जो पर्याप्त नहीं हुई है, उसका कारण स्वयं सरकार है। सन् 1965 में हिंदी को अंग्रेजी का स्थान लेना है- जब यह विधान में स्पष्ट अंकित है तब भारत के शिक्षा मंत्रालय ने इस ओर कितने और कितने बेमन से कदम बढ़ाए हैं।
- हरिशंकर परसाई
परसाई रचनावली, खण्ड-6, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, वर्ष 1, अंक 7, नवम्बर 1956, पृ 154

इस बार पढ़वानी तो कविता थी लेकिन भाषण अधिक हो गया। कविता पाँच साल पहले लिखी गई थी। विचारों में परिवर्तन आया है, आना चाहिए।

सिर्फ़ एक बार

364 दिन
किसी को याद आती है?
अपने जन्मदिन की ।
साल में एक दिन आता है
जन्मदिन
उत्सव का दिन ।
आज 14 सितम्बर है
शायद !
आज ही आता है वो
हिन्दी डे ।
क्या ये सब डे मनाना जरूरी है?
लोग भी सिर्फ़ बिना मतलब के काम किया करते हैं ।
क्यों है न अंकल !

हमारे सर कहा करते हैं-
एक बूढ़ा था ।
जिस दिन हम आजाद हुए न !
उसी दिन की बात है
आई मिन फिफ्टिन्थ् अगस्त नाइन्टीन फोर्टी सेवन की ।
उसने कहा- दुनिया को खबर कर दो
कि गाँधी को अंग्रेजी नहीं आती ।
तो जितने भी विदेश प्रेमी थे न !
उन्होंने कहा- चुप बे !
तू सच बोलता है ।
तुझे नहीं आती होगी ।
देख, मैं तुझे सिखाता हूँ
और शुरु हो गयी अंग्रेजी ।
एक छोटे-से गाँव के स्कूल के लड़के ने
एक आदमी से कहा ।

उस आदमी ने लड़के से पूछा-
का कहते हो बबुआ? हम त कुछ समझ ही नहीं पाया ।
     
वह आदमी ठीक से
हिंदी भी नहीं जानता था ।

यह दृश्य है हिंदी-दिवस का
भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी के
हिंदी-दिवस का ।

आज सुबह अखबार में कुछ लोगों ने कहा है- हिंदी दिवस मनाने -की कोई जरुरत नहीं लगती ।
उनसे हिंदी पूछ रही है
टूटी झोंपड़ी में खड़ी होकर
निराला, पंत, दिनकर, महादेवी, भारतेंदु, प्रसाद, प्रेमचंद की
किताबों से निकलकर
अंग्रेजी के गगनचुम्बी इमारत के सामने ।

जब प्यार सब दिन करते हो तो
यह वैलेंटाइन-डे क्यों मनाते हो? तुम तो 59 साल पहले आजाद हो चुके हो
फिर ये 15 अगस्त मनाते हो
आखिर किसलिए?

ये क्या? सुनते ही तुम्हें नींद आने लगी ! हाँ आनी चाहिए, मां की लोरी जो है?

एक बार
सिर्फ़ एक बार
मेरी झोंपड़ी में आके तो देखो मेरे बच्चों ।
( आंसू बहने लगे
हिंदी की आंखों से )
कैसे-कैसे पकवान बनाकर रखे हैं
मैंने तेरे लिए
अपनी संतान के लिए ।

मैंने सैकड़ों वर्ष से
दीपक जलाये रखे हैं
केवल तुम्हारे लिए ।
बत्ती लगभग जल चुकी है
अब भय है कहीं बुझ न जाए
पर मेरे बच्चों, भरोसा नहीं टूटा है तुमपर से
माँ हूँ
कुछ भी करोगे
माफ़ कर दूंगी ।
लेकिन तुम सच्चे दिल से
मेरी गोद में तो आ !
सिर्फ़ एक बार
तुझे माफ़ कर दूंगी
तुझे अपार स्नेह दूंगी ।
लेकिन आओ तो एक बार भी
मेरी सुनने ।
-14.09.06 

17 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा ||

    बहुत खुबसूरत अभिव्यक्ति ||

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  2. सहज सामयिक मुद्दा उठाया है आपने -यह भारत की सबसे बड़ी विडम्बना है कि यहाँ कोई राष्ट्रभाषा नहीं है -२२ भाषायें(एकाधिक कम बेसी ) हैं जिन्हें संविधान की मान्यता मिली हुयी है -हमारी अभिव्यक्ति ही विभाजित कुंठित है -हर कोई अपनी अपनी भाषाई राग अलाप रहा है ..यह सचमुच बहुत दुखद है -क्या यह परिदृश्य बदलेगा! ?

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  3. हिंदी का क्षरण-मरण? दिवस मना ही लेते हैं...
    बढ़िया...

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  4. यह हमारा दुर्भाग्य है की हिंदी के लिए एक दिन , एक सप्ताह या एक पखवाड़ा ही होता है सार्थक पोस्ट चन्दन जी आभार

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  5. हिंदी की जय बोल |
    मन की गांठे खोल ||

    विश्व-हाट में शीघ्र-
    बाजे बम-बम ढोल |

    सरस-सरलतम-मधुरिम
    जैसे चाहे तोल |

    जो भी सीखे हिंदी-
    घूमे वो भू-गोल |

    उन्नति गर चाहे बन्दा-
    ले जाये बिन मोल ||

    हिंदी की जय बोल |
    हिंदी की जय बोल |

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  6. चंदन जी आपने विश्लेषण अच्छा किया है। कुछ बातों से असहमति हो तो भी, आलेख अच्छा लगा।
    यह राजभाषा हिन्दी दिवस है, इसको उस संदर्भ में भी देखें, और इस संदर्भ में भी कि सरकार के पास देश की अन्य भाषाओं के साथ साथ इसको भी देखना है।
    भाषा को उसका स्थान उसे समझने वालों से प्राप्त होता है, बोलने वालों से नहीं। यही कारण है कि हिंदी की स्थिति अन्य भाषाओं के मुकाबले विशिष्ट हो जाती है। स्वाभाविक रूपसे इस बहुभाषी देश में उसे ही राजकाज की भाषा मानकर इसे राजभाषा का दर्जा दिया गया। हर वर्ष हिंदी दिवस के अवसर पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करके सरकारी विभा़ग अपने को भाषा और संचार की मुख्य धारा से जोड़ता है। सरकारी संस्थाओं का ज्यों-ज्यों आम जनता से संपर्क बढ़ता जाएगा त्यों-त्यों उन पर हिंदी का दबाव भी बढ़ता जाएगा। जैसे-जैसे आम जनता की पहुंच प्रशासन के गलियारों में बनती जाएगी हिंदी के लिए अपने आप जगह बनती जाएगी।
    इस संदर्भ में देखें।

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  7. आदरणीय मनोज जी,

    क्या यह गलत है भाषा मतलब हिन्दी को उसका स्थान कम से कम हिन्दी प्रदेशों में अगर नहीं मिल पाया, तो उसका कारण सरकार ही है। बोलचाल के रूप में भाषा तो चल रही है चाहे लंगड़ाकर या जैसे भी हो। लेकिन जब तक उच्च शिक्षा से, रोजगार से, विज्ञान से, तकनीक से हिन्दी ठीक से नहीं जुड़ती तब तक क्या भला होगा इसका? न्यायालयों से लेकर शिक्षा तक कहीं भी अंग्रेजी का राज्य बरकरार किसने किया है? क्या सरकारी संस्थाओं से यह उम्मीद की जा सकती है, कम से कम वर्तमान समय में, कि वह हिन्दी को जनता से जोड़ेंगी। नहीं, मुझे तो नहीं लगता। अभी हाल में मैंने राष्ट्रपति सचिवालय के आनलाइन सहायता-साइट पर एक सवाल किया तो उसका जवाब आया था-एक्शन नाट रिक्वायर्ड। वह सवाल हिन्दी के संबंध में था। और भारत सरकार की सारी साइटों में कितनी साइटें भारत की आम जनता समझ सकती है। और अगर नहीं समझ सकती तो क्या यह बात उन संस्थाओं को पता नहीं है? और है, तो क्यों ऐसा हाल है?

    अगर कड़वी बात आती है या कुछ रुखी बातें लिख जाता हूँ, तो वह अकारण नहीं है। आशा है, आप इसका सही अर्थ लगाएंगे। आप आए, इसके लिए धन्यवाद!

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  8. Bhai Tera tala tut gya - mager mane ap ki koi post copy nahi ki mein tho ap ko bata raha tha ki internet per kuch bhi suraksit nahi hai ok take care

    सब जानते होंगे कि ब्लागर ने पोस्ट के लिए संदेश शब्द अपनाया है। यह हिन्दी में ब्लागर का इस्तेमाल करने वाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं। लेकिन हमने पोस्ट को ही माना। ठीक यही हाल चिट्ठा शब्द का हुआ। जब पहली बार ब्लॉग के लिए इस शब्द का इस्तेमाल हुआ तब हिन्दी के कई नए शब्द उभरे जैसे- चिट्ठाकारी या चिट्ठेकारी, चिट्ठा-जगत, चिट्ठेकार आदि। लेकिन जैसा कि हम हिन्दी लोगों की आदत है, हमने अंग्रेजी शब्द को ऐसे स्वीकारा जैसे वह अमृत हो। शब्द तो कोई बुरा नहीं होता। लेकिन मैंने सुना है कि अंधे को सूरदास कहना अधिक सम्मानजनक है और उचित भी। आज कितने प्रतिशत ब्लॉगर चिट्ठा शब्द इस्तेमाल करते हैं? शायद बहुत कम। मैं स्वयं भी अधिकांशत: ब्लॉग शब्द का इस्तेमाल करता हूँ, चिट्ठे का कम। इसका कारण मैं स्वयं भी हूँ और अन्य लोग भी। शब्दों का भाषाओं में आना-जाना लगा रहता है लेकिन वह स्वाभाविक होता है। हमने जानबूझकर इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया है। उदारवाद हमेशा मूल रूप से खतरनाक साबित होता आया है, क्योंकि वह कहीं-न-कहीं नाव में छेद कर देता है। चाहे वह भाषा के मामले में हो या सुरक्षा के मामले में। उदार होने के साथ-साथ स्वयं के अस्तित्व को बनाए रखना भी अनिवार्य है।..............

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  9. चंदन कुमार जी!
    आपकी साइट पर आया तो लगा कि आग है सीने में, कुछ न कुछ तो जलाकर ही रहेगी। अतः आपके विचार से कुछ लोग तो जले ही हैं। कुछ को तपिश महसूस हुई होगी, कुछ को ऊर्जा मिली होगी, कुछ प्रकाशित हुए होंगे। मैं भी पिछले 40 साल से हिंदी में काम, अनुवाद व लेखन कार्य से जुड़ा रहा। गो. प. नेने, विश्वनाथ दिनकर नरवणे, गोविंद मिश्र, शंकर शेष, डॉ. राजेंद्र यादव, डॉ. वेद प्रताप वैदिक, डॉ. योगेंद्र यादव समेत अनेक हस्तियों से मिला और विचार विमर्श हुआ पर किसी ने भी यह नहीं कहा कि हिंदी आ पाएगी। केंद्रीय हिंदी समिति के एक दो सदस्यों से भी मिला। राजभाषा विभाग, प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, कांग्रेस के महा सचिव राहुल गांधी को पत्र लिखकर समस्या बताई परंतु या तो जवाब नहीं मिले या मिले तो गोल मोल जवाब ही मिले। अतः अन्यत्र ऊर्जा बर्बाद करने के बजाय हिंदी में कुछ लिखने या जब भी अवसर मिलता है हिंदी के बारे में फैली भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास करता हूं। अतः इस रास्ते में आपसे संपर्क उपयोगी और सार्थक लगा।

    आपने कुछ लिंक भेजे थे। उनमें से योगेंद्र जोशी जी से तो मेल द्वारा विचार विनिमय भी हुआ। समयाभाव व पारिवारिक दायित्वों के कारण ज़्यादा नहीं कर पा रहा हूं। परंतु प्रयासरत हूं। आपको साधुवाद। लगे रहें।

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  10. आदरणीय डॉ दलसिंगार यादव जी,

    आपने जिन हस्तियों का उल्लेख किया है, उनमें से मैं अधिकांश को तो नहीं जानता। लेकिन एक वेद प्रताप वैदिक का नाम आया तो कुछ कहने की इच्छा है। कुछ दिन पहले वैदिक जी से सम्पर्क हुआ। लेकिन उनका रवैया भी ठीक नहीं लगा। मैं उनपर आरोप तो नहीं लगा सकता क्योंकि कुछ ऐसे काम उन्होंने किए हैं, जो महत्वपूर्ण थे। लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मुझे निराशा हाथ लगी।

    मुझे समाधान दो तरह का दिखता है। पहला तो राजनैतिक है और दूसरा कूटनीतिक।

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  11. http://www.testmanojiofs.com/2011/09/blog-post_14.html

    http://krantiswar.blogspot.com/2011/09/blog-post_14.html

    http://safedghar.blogspot.com/2011/09/blog-post_13.html?showComment=1315918210566 यहाँ भी पाठक जा सकते हैं।

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  12. बेनामी जी,

    पता है कि कुछ सुरक्षित नहीं। आप बेनामी होकर क्यों बोल गये? गिरफ़्तार तो नहीं किया जाता आपको। कोई बहादुरी नहीं कर गये हैं आप। ये काम तो हम भी कर सकते हैं जी।

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  13. are bhi बेनामी जी,

    hone ka matlab ye nahi tha mujhe pata hai aap bhi ye kar sakte hai

    jo bhi internet per har roj kam karta hai tho wo ye sub kuch kar sakta hai mager mein ap ko ye nahi dekha raha tha ki mane koi Bada kam kar diya bush mein ap ko dekha raha tha ki internet per kuch bhi save bahi hai "keep it up" take care

    wase ap ka blog acha hai bahut

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  14. are nahi yaar wase mera name rajan hai

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  15. ठीक है बेनामी भाई। आप फेसबुक से होकर आते रहिए। लेकिन आप इस लेख पर आते हैं, ये बात तो है।

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