रविवार, 25 सितंबर 2011

हिमालय किधर है?


केदारनाथ सिंह की एक कविता है। पता नहीं पूरी है या अधूरी है? उसका शीर्षक क्या है, यह भी पता नहीं। कल वह पढ़ने को मिली। बहुत छोटी कविता है। ऐसा लिखा था वहाँ कि, वह दिशा: प्रतिनिधि कविताएँ से ली गई थी। यहाँ पढ़ते हैं उस कविता को, फिर उनकी दो कविताएँ और पढ़ते हैं। मुझे तो यह कविता पूरी लगती है।

हिमालय किधर है?
मैंने उस बच्चे से पूछा जो स्कूल के बाहर
पतंग उड़ा रहा था

उधर-उधर उसने कहा
जिधर उसकी पतंग भागी जा रही थी

मैं स्वीकार करूँ
मैंने पहली बार जाना
हिमालय किधर है!

      दूसरी कविता है, शायद इसका शीर्षक है- नूर मियाँ, अब उसे देखते हैं।

तुम्हें नूर मियाँ याद है केदारनाथ सिंह?
गेहुँए नूर मियाँ
ठिगने नूर मियाँ
रामगढ़ बाजार से सुर्मा बेचकर
सबसे अखीर में लौटने वाले नूर मियाँ
क्या तुम्हें कुछ भी याद है केदारनाथ सिंह?

तुम्हें याद है मदरसा
इमली का पेड़
इमामबाड़ा
तुम्हें याद है शुरू से अखीर तक
उन्नीस का पहाड़ा
क्या तुम भूली हुई स्लेट पर
जोड़-घटा कर
यह निकाल सकते हो
कि एक दिन अचानक तुम्हारी बस्ती को छोड़कर
क्यों चले गए थे नूर मियाँ
क्या तुम्हें पता है
इस समय वे कहाँ हैं
ढाका
या मुल्तान में?
क्या तुम बता सकते हो
हर साल कितने पत्ते गिरते हैं
पाकिस्तान में?

तुम चुप क्यों हो केदारनाथ सिंह
क्या तुम्हारा गणित कमजोर है?

      केदारनाथ सिंह की एक और कविता है- जगरनाथ। यह भी व्यक्ति-चित्र है। यहाँ यह न समझ लिया जाय कि केदारनाथ सिंह मेरे बहुत प्रिय कवि हैं। उनकी दस कविताएँ भी नहीं पढ़ी मैंने। अच्छा…छोड़िए…अब पढ़िए जगरनाथ

जगरनाथ

कैसे हो मेरे भाई जगरनाथ ?
कितने बरस बाद तुम्हें देख रहा हूँ
यह गुम्मट-सा क्या उग आया है
तुम्हारे ललाट पर?
बच्चे कैसे हैं?
कैसा है वह नीम का पेड़
जहाँ बँधती थी तुम्हारी बकरी ?
मैं ?
मैं तो बस ठीक ही हूँ
खाता हूँ
पीता हूँ
बक-बक कर आता हूँ क्लास में
यदि मिल गया समय तो दिन में भी
मार ही लेता हूँ दो-एक झपकी
पर हमेशा लगता है मेरे भाई
कि कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है
पर छोड़ो तुम कैसे हो ?
कैसा चल रहा है कामधाम ?
अरे वो ?
उसे जाने दो
वह बनसुग्गों की पाँत थी
जो अभी-अभी उड़ गई हमारे ऊपर से
वह है तो है
नहीं है तो भी चलती रहती है जिंदगी
पर यह भी सच है मेरे भाई
कि कई दिनों बाद
यदि आसमान में कहीं दिख जाय
एक हिलता हुआ लाल या पीला-सा डैना
तो बड़ी राहत मिलती है जी को
पर यह तो बताओ
तुम्हारा जी कैसा है आजकल ?
क्या इधर बारिश हुई थी ?
क्या शुरू हो गया है आमों का पकना ?
यह एक अजब-सा फल है मेरे भाई
सोचो तो एक स्वाद और खुशबू से
भर जाती है दुनिया
पर यह क्या ?
तुम्हारे होंठ फड़क क्यों रहे हैं ?
तुम अब तक चुप क्यों हो मेरे भाई ?
जरा पास आओ
मुझे बहुत कुछ कहना है
अरे, तुम इस तरह खड़े क्यों हो ?
क्यों मुझे देख रहे हो इस तरह ?
क्या मेरे शब्दों से आ रही है
झूठ की गंध ?
क्या तुम्हें जल्दी है ?
क्या जाना है काम पर ?
तो जाओ
जाओ मेरे भाई
रोकूँगा नहीं
जाओ………जाओ………

और इस तरह
वह चला जा रहा था
मुझे न देखता हुआ
और उस न देखने की धार से
मुझे चीरता-फाड़ता हुआ
मेरा बचपन का साथी
जगरनाथ………!

7 टिप्‍पणियां:

  1. मैं स्वीकार करूं
    मैंने पहली बार जाना
    हिमालय किधर है...

    केदारनाथ सिंह की कविताएं काफ़ी प्रभावित करती हैं...
    वे स्थापित कवि तो खैर हैं ही...

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  2. रोजमर्रा को लाग-लपेट से बचा लेना भी कविता को जन्‍म दे सकता है.

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  3. केदार को जब भी पढ़ा प्रभावित हुए बिना नहीं रहा।

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