गुरुवार, 24 नवंबर 2011

मार्क्स कहाँ गलत है? - राजेन्द्र यादव


अंग्रेजी में एक मुहावरा है प्रॉफ़ेट ऑफ द डूम यानी क़यामत का मसीहा। कुछ लोग क़यामत की भविष्यवाणियाँ करते हैं, परम-निष्ठा और विश्वास से उसकी प्रतीक्षा करते हैं और जब वह आने लगती है तो उत्कट आह्लाद से नाचने-गाने लगते हैं; देखा, मैंने कहा था आयेगी और आ गयी! अब इस आने में भले ही अपना घर-बार ही क्यों न शामिल हो। क़यामत के परिणामों से अधिक प्रसन्नता उन्हें अपनी बात के सच हो जाने पर होती है। पूर्वी-यूरोप में कम्युनिस्ट सरकारें धड़ाधड़गिर या उलट रही हैं, प्रदर्शन और परिवर्तन हो रहे हैं; लोग जिंदगी को अपने ढंग से ढालने और बनाने में लगे हैं और हम खुश हैं कि हम जानते थे, यही होगा। क्योंकि कम्युनिज्म असंभव है। मार्क्स ग़लत है। मैं गंभीरता से सोचना चाहता हूँ कि इस चरम-सत्य की खोज क्यों उन्हें इतना प्रसन्न करती है? मार्क्स क्यों ग़लत है? मार्क्स ने ऐतिहासिक और तार्किक प्रमाणों से यही तो कहा था कि मनुष्य-मनुष्य के बीच शोषण, असमानता और अन्याय की जो व्यवस्थाएँ रही हैं उन्हें समाप्त होना चाहिए इन्हें जायज़ और शाश्वत सिद्ध करने के जो तरीक़े ईजाद किये गये हैं उन्हें गहराई से समझने, उद्घाटित करने और उखाड़ने का प्रयास किया जाना चाहिए क्योंकि यह इतिहास की माँग है। अब तक के मानव-समाजों का अध्ययन हमें यही सिखाता है कि इन विषमताओं के स्वरूप या उनके विरुद्ध लड़ने के मानवीय प्रयास क्या रहे हैं? क्या मानव-विकास अंधेरे की लक्ष्यहीन दौड़ है या उसके अपने कुछ नियम हैं? अगर नियम हैं तो क्या हैं? अब मेरी समझ में सचमुच नहीं आता कि इसमें आखिर ऐसा क्या है जो अभारतीय है या मार्क्स ने ऐसा कौन-सा अपराध किया है कि उसे बार-बार कब्र खोद कर सूली पर लटकाया जाना चाहिए? शायद मार्क्स का अपराध इतना है कि बाकी लोगों की तरह उसने शोषण और अन्याय को दूर करने के सिद्धांत को सिर्फ एक सपने, मनुष्य को बराबर बताने वाले श्लोक और सदाशयी आकांक्षा या ईश्वरीय आशीर्वाद के रूप में ही क्यों नहीं रहने दिया हमें क्यों यह समझाने की कोशिश की कि यह सब ऐतिहासिक, भौतिक और व्यावहारिक है। इसके स्वरूप और तरीके हमेशा बदलते रहे हैं और इन्हें बदला जा सकता है, बदलना चाहिए। जहाँ तक समझ में आता है, सिर्फ दो ही तरह के लोग इसके विरोध में होने चाहिए एक वे जिनके पैरों तले जमीन इस सिद्धांत से खिसक रही हो, दूसरे वे जो सचमुच विश्वास करते हैं कि शोषण, अन्याय या असमानता शाश्वत हैं, ईश्वरीय हैं और आवश्यक या अनिवार्य है चूँकि वे हमेशा से हैं, इसलिए वे हमेशा रहेंगे, उन्हें रहना चाहिए। इन स्थितियों का कोई भी बदलाव उन्हें अभारतीय और अप्राकृतिक लगता है। वे अगर खुद इन स्थितियों के शिकार हैं तो यह उनकी नियति है।


      बहरहाल, यथास्थिति को अपनी व्यक्तिगत नियति मानने वाले चाहे जितने खुश और उल्लसित होते रहें, ऐतिहासिक नियति यही है कि आदमी बार-बार स्थितियों को बदलेगा, तोड़ेगा, बनायेगा और बेहतर जिंदगी की कोशिश करेगा। एक बार अपनी स्थिति और उसे बदलने के तरीके या क्षमता जान लेने के बाद कोई भी वह नहीं रहता जो पहले था। पूर्वी-यूरोप में भी यही प्रयोग चल रहा है और तीसरी दुनिया के देशों में भी। उसी रूस के समर्थन से, जो कल-तक हमारा स्वर्ग था।
      वस्तुत: न यह कम्युनिज्म की पराजय है, न पूँजीवादी डैमोक्रेसी की जीत। हो सकता है इस द्वंद्वात्मकता से उभरनेवाला कोतीसरा ही रूप हो। गोर्बाचोव के ग्लासनोस्त ने इतना तो सिद्ध कर ही दिया है कि कम्यूनिज़्म का स्तालिनवादी मॉडल अब चल नहीं सकता। उसे हर जगह टूटना है, और सबसे पहले वह टूट रहा है पूर्वी-यूरोप के उन देशों में जहाँ द्वितीय महायुद्ध की बंदर-बाँट में कम्यूनिज़्म ऊपर से लाद दिया गया। वह वहाँ के अपने संघर्षों और अपने परिश्रम से अर्जित की गयी व्यव्स्था नहीं थी। इसलिए उसके प्रति विद्रोह, एक थोपी गयी व्यवस्था के प्रति विद्रोह है, एकाधिकार के खिलाफ संघर्ष है कम्यूनिज़्म के खिलाफ नहीं। हो सकता है कि नयी उभरने वाली पार्टियों और शक्तियों के नाम वे न रहें जिनके खिलाफ यह सारी जद्दोजहद है मगर अपनी अन्तर्वस्तु में वे पूँजीवादी नहीं ही होंगी। दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इस बदलाव के गुणात्मक स्वरूप वे नहीं होंगे जो तीसरी दुनिया के संघर्षशील देशों में हैं। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि क्रांति का निर्यात नहीं होता। हमेशा ऊपर से लादी जाने वाली व्यवस्था; दमन, भ्रष्टाचार और एकाधिकारी अधिनायकवाद को जन्म देती है घर-घर नीचे तक उसकी कल्याण योजनाओं को पहुँचाने वाले, चमचों और दलालों में बदल जाते हैं सर्वोच्च सत्ता का नाम लेकर हर अधिकारी छोटे-छोटे तानाशाहों का रूप ले लेता है। असंतोष, प्रतिरोध और क्रांतियाँ हमेशा नीचे, अपनी जड़ों से उभरने वाली शक्तियाँ हैं।
[मेरी तेरी उसकी बात, हंस, फरवरी, 1990]

7 टिप्‍पणियां:

  1. पाठक गण परनाम, सुन्दर प्रस्तुति बांचिये ||
    घूमो सुबहो-शाम, उत्तम चर्चा मंच पर ||

    शुक्रवारीय चर्चा-मंच ||

    charchamanch.blogspot.com

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  2. एक अच्छी आलोचना। इसे यहाँ प्रस्तुत करने के लिए आभार।

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  3. पढ़ने लायक लेख, निष्कर्ष की शोध आज भी ज़ारी है

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  4. अजमेर सिंह25 नवंबर 2011 को 6:45 pm

    लेख बहुत ही तर्कपूर्ण एवं गम्भीर विशय की ओर इशारा है

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  5. बेहतरीन तर्कपूर्ण सुंदर आलेख विचारणीय,...
    मेरे नए पोस्ट आइये,....

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