गुरुवार, 10 नवंबर 2011

पैसा, वेतन, बिहार सरकार, आडवाणी की यात्रा …गड्डमड्ड बातें बिहार की ( पहला भाग )


(पैसा, वेतन, नीतीश कुमार, बिहार सरकार, प्रभात खबर, अंग्रेजी, निजी स्कूल, संसद, सांसदों के वेतन, आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी जनचेतना यात्रा…सब कुछ गड्डमड्ड हैं इस लेख में। इस लेख में सुसंगठित होना मेरे लिए सम्भव नहीं था। इसके लिए माफ़ी चाहता हूँ।)

प्रभात खबर के तमाशे

बिहार में इन दिनों मीडिया सुशील कुमार के पीछे पगलाया हुआ है। वही सुशील जिन्होंने कौन बनेगा करोड़पति में पाँच करोड़ रूपये जीते हैं। प्रभात खबर ने तो एक दिन के लिए अतिथि सम्पादक ही बना डाला है। बिहार सरकार मनरेगा का ब्रांड एम्बेसडर बनाना चाहती है। ऐसी खबर भी सुनने में आई। वही बिहार सरकार जो छह हजार रूपये की तनख्वाह सुशील को देती है।

अंग्रेजी के यशोगान का मंत्र बँचवाता प्रभात खबर

      एक तमाशा और मुझे परेशान करता है प्रभात खबर का। इन दिनों यह अखबार अंग्रेजी के स्तुति-गान के साथ रंगीन विज्ञापन कर रहा है और आईआईटी के श्रीश चौधरी के लिखे लेख को टुकड़ों में छाप रहा है। जैसा कि हमेशा होता है, भारत में भाषायी उदारता की बात सिर्फ़ अंग्रेजी के लिए होती है, इसी घोल के साथ श्रीश प्रभात खबर में दिख रहे हैं। साफ बात यह है कि अब हमारे यहाँ अंग्रेजी व्याकरण के किताबों की कमी पड़ गई है क्योंकि बड़े हिन्दी अखबार अंग्रेजी व्याकरण, शब्दावली आदि सीखा रहे हैं। सबूत के लिए आप अखबारों को देख भी सकते हैं। बस यही काम प्रभात खबर को करना है। उसे अंग्रेजी भाषा और व्याकरण के स्तंभ को शुरू करना है और इसके लिए वह लम्बी भूमिका बाँधते हुए पाठकों को श्रीश के लेख के साथ अंग्रेजी का घोल पिला रहा है,
अंग्रेजी के यशोगान के मंत्र बँचवा रहा है।

बिहार सरकार की तरक्की अंग्रेजी छापकर
    
संयोग से मुझे 1963 के मैट्रिक का प्रमाण पत्र हाल ही में देखने को मिल गया। आज से 48 साल पहले के उस प्रमाण पत्र में सब कुछ हिन्दी में छपा था। इसकी तुलना में अब के प्रमाणपत्र की हालत देखते हैं। मैट्रिक में अंक पत्र, मूल प्रमाण पत्र से लेकर स्नातकोत्तर तक के प्रमाण पत्रों में अंग्रेजी छाई हुई है। अंक-पत्रों में तो सिर्फ़ अंग्रेजी है। अभी हाल में लगभग 30 लाख लोगों ने शिक्षक पात्रता परीक्षा के लिए आवेदन किया है। आवेदन-पत्र में सब कुछ अंग्रेजी में लिखना था। इंटर परीक्षा के लिए जो आवेदन-पत्र भरे जा रहे हैं, उनमें भी अंग्रेजी के सिवा कुछ नहीं दिखता। हाँ, प्रतीक-चिन्ह यानी लोगो एक अपवाद है। हिन्दीभाषी राज्य के कई विभागों के विज्ञापन भी अंग्रेजी में अखबार में दिखते रहते हैं। बिजली बिल तो पूर्णत: अंग्रेजी में ही छपता है। अगर गिनने-देखने बैठ जाएँ तो यह सूची बहुत लम्बी हो जाएगी।
तकनीक के नाम पर या आधुनिक बनने के नाम पर हर जगह अंग्रेजी का मतलब साफ है कि सरकार बहुत पीछे हैं। अस्सी के दशक से ही हिन्दी की सुविधा कम्प्यूटर में मौजूद रही है। लेकिन हमारी सरकार आज तक बीस साल पहले के साफ्टवेयर या तकनीक का सहारा लेकर अपने को उच्च तकनीक से लैस मानती है। सबूत के लिए रेलवे टिकटों आदि का ही साफ्टवेयर देख लें, उसमें छपे अक्षरों का फांट देख लें। विज्ञापन नहीं देखना है, टिकट का काम वाला हिस्सा देखना है।
यही हाल इंटर की पढ़ाई के लिए कर दिया गया है। अब 500 अंकों की परीक्षा में हिन्दी मात्र पचास अंक तक आ चुकी है( अलग तरीके से पहले भी थी)। कुछ साल और देखिए, शायद बाहर भी कर दी जाय। अंग्रेजी की सेवा में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।
    
वेतन और बत्तीसी मामला पर बिहार सरकार और उसके मुखिया

      अब यहाँ समझ में नहीं आता कि सुशील कुमार के पाँच करोड़ रूपये (जो परिष्कृत जुए में जीते गए हैं) जीतने का अतिथि सम्पादक बनाने या ब्रांड एम्बेसडर बनाने से किस महान विचारधारा या आदर्श के तहत क्या सम्बन्ध है? इसे हम प्रभात खबर वालों की बुद्धि का प्रयोग मानें या मीडिया के सनकीपन का परिणाम?
            यहाँ जरा हटकर बिहार सरकार मतलब नीतीश सरकार के वेतन व्यवस्था पर बात करते हैं। कुछ दिन पहले जब केंद्र सरकार ने 26-32 वाली बात कही थी तब नीतीश कुमार ने भी इसे गलत ठहराया था और इस बयान से मीडिया में उनके महानता की छवि दिखाई जानी थी ही। जरा देखते हैं कि क्या दस रूपये तनख्वाह देने वाले शासक को यह अधिकार है कि वह दस रूपये की तनख्वाह की आलोचना करे? बिहार में पिछले छह सालों में अधिकांश नियुक्तियाँ छह हजार वाली ही हैं। अब जरा अनुमान लगाइए कि पटना या किसी जिला मुख्यालय में, जो कि शहर हैं, में एक व्यक्ति जिसकी तनख्वाह छह हजार है, उसके परिवार की स्थिति क्या होनी चाहिए। अगर परिवार में छह सदस्य हों या पाँच सदस्य हों (नौकरीपेशा, उसकी पत्नी, दो बच्चे, माँ-बाप) तब 6000/6=1000 प्रति माह। 1000/30=33 रूपये प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति आय हुई। और पाँच सदस्य मानें तब
      6000/(5*30)=40 रूपये प्रति व्यक्ति प्रति दिन।
अगर पटना की बात करें तब 6000 की कीमत का अन्दाजा नीतीश कुमार स्वयं लगा लें।
     अब बताइए कि 32 रूपये केंद्र सरकार ने बताए थे और यहाँ 33 या 40 रूपये दिए जाते हैं, साक्षर कहकर, यह कहकर कि सरकार ने रोजगार बढ़ाया है, बेरोजगारी घटी है। फिर नीतीश कुमार को 32 के हिसाब की आलोचना करनी चाहिए? क्या आलोचना से पहले उस मुद्दे पर वे खुद आलोचना के लायक नहीं, कम-से-कम तब जब आप राज्य के मुखिया हैं। विधायक निधि खत्म कर के हीरो और महान की छवि तो नीतीश कुमार ने पहले ही बना ली है लेकिन मुख्यमंत्री निधि का गठन या मंत्रियों को जिलों का अभिभावक बनाने जैसे कदम पर मीडिया ने चुप्पी क्यों साधी, नरम रुख क्यों अपनाया? कुछ दिनों पहले मंत्रियों के रिश्तेदारों को जमीन बहुत कम कीमत पर आवंटित किए गए थे, शोर मचाया गया, जाँच हुई और अन्त में कहा गया कि जिन्हें दिया गया है, वे उसके काबिल थे। अब सोचने की बात है कि सिर्फ़ मंत्रियों, विधायकों या बड़े नेताओं के बेटे-बेटियाँ और रिश्तेदार ही काबिल होते हैं?
      कम-से-कम मुझे तो नहीं लगता कि नीतीश कुमार 32 रूपये की बात पर उंगली उठाने के अधिकारी हैं।


वापस वेतन पर…

हाँ, वेतन की बात पर आते हैं। बिहार में एक उच्च विद्यालय में एक शिक्षक की तनख्वाह 7- 8 हजार, दूसरे की पच्चीस हजार हर जगह देखने को मिलेगी। ऐसे एक और मामले पर यहाँ लिखा था मैंने।  
      कुछ दिन पहले पटना जिले के सरकारी कार्यालय में तो अपने कम्प्यूटर, माडेम और प्रिंटर के साथ नौकरी करने पर भी तनख्वाह 4-5 हजार दी जाएगी, ऐसी विज्ञाप्ति दिखी थी।
      विधायकों और सांसदों के वेतन पर किसी को चिन्ता नहीं होती। इसी बिहार सरकार के 30 से अधिक ईमानदार भाजपा और जदयू सांसदों में से एक ने भी संसद में इस बात की चिन्ता जाहिर नहीं की कि उनके वेतन बढ़ाने से देश पर करोड़ों रूपये का अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा। लेकिन केंद्र सरकार या कांग्रेस के खिलाफ़ गीत गाने में खूब मजा आता है इन लोगों को। अन्नामय माहौल में संसद में शिवानन्द तिवारी को नीतीश कुमार और बिहार सरकार के महान कार्यों का ढोल खूब जोर-जोर से पीटते देखा गया। वे भी जदयू के सांसद हैं।
      बात साफ है कि किसी को हजार, किसी को दो हजार वेतन देने वाला व्यक्ति किसी तरह से इस योग्य नहीं कि उसी के जैसा काम करने वाले पर दोषारोपण करे, कम-से-कम सत्ताधीश होने पर तो अवश्य ही। वेतन पर और भी बातें हैं, जिन्हें बाद में कभी रखूंगा।

आडवाणी की यात्रा पर कुछ…

भ्रष्टाचार विरोध की यात्रा की शुरूआत में ही भ्रष्टाचार का पैसा खर्च किया जा चुका है, जिसका जिक्र जेपी वाले लेख में मैंने किया था। भ्रष्टाचार का पैसा इसलिए कहा क्योंकि सब जानते हैं करोड़ में खर्च करने वाले भी करोड़पति, उद्योगपति या अमीर होते हैं, वे ही किसी राजनैतिक पार्टी को लाख या करोड़ में चंदा दे सकते हैं, वरना किसी पार्टी की हैसियत इतनी कहाँ कि वह कभी हवाई जहाज से अपने नेताओं को यात्रा करवाए।
    इस यात्रा की शुरूआत छपरा से हुई थी। सोचने की एक बात और है कि क्या इतनी सुरक्षा व्यवस्था आदि का इन्तजाम नीतीश लालू की किसी सभा, यात्रा आदि के लिए करते। सारे अधिकारियों को, पुलिस की बहुत बड़ी संख्या को इस यात्रा में झोंका गया था। अनुमंडलों के उच्च अधिकारी भी सेवा में हाजिर थे और वह भी उस अनुमंडल में जहाँ के अधिकारी वे थे ही नहीं। 


(अगला भाग कल…)

4 टिप्‍पणियां:

  1. राजनीतिक और प्रशासनिक सोच अभी भी अंग्रेज़ों की ऋणी है. रंग को छोड़ दें तो अंग्रेज़ों से अलग हम नहीं हैं. मानव संसाधनों को कैसे बर्बाद किया जाए और आर्थिक संसाधनों को कैसे सोखा जाए यह हमने अंग्रेज़ों से बेहतर सीखा है. आपकी पैनी नज़र की दाद देनी होगी.

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  2. प्रसिद्धि और प्रचार के आंकडों का गणित अलग होता है.

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  3. चन्दन जी इस आलेख में इतनी बातें हैं कि एक टिप्पणी से काम नहीं चलेगा और अभी इसका एक और भाग आने वाला है।

    इसलिए थोड़ा और सब्र कर लेता हूं।

    आपने मुद्दा ऐसा उठाया है कि मुझे भी बहुत कुछ है कहना, खास कर ब्रांड एम्बेसडर और छह हजार से करोड़पति बनने के वाकए पर।

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