शनिवार, 13 अगस्त 2011

अंग्रेजी के खिलाफ़ जब बोले श्री सेठ गोविन्ददास( चौथा और अन्तिम भाग):- अवश्य पढ़ें

(बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के नवम वार्षिकोत्सव में सभापति-पद से श्रीसेठ गोविन्ददास जैसा प्रख्यात और जबरदस्त हिन्दी-सेवी अंग्रेजी के भक्तों के सारे झूठे और बेबुनियाद  (कु)तर्कों  को चुनौती देते हुए जब बोलता है तब वे परेशान हो उठते हैं। लेकिन इसके बावजूद कि यह व्याख्यान आज से करीब पचास साल पहले का है (1960-62 ), आज भी इसकी प्रासंगिकता में कमी नहीं आई है और संकट और बढ़ा है। इसलिए उनके उस व्याख्यान को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। यह व्याख्यान परिषद द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'राष्ट्रभाषा हिन्दी: समस्याएँ और समाधान' से लिया गया है। इसे देखिए, लोगों तक पहुँचाइये कि कैसे आज से पचास साल पहले के भारत में और आज के भारत तक में अंग्रेजी का भ्रम फैलाया गया है क्योंकि भारत का अधिकांश आदमी कभी इन बातों पर सोचता नहीं कि ये भ्रम कितने तथ्यपूर्ण और सत्य हैं। इन सत्यों को छिपाया गया है और आज भी छिपाने का षडयंत्र हो रहा है और इस कारण लोग हमेशा इनके कहे झूठ का शिकार होते आये हैं।)


पहला भाग        दूसरा भाग        तीसरा भाग



अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों का आधार अँगरेजी: एक भ्रमजाल


     ऐसे ही खेद की यह बात है कि अँगरेजी के कारण हममें कुछ यह भावना पैदा हो गई हो कि हम विदेशियों से कुछ हेय हैं और हम उनके समकक्ष तभी हो सकते हैं, जब हम उनकी भाषा में ही या अँगरेजी के माध्यम द्वारा उनसे बात करें। मेरी यह मान्यता है कि यही हेयता की भावना इस तर्क के पीछे है कि बाह्य जगत से हमारा सम्पर्क केवल अँगरेजी के माध्यम द्वारा ही हो सकता है। कहा यह जाता है कि आज संसार के विभिन्न देश एक-दूसरे के अत्यन्त निकट आ गये हैं उर इसलिए प्रत्येक देश और प्रत्येक जाति के लिए यह वांछनीय है कि सारे भू-मण्डल से अपना सम्पर्क बनायें रखे और जहाँतक हमारे देश का सम्बन्ध है, यह कहा जाता है कि यह सम्पर्क केवल अँगरेजी के माध्यम द्वारा ही रखा जा सकता है। प्रश्न यह होता है कि हमारे लिए ही यह क्यों आवश्यक है कि हमारा बाह्य जगत् से सम्पर्क अँगरेजी के माध्यम द्वारा ही हो? यह बात फ्रांस, रूस, दक्षिण अमेरिका, चीन आदि के लिए आवश्यक क्यों नहीं है? क्या इन देशों का बाह्य जगत् से सम्पर्क नहीं है? क्या वे लोग संयुक्तराज्य में केवल अँगरेजी के द्वारा ही विचार-विनिमय करते हैं? क्या यह सत्य नहीं है कि दक्षिणी अमेरिका के राज्यों के प्रतिनिधि स्पेनिश भाषा के माध्यम द्वारा, रूस के प्रतिनिधि रूसी भाषा के द्वारा और चीन के चीनी भाषा के द्वारा सब काम वहाँ करते हैं? यदि वे लोग अपनी-अपनी भाषाओं के माध्यम द्वारा बाह्य जगत् से सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं, तो फिर ऐसी कौन-सी बाधा है कि हम अपनी भाषा के माध्यम द्वारा बाह्य जगत् से सम्बन्ध स्थापित न कर सकें? यह ठीक है कि आज संयुक्तराष्ट्र में हिन्दी एक स्वीकृत भाषा नहीं है, किन्तु क्या इसका यह कारण नहीं है कि जिस समय संयुक्तराष्ट्र की स्थापना हुई थी, उस समय हम परतन्त्र थे और अँगरेजों के दास थे, अत: वहाँ हमारे सम्बन्ध में यह विचार ही पैदा न हुआ कि हमारी भी कोई माँग हो सकती है। चीन ने अपनी गरिमा रखने के लिए अपनी भाषा को वहाँ मान्य कराया, किन्तु क्या स्वतन्त्र होने के पश्चात् हमने एक दिन भी यह प्रयास किया है कि हमारी भाषा उस संगठन की एक स्वीकृत भाषा हो जाय? पर हम करते ही कैसे, जब हम अपने देश में ही अपनी भाषा को राज्यासन पर बिठाने को उत्सुक नहीं हैं। परिणाम यह हुआ है कि विदेशी हमको तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं और समझते हैं कि हम ऐसी बर्बर जाति के लोग हैं, जिनकी अपनी कोई भाषा नहीं और जो अपने भूतपूर्व शासकों की भाषा की जूठन से काम चलाते हैं। कैसा पतन है यह उस देश का, जिसकी भाषा एक दिन सारे दक्षिण एशिया और अन्य देशों की विचार-विनिमय की भाषा थी, जिसमें अनेक देशों के विद्यार्थी उस भाषा का ज्ञान उपार्जित करने को आते थे और जो देश सारे सभ्य जगत् का सांस्कृतिक केन्द्र था। कैसा पतन है कि आज उस देश के वासी इस बात में अपना गौरव समझें कि उनकी सन्तान केवल अँगरेजी बोल सकती है, इस देश की एक भाषा नहीं। हमारी आत्मा का हनन इससे अधिक और क्या हो सकता है और यह इसलिए हुआ है कि अँगरेजी हमपर लादी गई। राजनीतिक शास्त्र में एक सूत्र है कि यदि कोई जाति अन्य जाति पर अपना राज्य पूर्णत: जमाना चाहती है, तो उसे यह चाहिए कि वह विजित जाति की भाषा नष्ट कर दे। अँगरेजों ने इस प्रयोजन से हमपर अँगरेजी लादी थी। वे हमारी भारतीय आत्मा का हनन करना चाहते थे। वे इसमें कुछ सीमा तक सफल हुए, किन्तु हमारी क्रान्ति ने उन्हें पूर्णत: सफल न होने दिया, पर आज हमारी आत्मा की इस शत्रु को हमपर क्यों लादा जा रहा है?

अँगरेजी भाषा से मुझे कोई द्वेष नहीं, पर………

मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि मुझे अँगरेजी भाषा से कोई विद्वेष नहीं है, किन्तु जो काँटा मेरे मन में चुभता है वह यह है कि इस भाषा को हमारे देश में विषमता का, शोषण का, वर्ग-प्रभुत्व का साधन बनाया जा रहा है और इसका ऐसा प्रयोग किया जा रहा है कि जिससे हमारे देश की आत्मा का हनन हो। इस विषय में मेरा वही मत है, जो अँगरेजों के सम्बन्ध में गांधीजी का था। वे सदा कहते थे कि उनकी अँगरेज जाति से शत्रुता नहीं, अँगरेजों से वे प्रेम करते हैं, परन्तु यह होते हुए भी अँगरेजी राज्य इस देश पर अस्वाभाविक है, इस देश की समस्त पीड़ाओं का कारण है, इसलिए उसे जाना ही चाहिए। अँगरेजी भाषा के सम्बन्ध में भी मेरी यही स्थिति है। यदि अँगरेजी से ऐसे ही बरता जाय, जैसा कि अन्य विदेशी भाषाओं से बरता जाता है, तो मैं उसका स्वागत करूँगा। न तो मुझे और न किसी हिन्दी या भारतीय भाषाप्रेमी को इस बात में कोई आपत्ति है या हो सकती है कि जो लोग चाहें, वे अँगरेजी सीखें, चाहे फ्रांसीसी सीखें, चाहे चीनी सीखें। यदि कुछ लोग कई भाषाएँ सीखना चाहते हों तो यह भी अच्छी बात होगी। और इसके लिए प्रबन्ध होना चाहिए। किन्तु, केवल इस दृष्टि से कि यहाँ अँगरेजी लादी जाय, यह दलील देना कि कई भाषाओं का ज्ञान-उपार्जन हर विद्यार्थी के लिए वांछनीय है, कुछ उचित बात नहीं है। मैं यह पूछना चाहता हूँ कि जो लोग आज इस वांछनीयता की दुहाई देते हैं, उनमें से कितनों ने यह सोचा भी है, प्रयास करने का तो प्रश्न ही नहीं, कि वे इस देश की कुछ भाषाएँ भी सीख लें। मुझे तो ऐसा लगता है कि अँगरेजी के अतिरिक्त उन्होंने कोई और भाषा सीखने का विचार तक नहीं किया और यहाँ तक कि जो भाषा उन्हें अपनी माता से मिलती थी, उसको भी उन्होंने भुला दिया और यह प्रयास किया कि उनकी संतान अँगरेजी के अतिरिक्त न और कुछ जाने, न बोले। अँगरेजी के मोह में वे इतने पागल हैं कि इस विचार से कि पाँच-छह वर्ष की अवस्था से हमारे देश के बालकों को वे अनिवार्यत: अँगरेजी पढ़ाने के लिए तर्क दे सकें, उन्होंने अँगरेजी बोलनेवालों देशों से विद्वान् बुलाकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि छोटे बालकों के लिए कई भाषाएँ सीख लेना बहुत आसान होता है, और इसीलिए छोटी कक्षाओं में ही उन्होंने अँगरेजी  की पढ़ाई आरम्भ कर दी है। पर प्रश्न यह होता है कि अँगरेजी की ही क्यों? क्यों इस देश की कई भाषाओं का ज्ञान कराना ठीक नहीं? पर ऐसी कोई योजना नहीं दिखाई पड़ती। कहा यह जाता है कि फ्रांस का राजकुल अपने मुकुट को आँखों पर धरे पहाड़ के कगार पर जा रहा था और खड्ड में जा पड़ा एवं विनष्ट हो गया। कहीं इतिहास यह न कहे कि भारत में अँगरेजी-वर्ग इस अँगरेजी मुकुट को आँखों पर धरे इसी प्रकार खड्ड में जा पड़ा। मेरा यह प्रयास है कि समय रहते हम सँभल जाय और इसी दृष्टि से मैं आप सबका आह्वान करता हूँ कि आप इस महाप्रयास में लग जायँ कि इस देश की भाषाएँ शीघ्रतिशीघ्र राज्य-क्षेत्र में अपना उचित स्थान पा जायँ।

सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं का माध्यम

     इस प्रयास के दो पहलू हैं। एक तो उन बाधाओं को हटाना, जो हमारी भाषाओं की प्रगति को अवरुद्ध कर रही हैं। मेरे विचार में सबसे बड़ी बाधा तो यह है कि लोक-सेवा-आयोगों कि परीक्षा का माध्यम आज सर्वत्र केवल अँगरेजी है। यह उन प्रदेशों के प्रति घोर अन्याय है, जिन्होंने देशी भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बना लिया है। उन प्रदेशों के विद्यार्थी इन परीक्षाओं में पिछड़े रह जाते हैं 
(यहाँ एक तथ्य की तरफ़ मैं आपका ध्यान दिलाना चाहूंगा कि आखिर क्या वजह है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में प्राय: (शायद 95 प्रतिशत या 100 प्रतिशत ऐसा ही होता है) अंग्रेजी माध्यम के उम्मीदवार ऊँचा स्थान हासिल करते हैं? क्या हिन्दी माध्यम से परीक्षा देने वाला इतना बेवकूफ़ होता है और अगर ऐसा है, तो सरकार घोषित कर दे कि भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी हो ही नहीं सकती, केवल और केवल अंग्रेजी हो सकती है। वैसे भी आज से एक साल पहले संसद में गृह मंत्री से पूछे गये एक सवाल के जवाब में कहा गया था कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। सबूत के लिए यहाँ देखें। पूरे देश में हिन्दी माध्यम के किसी उम्मीदवार के अन्दर ऐसी क्षमता है ही नहीं कि वह ऊँचा स्थान हासिल कर सके? कभी-कभार ऐसा गलती से हो जाता हो, तब उसकी बात अलग है। 2001-02 में कई लोगों ने शिकायत की थी कि हिन्दी माध्यम से होने के बावजूद साक्षात्कार में उनसे अंग्रेजी बोलने को कहा गया और अंग्रेजी में सवाल पूछे गए। मैं पूछना चाहता हूँ कि जब ऐसे उम्मीदवार लिखित परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद साक्षात्कार देने पहुंच सकते हैं, तब वे अभी भी बेवकूफ़ समझे जाते हैं? सिविल सेवा के लिए सिविल यानि साधारण लोगों की भाषा अपनाई जाती है? इस तरह की दुष्टता और कुचक्र का मतलब तो यही है सारे हिन्दी भाषी गधे हैं और कभी-कभार एक-दो को छोड़कर सर्वोच्च स्थान हासिल करने वाले 10-20 या 30 उम्मीदवार तो हिन्दी माध्यम का शायद ही हो सकता है। सरकार यह घोषित कर दे कि प्रशासनिक सेवा की परीक्षा देने का और प्रशासनिक सेवा में जाने का अधिकार सिर्फ़ अंग्रेजों की मानस संतानों को है और किसी को नहीं। - प्रस्तुतकर्ता) 
और इसलिए इन प्रदेशों में भी यह प्रयास हो रहा है कि शिक्षा का माध्यम पुन: अँगरेजी हो जाय। कम-से-कम विश्वविद्यालयों के शिक्षक इसी आधार पर वह तर्क देते हैं कि उच्च शिक्षा का माध्यम अभी अँगरेजी ही रहना चाहिए। भारत-सरकार और राज्य-सरकारों का यह कर्त्तव्य है कि वे देशी भाषाओं के प्रति इस घोर अन्याय को अविलम्ब बन्द कर दें। इसलिए, हिन्दी और अन्य देशी भाषाएँ इन परीक्षाओं का माध्यम स्वीकार की जानी चाहिए? इसके अतिरिक्त यह भी आवश्यक है कि हमारे देश की भाषाएँ इन परीक्षाओं के लिए वैकल्पिक विषयों की सूची में भी सम्मिलित की जायँ। 

(हालांकि अब ऐसा हो चुका है, लेकिन सभी जानते हैं कि भाषाओं के मामले में किसका वर्चस्व है। - प्रस्तुतकर्ता)

यह कितनी भारी विडम्बना है कि इन परीक्षाओं के लिए यूरोप की प्रादेशिक भाषाएँ, अर्थात् फ्रेंच, जर्मन, इटालियन इत्यादि-इत्यादि वैकल्पिक विषयों में तो हों, किन्तु इस देश की एक भी प्रादेशिक भाषा उस सूची में न हो। मानों, हमारे राज-कर्मचारियों के लिए फ्रांसीसी या स्पेनिश सीखना तो वांछनीय है, किन्तु इस देश की एक भी प्रादेशिक भाषा जानना या सीखना वांछनीय नहीं है। अँगरेजों ने तो इस देश की भाषाओं को इन परीक्षाओं के लिए वैकल्पिक विषय इसलिए न रखा था कि उनकी तुलना में यहाँ के परीक्षार्थी अधिक सफलता प्राप्त न कर पायें और यूरोप की प्रादेशिक भाषाओं को इसलिए रखा था कि अँगरेज परीक्षार्थी भारतीयों की अपेक्षा उन परीक्षाओं में अधिक संख्या में सफल हो सकें। किन्तु, आज किस सिद्धान्त पर भारतीय भाषाओं का बहिष्कार किया जा रहा है? इस बहिष्कार के कारन इन भाषाओं की प्रगति में बाधा पड़ रही है और यह अविलम्ब दूर होना चाहिए।

उच्च न्यायालयों की भाषा
      इसके अतिरिक्त आज हमारी भाषाओं के सामने यह बाधा भी है कि उनका प्रयोग उच्च न्यायालयों में नहीं हो सकता। हमारा आज जो संविधान है, उसमें यह एक उपबन्ध है कि उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय की भाषा केवल अँगरेजी होगी। परिणामत:, वहाँ व्यवसाय करनेवाले सब लोग अँगरेजी का ही प्रयोग कर सकते हैं और करते हैं। स्वभावत: सारे विधि-व्यवसायों का हित इसी में हो जाता है कि वे देशी भाषाओं से कुछ विशेष वास्ता न रखकर अँगरेजी से ही अपना वास्ता रखें। विधि के क्षेत्र से हमारी भाषाओं के इस बहिष्कार के कारण भी वे पनप नहीं पातीं। कैसी अजीब बात है कि जिस देश के निन्यानबे प्रतिशत लोग अँगरेजी का एक शब्द नहीं समझते, उनकी जीवन-व्यवस्था के लिए नियम और विधियाँ अँगरेजी में ही बनाई जायँ। जो कारखानों में काम करते हैं और जिनके लिए अँगरेजी करिया अक्षर भैंस बराबर है, उनके अधिकारों की विधियाँ भी अँगरेजी में बनाई जायँ।

(आठवीं और पाँचवी पास उम्मीदवार के लिए नियुक्ति के आवेदन-पत्र(फार्म) तक अंग्रेजी में छापे जाते हैं। - प्रस्तुतकर्ता) 

परिणाम यह है कि विधियों से जो अधिकार हमारे जनसाधारण को मिले हुए हैं और जो दायित्व उनपर रखे हुए हैं, उनसे वे सर्वथा अपरिचित रह जाते हैं और कुछ मुट्ठी-भर अँगरेजी पढ़े-लिखे हाथों की इसलिए कठपुतली हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त हमारी न्याय-प्रणाली इस अँगरेजी के कारन अत्यन्त खर्चीली और शिथिल गतिवाली हो गई है। जब कभी उच्च न्यायालय में कोई अपील जाती है, तब इस कारण कि उच्च न्यायालय की भाषा अँगरेजी है, उस मुकदमे की पूरी कार्यवाही का उल्था अँगरेजी में करना पड़ता है। इस उल्थे को पेपर-बुक कहा जाता है और इसके तैयार करने में पर्याप्त धन और समय का खर्च होता है। कभी तो पेपर-बुक हजारों रुपया खर्च बैठता है और वर्षों में यह तैयार होता है; किन्तु कैसे आश्चर्य की बात है कि न्याय-प्रणाली के इस दोष के प्रति विधि-आयोग ने संकेत तक नहीं किया है; क्योंकि अँगरेजी का चश्मा उसकी आँखों पर भी चढ़ा हुआ था और वह अँगरेजी से होनेवाली इस हानि को देख ही नहीं सकता था। मैं समझता हूँ कि हमारी भाषाओं की इस बाधा को भी तुरन्त दूर कर देना चाहिए और इस बात की अनुमति चाहिए कि उच्च न्यायालयों में और उच्चतम न्यायालय में देशी भाषाओं या हिन्दी का प्रयोग किया जा सके।

मन्त्रियों और शासन-तन्त्र की भाषा

       इसके अतिरिक्त हमारे मन्त्रियों और उच्च पदाधिकारियों द्वारा भी अँगरेजी का अपने सब कार्यों में प्रयोग हमारी भाषाओं के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। यथा राजा तथा प्रजा के सिद्धान्त के अनुसार इन मन्त्रियों की देखादेखी अन्य लोग भी इसी में अपना गौरव समझते हैं कि वे भी अपने विभिन्न कार्यों में अँगरेजी का प्रयोग करें, चाहे वह अँगरेजी कितनी ही टूटी-फूटी, गलत-सलत क्यों न हो।

(अभी तो केंद्र के सारे विशेष मंत्री अंग्रेजी के अलावे शायद ही कुछ बोलते हैं। कुछ चिल्लाते भी हैं, लेकिन अपने बच्चों को विदेशों में पता नहीं क्या पढ़ाते हैं? ऐसा क्या पढ़ने जाते हैं इनके लाडले-लाडलियाँ विदेश और अन्त में आकर भारत में करते क्या हैं, सब जानते ही हैं। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय एक पर्चा छापता है हर 14 सितम्बर को। उस पर हमारे वर्त्तमान गृह मंत्री के हस्ताक्षर हिन्दी में यानि नागरी में रहते हैं। लेकिन वर्त्तमान गृह मंत्री हिन्दी कब बोलते हैं? - प्रस्तुतकर्ता) 

अत:, हमारे मन्त्रियों और उच्च पदाधिकारियों को भी अपना यह कर्त्तव्य मानना चाहिए कि वे अपना सारा कार्य अपनी प्रादेशिक भाषाओं के माध्यम द्वारा ही करें। साथ ही सचिवालयों में भी हिन्दी-भाषा-भाषी क्षेत्रों में हिन्दी का प्रयोग और इतर भाषाभाषी क्षेत्रों में वहाँ की भाषाओं का प्रयोग तुरन्त होना चाहिए, तभी हमारी भाषाओं को वह सम्मान मिलेगा, जो उनकी प्रगति के लिए प्राणवायु के समान है। शब्द-संचार के जो यान्त्रिक साधन आज अँगरेजी के लिए उपलब्ध हुए हैं, वे भारतीय भाषाओं के लिए भी अविलम्ब किये जाने चाहिए, तभी हमारी देशी भाषाओं के समाचार-पत्र उस बाधा से मुक्त हो सकेंगे, जो आज उन्हें घेरे हुए है और जिसके कारण वे उतनी शीघ्रता से समाचार नहीं दे सकते, जितना शीघ्रता से कि अँगरेजी-पत्र दे लेते हैं। बाधाएँ तो और भी हैं, किन्तु उन सब को गिनाना आवश्यक नहीं है। केवल इतना कह देना मैं पर्याप्त समझता हूँ कि हमारी भाषाओं को वे सब सुविधाएँ दी जानी चाहिए, जो अँगरेजी को दी जा रही हैं।

चारों हिन्दीभाषी राज्यों में हिन्दी चलाओ---योजना

      जहाँ तक हिन्दी-भाषाभाषी उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, और मध्यप्रदेशचार राज्यों का सम्बन्ध है, मैंने हाल ही हिन्दी चलाओ नामक एक योजना प्रस्तुत की है। इन चारों राज्यों में इस योजना को काफी समर्थन मिला है। कहा जाता है कि रचनात्मक ढंग की यह पहली ब्यौरेवार योजना है। जो कुछ हो, हमें प्रयत्न करना है कि इन चारों राज्यों में यह योजना कार्यरूप में परिणत की जाय।

हिन्दी का कहीं कोई विरोध नहीं

      परन्तु, जब मैं इन चारों हिन्दी-भाषाभाषी राज्यों में हिन्दी चलाने की बात कहता हूँ, तब यह न समझ लिया जाय कि मैं यह मानता हूँ कि जिन राज्यों अथवा क्षेत्रों की मातृभाषा हिन्दी नहीं है, वहाँ हिन्दी का ऐसा विरोध है, जिसपर ध्यान दिया जाय।
      हमारी संविधान-सभा ने सर्वमत से हिन्दी को इस देश की राजभाषा स्वीकृत किया था। आज यत्र-तत्र इतर भाषाभाषी कतिपय सज्जन हिन्दी का विरोध करते सुने जाते हैं। एक तो वे दक्षिण के चार राज्यों में से केवल तमिल-भाषाभाषी मद्रास के महानुभव हैं और कुछ बंगाल के। परन्तु, यह विरोध रोटियों के कारण है और जिस मद्रासराज्य में यह विरोध दिख रहा है, वहाँ इस विरोध के साथ ही हिन्दी सीखनेवालों की संख्या बढ़ी है। शेष भारत के किसी भी भाग में हिन्दी का कोई विरोध नहीं है। मैंने समूचे भारत के जाने कितने दौरे किये हैं और करता भी रहता हूँ और यह बात मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कहता हूँ।

साहित्य-सर्जन

     दूसरा हमारे प्रयास का पहलू सर्जनात्मक हो मैं इस संस्था को बधाई देता हूँ कि इसने इस बारे में स्तुत्य कार्य दिया है।  किन्तु, हम अबतक के कार्य से सन्तोष करके नहीं बैठ सकते। हमें इस देश की आत्मा की अभिव्यक्ति अपनी भाषाओं के माध्यम द्वारा ही हर प्रकार से करनी है। हमारे साहित्यकारों का यह धर्म है कि वे अपनी जीवनानुभूति अपनी भाषाओं के सुन्दरतम शब्दों में अभिव्यक्त करके इन भाषाओं के साहित्य-भाण्डार को परिपूर्ण कर दें। हमारा देश आज एक महान् यात्रा पर चल पड़ा है। ऐसी यात्रा पर, जो उस महामन्दिर में उपासना के लिए है, जिसके प्रसाद से हमारे देश के प्रत्येक नर-नारी का जीवन सब दृष्टियों से सम्पन्न, समृद्ध और आनन्दमय हो जायगा।

आह्वान

     पिछली शताब्दियों में अनेक कारणों से हमारा जीवन गतिहीन हो गया था और इस कारण हम अन्य जातियों से बहुत पिछड़ गये। हमें अब बड़े पग बढ़ाकर उनके समकक्ष आ जाना है और यह हम तभी कर पायेंगे, जब हमारे प्रत्येक नागरिक के हृदय में यह ज्योति जग जाये कि उस के प्रयास पर उसका और हम सबका भविष्य निर्भर करता है। हमें उसे गतिमान बना देना है, गाँव-गाँव और नगर-नगर में हमें यह नवसंदेश पहुंचा देना है। यह काम हमारे भाषा के साहित्यिकों का है, कवियों का है, कलाकारों का है और साथ ही हमारे दार्शनिकों और वैज्ञानिकों का है। मैं आपका आह्वान करता हूँ कि आप इस ज्योति-शिखा को लेकर इस भाषा की अपार शक्ति को लेकर ग्राम-ग्राम और नगर-नगर में अलख जगायें। हमारे जन-मानस को आन्दोलित कर दें, जिससे कि वे सब बाधाओं को हटाकर, सब विदेशी जंजीरों को तोड़कर अपना भाग्य-निर्माण करने के लिए और संसार की जातियों में अपना उचित स्थान प्राप्त करने के लिए, द्रुतगति से अग्रसर हो सकें।

(अब आश्चर्य होता है कि ऐसा पचास सालों बाद भी न हो पाया है। उल्टे पिछले पचास सालों में अंग्रेजी के जुआ-घर खुलते गए हैं और अब तो गाँव में भी खुल रहे हैं। क्या यह आह्वान फिर किया जाय? वैसे भी यह मामला अब चालीस सालों से दबा हुआ है। आप क्या चाहते हैं?  -प्रस्तुतकर्ता)

1 टिप्पणी:

  1. भाषा और सभ्यता साथ साथ जुड़े हैं, इस दृष्टि से दक्षिण के राज्यों ने हिन्दी को नहीं स्वीकारा, अंग्रेज़ी को चाहा ताकि विदेशी भाषा से भारत के किसी प्रदेश की सभ्यता दूसरों पर हावी न हो. मैं पिछले बीस वर्षों में कई बार दक्षिण भारत में गाँवों और शहरों में घूमा हूँ. यह सच है कि आज हिन्दी जानने वालों की संख्या दक्षिण भारत में बढ़ी है, लेकिन मेरे विचार में वहाँ के लोग आज भी हिन्दी को आपस में बात चीत की भाषा मानने के लिए तैयार नहीं हैं. जब कोई देश अपने भीतर एक भाषा को नहीं स्वीकार कर सकता, वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उसे नहीं स्वीकारने के लिए कह सकता. हिन्दी बोलने वाले चाहे दुनिया में अन्य भाषाओं से चाहे कितने अधिक हों, जब तक वह किसी देश की भाषा न हो, उसे अंतरराष्ट्रीय स्थान नहीं मिलेगा.

    पर भारत के आर्थिक विकास से, उसके बढ़ते हुए बाज़ारों से जहाँ विदेशी अपना समान और क्षमता बेचने की चाह रखते हैं, विदेश में यह जानकारी बढ़ी है कि भारत में काम करने के लिए अंग्रेज़ी काफ़ी है लेकिन लोगों के मन जानने के लिए हिन्दी आनी चाहिये. इसलिए दुनिया में हिन्दी के कोर्स बढ़े हैं. बोलोनिया में जहाँ मैं रहता हूँ, बहुत से हिन्दी जानने वाले इतालवी लोगों को जानता हूँ, एक व्यक्ति ने हिन्दी में पीएचडी किया है, एक ने संस्कृत में पीएचडी किया है. यह लोग दूतावासों में, भारत से बिजनेस करने वालों के दफ़्तरों में, हिन्दी के उपन्यासों का सीधा इतालवी में अनुवाद करने जैसे काम कर रहे हैं. अगर भारत का आर्थिक विकास बढ़ेगा तो यह हिन्दी जानने वाले भी बढ़ेंगे.

    असली बात तो भारत में अंग्रेज़ी बोलने वाले और हिन्दी बोलने वालों के बीच की विषमता है. अंग्रेज़ी जानना केवल एक भाषा ज्ञान नहीं, बल्कि दूसरों से ऊपर उठने, दूसरों को दबाने और नीचा दिखाने का माध्यम है. इसको कैसे बदला जाये, यही प्रश्न है.

    (जो न कह सके पर मेरे पुराने आलेखों को इतने ध्यान से पढ़ने के लिए धन्यवाद)

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