रविवार, 7 अगस्त 2011

अंग्रेजी के खिलाफ़ जब बोले श्री सेठ गोविन्ददास(भाग-2):- अवश्य पढ़ें

(बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के नवम वार्षिकोत्सव में सभापति-पद से श्रीसेठ गोविन्ददास जैसा प्रख्यात और जबरदस्त हिन्दी-सेवी अंग्रेजी के भक्तों के सारे झूठे और बेबुनियाद (कु)तर्कों  को चुनौती देते हुए जब बोलता है तब वे परेशान हो उठते हैं। लेकिन इसके बावजूद कि यह व्याख्यान आज से करीब पचास साल पहले का है (1960-62 ), आज भी इसकी प्रासंगिकता में कमी नहीं आई है और संकट और बढ़ा है। इसलिए उनके उस व्याख्यान को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। यह व्याख्यान परिषद द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'राष्ट्रभाषा हिन्दी: समस्याएँ और समाधानसे लिया गया है। इसे देखिएलोगों तक पहुँचाइये कि कैसे आज से पचास साल पहले के भारत में और आज के भारत तक में अंग्रेजी का भ्रम फैलाया गया है क्योंकि भारत का अधिकांश आदमी कभी इन बातों पर सोचता नहीं कि ये भ्रम कितने तथ्यपूर्ण और सत्य हैं। इन सत्यों को छिपाया गया है और आज भी छिपाने का षडयंत्र हो रहा है और इस कारण लोग हमेशा इनके कहे झूठ का शिकार होते आये हैं।)


अँगरेजी और भारतीय भाषाओं की शब्द-सृजन-शक्ति:

इंग्लैण्ड में विज्ञान का प्रवेश लातनी और यूनानी भाषा के द्वारा हुआ। यदि मैं भूलता नहीं तो इंग्लैण्ड में रोजर बेकन (कुछ स्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, रोजर बेकन को दुनिया के सबसे प्रभावशाली वैज्ञानिकों में माना जाता है। - प्रस्तुतकर्ता) ने अपना कार्य अधिकतर इन्हीं भाषाओं के ज्ञान के सहारे किया और उसके पश्चात् भी अनेक वर्षों तक इंग्लैण्ड के विद्वान् इन भाषाओं का सहारा अपनी विधि, अपनी शिक्षा, अपने विज्ञान के लिए लेते रहे। सच तो यह है कि आज भी अँगरेजी में यह शक्ति नहीं कि वह नये-नये वैज्ञानिक तथ्यों के लिए अपने निज के शब्द दे सके। आज भी इंग्लैण्ड के वैज्ञानिक इन तथ्यों की अभिव्यक्ति के लिए लातनी या यूनानी भाषा का सहारा लेते हैं। (ध्यान देने की बात है जब आप विज्ञान, तकनीक सहित उच्चतर की भी विषय का अध्ययन अंग्रेजी में करते हैं, तो वहाँ सारे पारिभाषिक शब्दों में या सारे महत्वपूर्ण शब्दों में अधिकांश लैटिन या लातनी और यूनानी या ग्रीक को ही पायेंगे। सबूत के लिए आप चाहे जिस विज्ञान को देख लें। खासकर मनोविज्ञान, जीवविज्ञान, रसायन विज्ञान के तो लगभग सारे शब्द ही गैर-अंग्रेजी के हैं। यहाँ आपको बता दें कि किसी वनस्पति या जन्तु का वैज्ञानिक का नाम आप अंग्रेजी में रख ही नहीं सकते। सबूत के लिए अन्तरराष्ट्रीय पादप-नामकरण नियम (International Rules of Botanical Nomenclature) तथा अन्तरराष्ट्रीय प्राणि-नामकरण नियम (International Rules of Zoological Nomenclature) मौजूद हैं। इसमें एक है अनुच्छेद 3 जो स्पष्ट कहता है कि वैज्ञानिक नाम सदैव लैटिन में अथवा लैटिनी शब्दों से बनने चाहिए।यह नियम 1985-86 में तो था, अभी का नहीं कह सकता। इन नामों की वैज्ञानिकता की जानकारी के लिए जरा यहाँ एक नजर डाल लें।) मुझे पूर्ण विश्वास है कि जो लोग दुहाई देते हैं कि अँगरेजी के बिना भारत अन्धकार के गर्भ में चला जायगा, उनमें से अनेक वनस्पतिशास्त्र के ऐसे एक भी शब्द को न समझ सकेंगे, जो उस विज्ञान के क्षेत्र में अँगरेजी भाषा में प्रयोग किये जाते हैं। वे सभी शब्द अँगरेजी में यूनानी या लातनी भाषा से लिये गये हैं और मैं तो यह समझता हूँ कि सम्भवत: उन्हें निन्यानबे प्रतिशत अँगरेजी भी न समझ में आती हो। मैं नहीं जानता कि इस ओर अँगरेजी के हिमायतियों की दृष्टि गई है या नहीं कि अँगरेजी भाषा में शब्द-निर्माण की शक्ति लगभग नहीं के बराबर है और उस दृष्टि से सभ्य भाषाओं में उतनी दरिद्र भाषा सम्भवत: संसार में कोई न होगी! हिन्दी के सम्बन्ध में बहुधा इन लोगों द्वारा यह कहा जाता है कि वह दरिद्र भाषा है। हिन्दी ही क्यों, ये लोग सब भारतीय भाषाओं को दरिद्र भाषा मानते हैं, किन्तु मेरा यह निजी अनुभव है कि हिन्दी में नये शब्द-निर्माण करने की नैसर्गिक शक्ति है। उदाहरणार्थ, संस्कृत का एक शब्द चूर्ण कई वस्तुओं को व्यक्त करने के लिए काम में लाया जाता था, किन्तु हिन्दी ने उसी आधार पर कई शब्द बना लिये। चून, चूना, चूर्ण- ये तीन शब्द पृथक्-पृथक् वस्तुओं को व्यक्त करते हैं और इनका निर्माण हिन्दी ने अपनी शक्ति के आधार पर किया है। ऐसे एक नहीं, अनेक उदाहरण आपको हिन्दी भाषा में मिलेंगे। (जैसे पत्र से पत्ता, पत्ती, पत्र भी बनाए गए हैं और ऐसे उदाहरण एक नहीं हजारों-लाखों की संख्या की मौजूद हैं। - प्रस्तुतकर्ता) इसलिए, यह कहना कि हिन्दी दरिद्र भाषा है, पूर्णत: निराधार है। हाँ, जिन लोगों को हिन्दी के , का ज्ञान नहीं, जिन्होंने अपने जीवन का एक क्षण हिन्दी-साहित्य के अध्ययन में नहीं लगाया और जिनके मन में हिन्दी के प्रति अकारण ही विद्वेष और उपेक्षा का भाव है और रहा है, यदि वे कहने लगें कि हिन्दी दरिद्र भाषा है, तो आश्चर्य कि बात ही क्या? किन्तु, यदि शुद्ध भाषा-विज्ञान की दृष्टि से अँगरेजी और हिन्दी का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय, तो पता चलेगा कि केवल भाषा की दृष्टि से कौन-सी भाषा बलशाली है और कौन-सी असहाय और दुर्बल। जो भी हो, इस सम्बन्ध में क्या एक क्षण के लिए भी शंका हो सकती है कि अँगरेजी विज्ञान के लिए एकमात्र देववाणी नहीं है। भगवान् ने यही विधान कर दिया होता कि अँगरेजी ही विज्ञान की भाषा होगी, तो फिर क्या रूसी, फ्रांसीसी, जर्मन या अन्य देश विज्ञान के क्षेत्र में ऐसी ही प्रगति कर पाते? यह केवल उपहासास्पद बात है कि अँगरेजी का प्रगति से कोई विशेष सम्बन्ध है। प्रगति तो केवल इसपर आश्रित है कि मनुष्य की यह भावना और विश्वास हो कि जो भूतकाल से मिला है, उसपर ही पूर्णत: आश्रित न रहकर, उसी से सर्वथा बँधे न रहकर, जीवन को अधिक समृद्ध और आनन्दमय बनाने के लिए नये-नये प्रयोग किए जायँ, नई-नई दिशाएँ खोजी जायँ। ( अब तक के दुनिया के मुख्य 1000 से अधिक वैज्ञानिक गैर-अंग्रेजी वाले रहे हैं। बिना अंग्रेजी के ये सब जब आगे बढ़ सकते हैं, आविष्कार कर सकते हैं, तब यह बात अपने आप साबित हो जाती है कि अंग्रेजी ही विज्ञान के ज्ञान और प्रगति का आधार नहीं है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि रूस में अब तक 300 से अधिक बड़े वैज्ञानिक / गणितज्ञ हुए हैं जबकि अमेरिका में यह संख्या 500 से कम ही है और यह भी ध्यान रहे कि रूस की जनसंख्या अमेरिका के आधे से भी कम है। और रूस की भाषा अंग्रेजी नहीं है। - प्रस्तुतकर्ता) वह धारण क्या हम इस देश के वासियों में अपनी भाषा द्वारा नहीं फैला सकते? क्या यह विचार उनके मन में नहीं बैठा सकते? क्या इस सम्बन्ध में एक क्षण के लिए भी किसी प्रकार की शंका होनी चाहिए? अत:, मेरा निवेदन है कि अँगरेजी  के पक्ष में इस प्रकार तर्क देना बड़ा असंगत और अत्यन्त उपहासास्पद है।

भारत की एकता के लिए क्या अँगरेजी  आवश्यक है?

ऐसी ही एक दलील यह है कि भारत की एकता का आधार और स्रोत अँगरेजी है। यह कहा जाता है कि भारत के विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न भाषाएँ बोली जाती हैं और वहाँ के वासियों के लिए परस्पर विचार-विनिमय करना केवल अँगरेजी के माध्यम द्वारा ही सम्भव है; अँगरेजी जाननेवाले इन भाषाभाषी प्रदेशों के प्रत्येक नगर और नगरी में मिलते हैं, इस कारण अँगरेजी भाषा के प्रयोग करनेवाले के लिए भारत में किसी स्थान में कठिनाई नहीं होती; यह भारत की किसी अन्य भाषा के सम्बन्ध में लागू नहीं है, इसलिए आज जो सुविधा अँगरेजी के द्वारा हमें प्राप्त है और जिस सुविधा के कारण एक दृष्टि से भारत की एकता बनी हुई है, उसे छोड़ देने में कोई विशेष तुक नजर नहीं आती। (आज के सन्दर्भ में यहाँ बता दें कि भारत में सवा छह लाख से अधिक गाँव हैं और लगभग आठ हजार शहर और इन गाँवों में 99 प्रतिशत या इससे भी अधिक लोग अंग्रेजी नहीं बोल सकते। यह आँकड़ा इससे स्पष्ट हो सकता है, अगर मान लें कि एक गाँव में औसत 1300 लोग हैं, तो क्या हर गाँव में 13 लोग ऐसे हैं, जो सारा काम अंग्रेजी में कर सकते हैं? और लगभग 35 करोड़ लोग जो शहरों में रहते हैं, क्या उनमें से पंद्रह करोड़ लोग भी ऐसे हैं जो अंग्रेजी में सब कुछ कर सकने में समर्थ हैं? और वह भी तब जब इस व्याख्यान के पचास साल बीत चुके हैं और अंग्रेजी का राज बरकरार है! यानि पिछले 160-70 सालों में अंग्रेजी के घोर प्रचलन के बावजूद भारत में 20 करोड़ लोग भी अंग्रेजी नहीं समझ पाए। - प्रस्तुतकर्ता) इसके अतिरिक्त इनका यह दावा भी है अँगरेजी-साहित्य के अध्ययन के कारण ही भारत में राष्ट्रीय भावना जागरित हुई और भारत में लोग यह सोचने लगे कि हम किसी जाति-विशेष या प्रदेश-विशेष के न होकर सब भारत-माता की सन्तान हैं, अत: अँगरेजी हमारी राष्ट्रीयता की जननी है, पोषिका है। इसलिए, यदि अँगरेजी हमारे देश से हट गई, तो परस्पर विचार-विनिमय के अभाव के कारण और राष्ट्रीय एकसूत्रता के अभाव के कारण हमारा राष्ट्र छोटी-छोटी इकाइयों में बँट जायगा। (अगर अंग्रेजी ही राष्ट्रीयता की जननी है तो 1757 में पलासी का युद्ध लड़ने वाले सिराजुद्दौला बंगाल से, 1857 में लड़ने वाले वीरकुँवर सिंह बिहार यानि उत्तर भारत से, लक्ष्मीबाई मध्य भारत से, नाना साहब पेशवा, दक्षिण से टीपू सुल्तान जैसे लोगों ने कब अंग्रेजी की शिक्षा ली और अंग्रेजी के जानकार कब बन गये? कहा जा सकता है कि ये सब राजघराने के थे। लेकिन 1857 के संघर्ष में अंग्रेजी भाषा और उसके द्वारा बनाई गई एकता का पर्दाफ़ाश हो जाता है। - प्रस्तुतकर्ता) कुछ अँगरेजी के पक्षपाती यह तर्क भी उपस्थित करते हैं कि अँगरेजी ही ऐसी भाषा है, जिसके मनन और अध्ययन में हमारे देश के विभिन्न प्रदेशवालों को एक समान प्रयास करना पड़ता है, एक-सी ही कठिनाइयों से संघर्ष करना पड़ता है; किन्तु यदि भारत की कोई एक भाषा भारत की राजभाषा बन गई, तो अन्य प्रदेशवालों को अन्य भाषाभाषियों की अपेक्षा राजकीय जीवन में अधिक सुविधाएँ प्राप्त हो जायँगी और इस प्रकार अन्य प्रदेशवासियों के प्रति यह घोर अन्याय होगा। कहते हैं कि जादू वह, जो सिर पर चढ़कर बोले। अँगरेजों का जादू इस सम्बन्ध में पूरा उतरता है। वे चले गये, किन्तु, जो मन्त्र वे फूँक गये थे, जो पट्टी वे पढ़ा गये थे, वह वह आज अपना पूरा प्रभाव दिखा रही है। इस बात को आपलोग भूले न होंगे कि अँगरेज भारत में अपने राज्य के पक्ष में मुख्यत: यही तर्क देते थे कि भारत की एकता उसी राज्य की नींव पर आधृत है। (यानि एकता के लिए ब्रिटिश शासन की जरूरत है, तो आज भी बुला लें अंग्रेजों को फिर से? -प्रस्तुतकर्ता) उनके आने के पहले भारत छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटा था और उसकी जनता राष्ट्रीयता से सर्वथा अपरिचित थी। (यह सही है कि छोटे-छोटे राज्यों में देश बँटा था लेकिन भारत का नाम कहाँ से आया? दुष्यन्त की कहानी गलत हो सकती है लेकिन उसके पुत्र भरत के नाम पर भारत देश कैसे हुआ? महाभारत की कथा काल्पनिक हो सकती है लेकिन अंग्रेजों से हजारों साल पहले महाभारत में अर्जुन के लिए भारत संबोधन कैसे आया? प्रस्तुतकर्ता) भारत में उनकी यह गर्वोक्ति थी कि जबतक भारत में हमारा राज्य है, तभी तक भारत में एकता है, यदि हम यहाँ से एक क्षण के लिए भी अपना प्रभुत्व हटा लेंगे, तो भारत के पुन: टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे और यहाँ परस्पर ऐसी मार काट मच जायगी, ऐसा अनाचार और अत्याचार फैल जायगा कि किसी भी भारतीय कुमारी का सतीत्व बचा न रहेगा। (और अंग्रेजों ने किसी का सतीत्व-हरण नहीं किया था! यहाँ बस एक सवाल उठाना है कि अंग्रेज भारत की एकता पर इतना ध्यान क्यों रखे हुए थे। इतना प्रेम उन्हें भारत से था तब हिन्दी-उर्दू को दो अलग भाषा मानकर पढ़वाना क्यों शुरु किया गया। जबकि हिन्दी-उर्दू भाषाएँ अंग्रेजों के आने के पहले अलग दो भाषाएँ नहीं थीं। और अंग्रेजों द्वारा ही क्यों किया गया? देश का विभाजन करने की बात मुगल काल से लेकर 1947 तक कब की गयी? सिर्फ़ अंग्रेजों के आने के बाद ही, ऐसा क्यों? और क्यों अंग्रेजों को भारत की एकता में इतनी रुचि थी? बड़े निर्मल हृदय और महात्मा लोग थे वे? प्रस्तुतकर्ता ) उनका यह भी तर्क था कि इस देश के विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों, विभिन्न भाषाभाषी और प्रादेशिक जातियों के अधिकार की रक्षा वे निष्पक्ष भाव से करते हैं और सबको सम न्याय प्रदान करते हैं, किन्तु यदि वे चले गये, तो भारत का सम्प्रदाय-विशेष या जाति-विशेष या प्रदेश-विशेष, दूसरे सम्प्रदायों, दूसरी जातियों और प्रदेशों पर छा जायगा और उनको पैरों-तले रौंद देगा। आप देखेंगे कि अँगरेजों के इन्हीं तर्कों की पुनरावृत्ति आज हमारे अँगरेजी के हिमायती इस सम्बन्ध में कर रहे हैं। अपने गौरांग गुरुओं की शिक्षा का कितनी कुलता से वे पालन कर रहे हैं। किन्तु, ये सब तर्क थोथे हैं, निराधार हैं। थोड़े-से विचार से यह स्पष्ट हो जायगा कि इस सब स्वार्थ के पीछे उनका वैसा ही स्वार्थ है, जैसा कि अँगरेजी का स्वार्थ उनके अपने राज्य के समर्थन के पीछे था। अँगरेजी के द्वारा इन लोगों के लिए यह सम्भव हो रहा है कि वे भारत की जनता के कन्धे पर बैठकर भारत की जनता से उसी प्रकार परिश्रम कराकर, जैसा कि अँगरेज कराते थे, स्वयं सुख भोगें, गुलछर्रे उड़ायें। सिन्दबाद नाविक की कहानी में जिस प्रकार हम पढ़ते थे कि सिन्दबाद की गरदन पर सवार होकर उसके गले को अपने पाँवों में कसकर और दबाकर उस व्यक्ति ने सिन्दबाद को दौड़ाया, उससे परिश्रम कराया और स्वयं आनन्द भोगा, उसी प्रकार आज ये ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज से निकले श्याम वर्णवाले, (दुर्योग से आज भी ऐसे लोग हैं जिन्हें इस सन्दर्भ में देखा जा सकता है। नाम लेने की आवश्यकता नहीं है, जो इन जगहों से निकलकर आए हैं। - प्रस्तुतकर्ता) किन्तु आँग्ल चेतना और आत्मावाले हमारे देश की जनता के कन्धे पर कसकर आसन जमाये बैठे हैं और हर प्रकार से उनका शोषण कर रहे हैं तथा भोली-भाली विभिन्न प्रदेशों की जनता को विमुख करने को इस प्रकार के तर्क दे रहे हैं। नहीं तो, क्या वे यह नहीं जानते कि इस देश में अँगरेजी जाननेवालों की संख्या एक प्रतिशत से अधिक नहीं हैं और इस एक प्रतिशत की एकता भारत की एकता नहीं कही जा सकती। क्या इस बात से इनमें से कोई भी इनकार कर सकता है कि आज भी लाखों की संख्या में सुदूर दक्षिण के ग्रामवासी, जिन्हें अँगरेजी  का एक शब्द भी नहीं आता, उत्तर-भारत के काशी, मथुरा, हरद्वार और बदरीनाथ जैसे महान् तीर्थ-स्थानों में प्रतिवर्ष यात्रा के लिए आते हैं। क्या यह बात सत्य नहीं है कि उत्तर-भारत के अनेक ग्रामवासी सुदूर रामेश्वरम् की यात्रा करने के लिए सहस्रों की संख्या में जाते हैं? क्या इन लोगों का काम अँगरेजी के बिना नहीं चलता? क्या वे अपने सब धार्मिक संस्कार और जीवन के अन्य व्यापार अपनी यात्रा में हिन्दी के माध्यम द्वारा नहीं करते? क्या यह सत्य नही है कि भारत के प्रत्येक धार्मिक तीर्थस्थान में हिन्दी जाननेवाले पण्डे नहीं मिलते या नहीं होते, तब फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि भारत के विभिन्न प्रदेशवासियों के विचार-विनिमय का माध्यम केवल अँगरेजी है? आसाम के चाय-बगानों में, कलकत्ता के बड़े बाजार में, बम्बई की चौपाटी पर और सुदूर दक्षिण में सर्वत्र ही हमें हिन्दीभाषा-भाषी श्रमिक कार्य करते मिलते हैं, हिन्दी भाषा-भाषी व्यापार करते मिलते हैं, हिन्दी भाषा-भाषी पण्डे धार्मिक संस्कार करते मिलते हैं। सचमुच यह महान् आश्चर्य की बात होती, यदि ऐसा न होता। अँगरेजी तो सभी अभी कुल एक सौ वर्ष से ही इस क्षेत्र में आई थी। उससे पहले भी हमारे देश के विभिन्न प्रदेशों में विचार और वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था। अत: स्वाभाविक ही मध्यदेश की यह भाषा हिन्दी उस विचार-विनिमय का माध्यम बन गई थी और बनी रही और बनी रहेगी।

अतीत और वर्त्तमान के वर्ग-संघर्ष और विग्रह का कारण कौन?
    
     अँगरेजी-वर्ग अधिक-से-अधिक यही कह सकता है कि उसकी अपनी एकता अँगरेजी के आधार पर है, यद्यपि इस सम्बन्ध में भी पूरी-पूरी शंका की जा सकती है। यदि वर्त्तमान भारतीय राजनीतिक कलह का वास्तविक कारण ढूँढा जाय, तो हमें यह पता चलेगा कि इस अँगरेजी से मोह रखनेवाले व्यक्तियों में ही परस्पर सर्वाधिक द्वेष और स्पर्द्धा वर्त्तमान है। क्या यह सत्य नहीं है कि भारत की राजनीति में जो विष-वृक्ष बोया गया, वह उन लोगों ने बोया या उन लोगों के माध्यम द्वारा बोया गया, जो इस बात के लिए लालायित थे कि अँगरेजी साम्राज्य द्वारा इस देश की जनता से दुही जानेवाली सम्पत्ति में उनका भी कुछ साझा हो जाय! अँगरेजी साम्राज्य के तंत्र में छोटी-मोटी नौकरी पाने के लिए कौन लालायित था, वही तो जिसने यह अँगरेजी पढ़ ली थी। नौकरियाँ थोड़ी थीं और अँगरेजी पढ़े-लिखे अधिक। अत:, इन अँगरेजी पढ़े-लिखे लोगों ने परस्पर एक-दूसरे की जड़ काटने के लिए हर प्रकार के साम्प्रदायिक, प्रादेशिक और भाषा-जाति-विभेद पैदा किये और उन्हें तीव्रातितीव्र किया। क्या यह सत्य नहीं है कि पाकिस्तान के आन्दोलन के जन्मदाता इसी अँगरेजी-वर्ग के कुछ लोग थे? उन्होंने भोली-भाली जनता को अपने स्वार्थ के लिए गुमराह किया और देश को टुकड़े-टुकड़े कर डाला। क्या यह सत्य नहीं है कि इसी अँगरेजी-वर्ग के कुछ लोगों ने अँगरेजी कि शह पर इस देश में उत्तर और दक्षिण का प्रश्न उठाया और उत्तरवासियों के विरुद्ध दक्षिण क कुछ प्रदेशों में एक प्रकार का जेहाद प्रारम्भ कर दिया। यदि ऐसा न होता तो आश्चर्य की बात होती। जिन लोगों ने सर्वप्रथम अँगरेजी पढ़नी प्रारम्भ की थी, उन लोगों ने उसका अध्ययन ज्ञानोपार्जन-विज्ञान और दर्शन के ज्ञान के लिए नहीं किया था, वरन् हमारे देश के पूज्य गुरुजनों के आदेश की अवहेलना कर अधिकांशत: इस प्रयोजन से प्रारम्भ किया था कि वे भी अँगरेजी राज्य की लूट में कुछ हिस्सा पाये। हो सकता है कि कुछ ऐसे व्यक्ति रहे हों, जिन्होंने अँगरेजी का अध्ययन अँगरेजी की सफलता का रहस्य जानने के लिए आरम्भ किया हो, किन्तु ऐसे संख्या नगण्य थी। किन्तु, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अधिकांशत: ऐसे लोग स्वार्थरत थे, अपने ही निजी सुख और समृद्धि की भावना से प्रेरित थे। भला वे लोग भारत की एकता की बात सोचें, यह तो महान् आश्चर्य की बात होती! (दक्षिण के नाम भाषाई झगड़े फैलाने वाले लोग, गाँधी जी के जीते जी क्यों न बोले? गाँधी के मरते ही कौन लोग थे, जिन्होंने अंग्रेजी को पंद्रह वर्षों तक रखने के लिए कहा और इनकी बात मानने के बावजूद आज 60 साल से अधिक समय बीत जाने पर भी अंग्रेजी ज्यों-की-त्यों नहीं है, बल्कि बढ़ रही है। अंग्रेजी के पक्षधर और इसके ज्ञाता 1950 में 50 लाख भी न थे। फिर भी क्यों अंग्रेजी को स्वीकार किया गया था और वह पंद्रह वर्षों तक के लिए। ये सभी लोग अंग्रेजी की बजाय दूसरी भाषाओं को पढ़ना और समझना ही नहीं चाहते। और इस चलते तानाशाही ढंग से 50 लाख लोग 35-40 करोड़ लोगों पर अपनी मर्जी थोपते हैं। सवाल यह भी है कि क्यों ऐसा किया गया? लेकिन देश के दुर्भाग्य से ऐसा हुआ है और उसे कौन बदलेगा? - प्रस्तुतकर्ता)

हम इन्हें दुभाषिया कहें या बहुरुपिया?

     यह बात आज भी है कि जो लोग अँगरेजी की हिमायत करते हैं, उनमें से निन्यानबे प्रतिशत भारत की एकता की बात मन में नहीं रखते। वे केवल इस एकता की दुहाई अपनी स्वार्थ-पूर्ति के लिए देते हैं। नहीं तो क्या यह प्रश्न उनके मन में नहीं उठता कि आज अँगरेजी के कारण भारत की निन्यानबे प्रतिशत जनता और राज्य के बीच खाई पैदा हो गई है और बढ़ती जा रही है। क्या उनको यह सोचने का समय नहीं मिलता कि अँगरेजी के कारण आज भारत के निन्यानबे प्रतिशत नागरिक राज-दरबार में प्रवेश नहीं कर पाते। उनकी सन्तान को कहीं कोई राजपद नहीं मिलता। (लेकिन एक ग्रामीण युवक या युवती किसी बड़े पद पर पहुँच जायँ, तो यह पूरे देश के लिए समाचार बन जाता है। इसका क्या अर्थ है? यही न कि गाँव के लोग अगर ऐसा कर दें तो यह असमान्य है? यहाँ एक बात आपको याद दिला दें कि जब कोई अंग्रेज भारत में अधिकारी बनकर आता था, तब हिन्दी की परीक्षा उसके लिए अनिवार्य थी और वह भी सन् 1900 के पहले भी, लेकिन आज हम आजाद देश के भारत में भारतीय प्रशासनिक सेवा में किसे अनिवार्य देखते हैं? अंग्रेजी को। यह तरक्की की है भारत के लोगों ने, नेताओं ने, तथाकथित बुद्धिमानों ने। संसार का ऐसा कोई देश मैं तो नहीं जानता जहाँ विदेश सेवा के अतिरिक्त इस तरह की अनिवार्यता हो कि अपने देश में काम करने के लिए हम किसी दूर के देश या दूसरे ग्रह की भाषा जानें। यह एक दुखद सच है।  क्यों अंग्रेजों के लिए हिन्दी की परीक्षा अनिवार्य थी? उन्हें मालूम था कि भारत की मुख्य भाषा कौन है लेकिन इन अंग्रेजी-भक्तों को मालूम नहीं है यह! प्रस्तुतकर्ता) वे मूक, निरीह, असहाय रहते चले आ रहे हैं, उनके हृदय में यह भावना जागरित नहीं हो पाती कि यह राजतन्त्र, यह देश की सम्पत्ति, इस देश की विशाल भूमि, इसके नदी-पहाड़ सब उनके हैं। आज भी वे अकिंचन बने हुए हैं और यही समझते हैं कि उनके सर पर बैठी सरकार ही उनकी भाग्यविधात्री है, वे स्वयं उनके संचालक नहीं। क्या भारत की एकता के लिए यह आवश्यक नहीं कि भारत के जन-जन के हृदय में यह विचारधारा तरंगित होने लगे कि हम सबका भाग्य एक है, हम सबकी सम्पत्ति एक है, हम सबका इतिहास एक है। मैं विनम्रता से पूछ्ता हूँ कि क्या यह बात अँगरेजी भाषा के द्वारा सम्भव है? क्या यह स्पष्ट नहीं कि यदि अँगरेजी के माध्यम द्वारा यह सम्भव होती, तो फिर हमारे ग्रामों में हमारी साधारण जनता से ये लोग अँगरेजी भाषा के माध्यम द्वारा वार्त्तालाप करते, अपने व्याख्यान अँगरेजी में देते। मैं इस बात की चुनौती देता हूँ कि ये लोग अँगरेजी के द्वारा भारत की एकता बनी रहने की बात कहते हैं, वे जरा साहस कर हमारे गाँवों में जाकर हमारी जनता से केवल अँगरेजी में बोलें और अपने इस तर्क को चरितार्थ करें। पर, मैं जानता हूँ कि उनमें से एक में भी यह सामर्थ्य नहीं। इन्हें हम दुभाषिया कहें या बहुरुपिया? कैसा महान आश्चर्य है कि देश की एकता को छिन्न-भिन्न करनेवाले देश की एकता की दुहाई दें। देश की राष्ट्रीयता को तिलांजलि देनेवाले, इस देश की वेष-भूषा, खान-पान, आचार-विचार, रीति-रिवाज, इतिहास और संस्कृति का उपहास और तिरस्कार करनेवाले व्यक्ति और पाश्चात्य योरप, विशेषत: इंग्लैण्ड को अपना सांस्कृतिक और आध्यात्मिक घर और देश माननेवाले व्यक्ति राष्ट्रीयता का यह बाना दिखाने के लिए पहन लें। इनकी राष्ट्रीयता का अर्थ इस देश को छोटा इंग्लैण्ड बनाना (आज के सन्दर्भ में अमेरिका। क्योंकि यहाँ बार-बार नकल बनने यानि छायाप्रति बनने की कोशिश होती है। आज अमेरिका है तो अमेरिका, कल जर्मनी है तो जर्मनी और इस तरह बस पीछे-पीछे चलने की तैयारी रहती है और इस काम में भी बार-बार मुँह की खानी पड़ती है। - प्रस्तुतकर्ता) है और इसीलिए यह स्वाभाविक है कि अपने उस स्वप्न के निर्माण के लिए ये लोग अँगरेजी भाषा को अनिवार्य समझें। किन्तु यदि विचारपूर्वक हम सोचें, तो स्पष्ट पता चल जायगा कि हमारे देश में राष्ट्रीय भावना का उद्भव किसी भी तरह अँगरेजी के द्वारा नहीं हुआ। राष्ट्रीय भावना की उत्पत्ति किसी भी जाति में उस समय होती है, जब वह आर्थिक विकास की उस स्थिति में पहुँच जाती है, जब केवल ग्राम, केवल नगर अथवा केवल जनपद के क्षेत्र में हो, उसका आर्थिक व्यापार सीमित नहीं रहता और नहीं रह सकता। उस समय इन छोटी इकाइयों की सीमा को लाँघकर अनेक नगरवासी, अनेक ग्रामवासी और अनेक जनपदवासियों के हृदय परस्पर बिंध जाते हैं और उन्हें यह दिखने लगता है कि हमारे हित दूसरे देशवासियों के हित से पृथक् हैं और परस्पर एक हैं। कभी-कभी राष्ट्रीय भावना की जागृति उस समय होती है, जब एक जाति का किसी विदेशी जाति से संघर्ष हो जाता है। (यह वाक्य अवश्य ध्यान रखें। इसका सबूत गली में, घर में, विद्यालय में, जिले में, राज्य में हर जगह हर दिन देखने को मिलता है। आज भी जब कभी किसी समुदाय का संघर्ष किसी दूर के समुदाय से होता है, तब वह समुदाय एकजुट होकर पहले दूर के समुदाय से लड़ता है और उसके हर सदस्य में सामुदायिक भावना का जन्म होता है। यह एक सार्वभौम सत्य जैसा है। - प्रस्तुतकर्ता) हमारे देश में इस प्रकार की आर्थिक स्थिति यान्त्रिक और शक्ति-चालित उद्योग के विकास के कारण पैदा हुई और फैली है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है, जिसकी पुष्टि आपको इटली, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों में राष्ट्रीय भावना की जागृति के इतिहास से मिल जायगी। यह संसार-विदित है कि आयरलैण्ड में राष्ट्रीय भावना का उद्रेक उस भाषा के पुनर्निमाण से हुआ, जिसका अँगरेजों ने बीज तक लगभग नष्ट कर दिया था। आयरलैण्ड के राष्ट्रीय नेता गैलिक भाषा के पुनर्निर्माता थे, पुन:प्रतिष्ठाता थे। क्या यह सत्य नहीं है कि हमारे देश में भी काँगरेस का आन्दोलन तब तक निष्प्राण था, जब तक वह केवल अँगरेजी जाननेवाले वर्ग तक सीमित था और उसमें जीवन-ज्योति उसी समय जगी, जब पूज्य बापू ने हिन्दी को और भारतीय भाषाओं को उस आन्दोलन का आधार बनाया और ग्राम-ग्राम में, नगर-नगर में भारतीय भाषाओं के माध्यम द्वारा स्वाधीनता का अलख जगा दिया। भारतीय राष्ट्रीयता का इतिहास जनसाधारण का इतिहास है। आज यदि अँगरेजी जाननेवाला वर्ग इस महान् सृष्टि को हथिया लेना चाहता है, इसका गौरव अपना बना लेना चाहता है, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। जिसकी रग-रग में स्वार्थ बसा है, उससे और क्या आशा की जा सकती है? पर, उनके लिए यह सम्भव नहीं कि वे इस बनी-बनाई राष्ट्रीयता को कायम रख सकें। क्या यह स्पष्ट नहीं है कि अँगरेजी का यदि आधिपत्य बना रहा, यदि उसने अपना शोषण कायम रखा, तो भारतीय जन-जीवन शोषक और शोषितों के परस्पर संघर्ष से खण्ड-खण्ड हो जायगा। कैसे अचम्भे की बात है कि ये लोग भी न्याय की बात करते हैं। पर, ऐसा लगता है कि न्याय की इनकी अपनी विशेष परिभाषा है। सम्भवत:, ये लोग इस बात को न्याय नहीं समझते कि भारत के प्रत्येक नर-नारी के लिए यह सुविधा प्राप्त हो कि वह इस देश के राजतन्त्र में सुगमता से प्रवेश कर सके, राजकाज के संचालन में भाग ले सके, राजपदों पर आसीन हो सके। यदि ये लोग इस बात को न्याय मानते, तो क्या ये यह न सोचते कि यह बात तबतक सम्भव न होगी, जबतक कि भारत का राजतन्त्र अँगरेजी में लिपटा रहेगा। जैसा मैं अभी कह चुका हूँ कि भारत के निन्यानबे प्रतिशत जनता के लिए यह सम्भव नहीं है कि वह इस राजतन्त्र में किसी प्रकार से भाग ले सके और वह इसलिए सम्भव नहीं है कि वह अँगरेजी नहीं जानती और इस राजतन्त्र के द्वार पर बड़े मोटे अक्षरों में लिखा है कि अँगरेजी न जाननेवालों के लिए यहाँ प्रवेश निषिद्ध है। (न्यायालयों की भाषा का ध्यान रहे और यह भी कि भारत के उच्चतम न्यायालय में निम्नतम व्यवस्था के तहत अंग्रेजी का राज आज तक बना हुआ है। देश के लोग बस एक वोट बन कर रह गए हैं और इससे अधिक उनका महत्व नहीं है। - प्रस्तुतकर्ता) सम्भ्वत:, इन लोगों की न्याय की परिभाषा वही है, जो साधारण दफ्तरी लोगों की होती है। दफ्तरों में काम करनेवाला प्रत्येक व्यक्ति यह मानता है कि उसकी तरक्की हुई, तो न्याय हुआ और तरक्की न हुई, तो अन्याय अर्थात् वहाँ निजी स्वार्थ का दूसरा नाम न्याय है। जब ये लोग न्याय की बात करते हैं, तब वहाँ भी यही गन्ध आती है, नौकरी में हमारी प्रगति रुक जायगी, हम नौकरी में उतने आगे नहीं बढ़ पायेंगे , जितने अन्य; अर्थात् इनके निजी स्वार्थ का ही नाम न्याय है। पर, ये लोग इस बात को प्रदेश-प्रदेश के बीच न्याय का बाना पहना देते हैं, मानों इनके अपने प्रदेश में ये स्वयं अपनी साधारण जनता के प्रति न्याय कर रहे हों, उसके अधिकारों की रक्षा के लिए लालायित हों। स्वयं अपने स्वार्थ पर डटे रहकर, अपनी ही वैयक्तिक प्रगति को ध्यान में रखकर और अपनी जनता के प्रति पूर्ण अन्याय करते रहकर ये लोग न्याय की दुहाई दें, इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है? अँगरेजी ही परस्पर इन प्रदेशों में नौकरी के सम्बन्ध में समता रख सकती है, इससे बड़ी अनर्गल बात और क्या हो सकती है? क्या इन लोगों को यह नहीं दिखाई पड़ता कि इसी तर्क के आधार पर उन्हें एक दिन अँगरेजों को भी वापस बुलाना पड़ेगा। यदि भारत में भारत की किसी भाषा के प्रयोग से अन्य प्रदेशों के प्रति अन्याय होगा, तो फिर क्या भारत के किसी प्रदेश के व्यक्ति के हाथ में नेतृत्व जाने से इन लोगों को अन्य प्रदेशों के प्रति अन्याय न लगेगा, और तब क्या ये लोग इस बात की दुहाई न देने लगेंगे कि भारत का नेता भारतीय न होना चाहिए, वह तो इनके आँग्ल गुरुओं में से एक होना चाहिए। मैं आप सबका ध्यान इस भयावह बात की ओर विशेषतः खींचना चाहता हूँ कि जो देशभाषा को विदेशी मान सकते हैं, वे देश-भाई को भी विदेशी मान सकते हैं और अपने भाई का गला काटने के लिए विदेशियों को भी आमन्त्रित कर सकते हैं।

प्रजातन्त्र की सफलता क्या अँगरेजी पर निर्भर है?

      न्याय शब्द का जिस प्रकार उल्टे अर्थ में ये लोग प्रयोग करते हैं, सम्भवत: उसी प्रकार इनके प्रजातन्त्र शब्द का अर्थ है। साधारणत: प्रजातन्त्र से यही बोध होता है कि प्रजा अपना शासन स्वयं करे, राजतन्त्र में उसका प्रमुख भाग हो। अपनी राजनीतिक समस्याओं पर वह स्वयं सोच-विचार कर अपनी नीति निर्धारित करे। स्पष्ट है कि ऐसा राजनीतिक तन्त्र तभी स्थापित हो सकता है, जब उसका सारा कामकाज जनता की अपनी भाषा में हो। अत:, जब भी कोई देश साम्राज्यवादिता के चंगुल से छूटकर स्वतन्त्र हुआ है, उसने तुरन्त अपना सारा कामकाम अपनी जनता की भाषा में करना आरम्भ कर दिया है। संसार के इतिहास में अन्यत्र ऐसा कोई उदाहरण न मिलेगा, जहाँ स्वतन्त्र देश अपनी भाषा में अपना राजकाज न चलाता हो। केवल हमारा ही अनोखा देश है जो स्वतन्त्र कहलाता है, किन्तु जिसका राजकाज देश की भाषा में न होकर उस भाषा में होता है, जो हमारे पिछले शासकों की भाषा थी और जिसे हमपर उन्होंने अपनी राजनीतिक शक्ति का प्रयोग कर लादा था। इससे भी अनूठी बात यह है कि यहाँ का राजतन्त्र प्रजातन्त्र कहलाता है, जबकि यहाँ कि निन्यानबे प्रतिशत जनता उस भाषा से सर्वथा अपरिचित है, जिसमें यहाँ का सारा राजकाज यहाँ का शासक-वर्ग करता है। इस अनोखेपन पर गर्व करें या आँसू बहायें? पर, कैसा आश्चर्य है कि यहाँ अँगरेजी  जाननेवाला वर्ग कहता है कि यदि अँगरेजी भाषा न रखी गई, तो इस देश में प्रजातन्त्र का प्रयोग सफल न हो सकेगा। इन लोगों के अनुसार प्रजातन्त्र हमने इंग्लिश्तान से आयात किया है। इन लोगों का कहना है कि प्रजातान्त्रिक प्रणाली और संसदीय राजतन्त्र जगत् को इनके परम गुरु इंगलैण्ड की देन है। इंग्लैण्ड की इस अपूर्व देन के हृदय-तल में अँगरेजी बसी हुई है। तत्सम्बन्धी सारा साहित्य अँगरेजी भाषा में है। उसकी पारिभाषिक शब्दावली अँगरेजी  भाषा में है। उसका विधि-विधान सब अँगरेजी में है। अत:, यदि हमें इस प्रजातान्त्रिक और संसदीय प्रणाली को सफल बनाना है, इसकी जड़ें इस देश में मजबूत करनी हैं, तो हमें अँगरेजी भी अपने यहाँ रखनी है और उसके माध्यम द्वारा अपना कामकाज चलाना है। मुझे इस बात पर आश्चर्य नहीं कि ये लोग समझें कि इस जगत् में जो कुछ श्रेष्ठ है, जो कुछ सुन्दर है, जो कुछ उपास्य है, वह सब इनके परम गुरु इंग्लैण्ड का है और इंग्लैण्ड में है। किन्तु, इस बात को समझने के लिए तर्क की आवश्यकता नहीं कि प्रजातान्त्रिक प्रणाली का कुछ विशिष्ट सम्बन्ध नहीं है। फ्रांस की राज्यक्रान्ति तक इंग्लैण्ड में केवल सामन्तों का राज्य था और वहाँ जनसाधारण को बालिग मताधिकार तो पिछले प्रथम महायुद्ध के पश्चात् मिला। इसके विपरीत युग-युगान्तर से हमारे देश में अपने सामाजिक और सामूहिक मामलों की व्यवस्था ग्राम-पंचायतों के द्वारा करने की परिपाटी चली आ रही थी और हमारे देश के लोग उस परिपाटी में अभ्यस्त थे। मैं नहीं जानता कि अँगरेजी-वर्ग के लोग उस पंचायत-प्रणाली को प्रजातान्त्रिक प्रणाली मानने के लिए तैयार हैं या नहीं। समाजशास्त्र के निष्पक्ष विद्यार्थी तो उस प्रणाली को प्रजातान्त्रिक प्रणाली का आदि रूप सर्वदा स्वीकार करते रहे हैं। तथ्य तो यह है किसी भी देश की शासन-प्रणाली उसी देश के आदर्शों और भावनाओं के अनुसार होती है। अत:, हमारे देश में भी वर्त्तमान प्रणाली की सफलता, विफलता, हमारे इतिहास, हमारी आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था, हमारे आदर्शों और भावनाओं पर निर्भर करेंगी, न कि अँगरेजी पर, चाहे हम कैसी ही दृढ श्रृंखला से अपने को इंग्लैण्ड के चौखट से कसकर कितना ही क्यों न बाँध लें, चाहे हम मे की संसदीय प्रणाली की प्रसिद्ध पुस्तक के कितने ही पारायण क्यों न करें, हमारे देश का राजतन्त्र उस रूप में कार्य नहीं कर सकता, न ही कर सकेगा, जिस रूप में कि इंग्लैण्ड में कार्य करता रहा है। अत:, इस बात में लेशमात्र भी तथ्य नहीं कि अँगरेजी बनाये रखने से हम अपने इस तन्त्र को ठीक उसी ढर्रे पर चला सकेंगे, जैसा कि वह इंग्लैण्ड में चलता है। यह हमारा अपना है, इसका निर्माण हमारी सर्वप्रभुतासम्पन्न जनता ने अपनी संविधान-सभा के द्वारा किया है। यह हमारे देश की समस्याओं को ध्यान में रखकर बना है और इसमें अनेक ऐसी बातें हैं, जो न तो इंग्लैण्ड में और न इंग्लैण्ड के किसी अधिराज्य में पाई जाती हैं। अत:, इस बात का प्रयास करना कि यह पूर्णतया भारतीय राजतन्त्र इंग्लैण्ड के राजतन्त्र के ही ढर्रे पर चले, इस तन्त्र का अपमान है और हमारे देश का एवं जनता का अपमान है। कम-से-कम इस आधार पर अँगरेजी को रखने का समर्थन तो घाव पर नमक छिड़कने के समान है।

देश के द्रुत आर्थिक विकास के लिए अँगरेजी की आवश्यकता एक भ्रम

            सबसे अनोखी बात जो अँगरेजी के पहले पक्षपाती उसके समर्थन में कह देते हैं; वह यह है कि हमारे द्रुत आर्थिक विकास के लिए अँगरेजी की परम आवश्यकता है। कहा यह जाता है कि द्रुत आर्थिक विकास के लिए हमें अनेक इंजीनियर, शिल्पी और वैज्ञानिक चाहिए। हमारे पास इस समय सारा साहित्य अँगरेजी में उपलब्ध है और भारतीय भाषाओं में वह साहित्य उपलब्ध नहीं है। अत: हम, पर्याप्त संख्या में इंजीनियर, वैज्ञानिक और शिल्पी इस अँगरेजी साहित्य के द्वारा शीघ्रातिशीघ्र तैयार कर सकते हैं। यदि हम थोथी राष्ट्रीय भावना से बँधे रहकर यह प्रयास करें कि हमारी देशी भाषाओं के माध्यम द्वारा हम अपने विद्यार्थियों को इन विषयों की शिक्षा दें, तो हमें अनेक वर्ष व्यर्थ में यह साहित्य अपनी भाषाओं में तैयार करने के लिए खो देने पड़ेंगे और इस प्रकार हमारा आर्थिक विकास न हो पायगा। जिस ढंग से यह बात कही जाती है, उससे ऐसा लगता है कम-से-कम यह तर्क तो अकाट्य है। किन्तु, है यह भी धोखे-भरी बात। अबतक हम सब यही समझते रहे हैं और मानते रहे हैं कि शिक्षा का मूलमन्त्र परिचित के आधार पर अपरिचित का बोध कराना है। इसी कारण संसार-भर के शिक्षाशास्त्री यह मानते हैं कि मातृभाषा के माध्यम द्वारा समय और शक्ति की पूर्ण मितव्ययिता के साथ और अत्यन्त तीव्र गति से बालक को शिक्षा दी जा सकती है। अत:, यह स्पष्ट है कि भारत में तीव्रातितीव्र गति से देशवासियों को शिक्षित करने का माध्यम अँगरेजी हरगिज नहीं हो सकती। केवल अँगरेजी सीखने में ही हमारे विद्यार्थी को कम-से-कम दस वर्ष व्यतीत कर देने पड़ते हैं। इसके विपरीत अच्छा कामचलाऊ ज्ञान एक-दो वर्ष में ही हो जाता है। स्पष्ट है, यदि हम अपने देश में हर प्रकार की शिक्षा अपनी मातृभाषा द्वारा अपने युवकों को दें, तो वह लगभग आधे समय में उतना ज्ञानोपार्जन कर लेंगे, जितने में कि आज वे अँगरेजी के माध्यम द्वारा करते हैं। हर विद्यार्थी के कम-से-कम पाँच-छह वर्ष बच जायेंगे और यदि हम इन वर्षों को विद्यार्थियों की संख्या से गुणा कर दें, तो हमको पता चलेगा कि हम अपने देशवासियों के लाखों वर्ष इस प्रकार बचा लेंगे और जो समय इस प्रकार बचेगा, उसे देश विभिन्न प्रकार अधिकाधिक आर्थिक विकास में लगा सकेंगे। यह दलील कि हमारी भाषाओं में साहित्य नहीं है, कुछ महत्त्व नहीं रखती। यदि हमने उस धन और समय का, जो हम आज अँगरेजी-माध्यम के कारण व्यर्थ गँवा रहे हैं, शतांश भी आवश्यक साहित्य के निर्माण के लिए लगाया होता, तो अबतक हमारे पास अपनी भाषाओं में वर्षों पूर्व सब आवश्यक वैज्ञानिक और शिल्पिक साहित्य हो जाता। पर, हमारे अँगरेजी-वर्ग के लोगों ने ही हर प्रकार की बाधा खड़ी करके यह नहीं होने दिया। इस प्रकार के साहित्य का निर्माण तब होता है, जब उसके लिए माँग हो। किन्तु, जब अँगरेजी के माध्यम द्वारा ही शिक्षा दी जाती रहे, तो अपनी भाषाओं में ऐसे साहित्य का निर्माण होने का प्रश्न पैदा हो ही कैसे सकता है? न तो कोई लेखक और न कोई प्रकाशक इस बात के लिए तैयार होगा कि वह अपना समय और धन उस साहित्य के तैयार करने में लगाये, जिसकी माँग के सब द्वार यत्नपूर्वक पूर्णत: बन्द कर दिये गये हों। (जो लोग यह सवाल करते हैं कि हमारी भाषाओं में वैज्ञानिक साहित्य नहीं है, उनको यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इसकी वजह क्या है? लेकिन अगर आप सचमुच इस बात के लिए चिन्तित हैं, तब क्या सिर्फ़ यह कहने भर से काम हो जाएगा? एनरिको फर्मी जैसे लेखक की किताब भी आज से 40 साल पहले ही भारत में हिन्दी में उपलब्ध थी। हिन्दी अकादमियों और आयोगों जैसी संस्थाओं ने अभी तक हजारों वैज्ञानिक किताबों का प्रकाशन किया है। आप चाहें तो इन किताबों की जानकारी सारी अकादमियों से प्राप्त कर सकते हैं। इन किताबों के 35-40 से उपलब्ध होने के बावजूद न तो प्रचारित किया गया और न अपनी भाषा में विज्ञान पढ़ाने दिया गया। इसके पीछे की चाल आप समझ सकते हैं। -प्रस्तुतकर्ता)
(जारी…)

10 टिप्‍पणियां:

  1. @ आज भी इंग्‍लैण्‍ड के वैज्ञानिक इन तथ्‍यों की अभिव्‍यक्ति के लिए 'लातनी' या 'यूनानी' भाषा का सहारा लेते हैं। - यह तो अंगरेजों भाषाई सोच की उदारता का भी प्रमाण है.
    विद्यानिवास मिश्र की पुस्‍तक 'हिन्‍दी की शब्‍द संपदा' एक साथ इस आशय का तथ्‍य प्रस्‍तुत करती है, बिना तर्क के, रोचक और प्रभावी शैली में.
    हर भाषा-बोली का अपना सौंदर्य, अपना महत्‍व है. सभ्‍यता ने ज्ञान के क्षेत्र में अलग-अलग जबान में उपलब्धियां हासिल की हैं, वह भाषा-विशेष की नहीं, सभ्‍यता द्वारा अर्जित ही मानी जाती हैं, ऐसा ही मानना भी चाहिए.
    भाषा के नाम पर छुआ-छूत फैलाने का समर्थन नहीं किया जा सकता.
    हां, भारतेन्‍दु जी की इन पंक्तियों से भला कौन सहमत न होगा-
    'निज भाषा उन्‍नति अहै, सब उन्नति को मूल,
    बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।
    अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन,
    पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आदरणीय राहुल जी,

    यह भाषाई सोच की उदारता का नहीं बल्कि, विकल्पहीनता का प्रमाण है। हम संस्कृत के बिना असहाय जैसे हैं और वे उसके लैटिन और यूनानी के बिना। तुलनात्मक रूप से हिन्दी बहुत कम असहाय है अंग्रेजी अधिक।

    इस मामले में इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि अभिव्यक्ति के लिए हिन्दी(सिर्फ़ हिन्दी) अधिक सक्षम न कि सिर्फ़ अंग्रेजी(बिना लैटिन और यूनानी के। एक स्रोत से प्राप्त जानकारी के अनुसार मूल अंग्रेजी के शब्द मात्र 12000 हैं और एक जगह 65000 लेकिन मूल हिन्दी के अपने शब्द लाख में हैं। विज्ञान-जगत् में हमने जितने शब्द हिन्दी के पढ़े हैं, क्या उतने शब्द अंग्रेजी के हैं? उदाहरण के लिए हमें संस्कृत की ओर देखने की आवश्यकता नहीं है।

    और उदारता हिन्दी ने भी दिखाई है। कौन कह सकता है कि कैंची, कुर्ता जैसे शब्द हिन्दी के नहीं हैं? हमने तुर्की, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, अंग्रेजी, फारसी, अरबी सबके शब्द लिए हैं। और हर दिन हम इनमें से कई शब्दों का प्रयोग करते हैं लेकिन अंग्रेजीभाषी कितने ऐसे शब्दों का प्रयोग हर दिन करता है जो लैटिन और यूनानी के नहीं हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  3. हैप्पी फ़्रेंडशिप डे।

    Nice post .

    हमारी कामना है कि आप हिंदी की सेवा यूं ही करते रहें। ब्लॉगर्स मीट वीकली में आप सादर आमंत्रित हैं।
    बेहतर है कि ब्लॉगर्स मीट ब्लॉग पर आयोजित हुआ करे ताकि सारी दुनिया के कोने कोने से ब्लॉगर्स एक मंच पर जमा हो सकें और विश्व को सही दिशा देने के लिए अपने विचार आपस में साझा कर सकें। इसमें बिना किसी भेदभाव के हरेक आय और हरेक आयु के ब्लॉगर्स सम्मानपूर्वक शामिल हो सकते हैं। ब्लॉग पर आयोजित होने वाली मीट में वे ब्लॉगर्स भी आ सकती हैं / आ सकते हैं जो कि किसी वजह से अजनबियों से रू ब रू नहीं होना चाहते।

    उत्तर देंहटाएं
  4. यह लेख पढ़ कर जी जुड़ा गया. मेरी मातृभाषा पंजाबी थी. हिंदी के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं थी. लेकिन 1962-63 में इसी हिंदी आंदोलन के बारे में पढ़ कर मैं हिंदी की ओर आकर्षित हुआ था. मुझे खुशी है कि मैं हिंदी से आज भी जुड़ा हूँ. मेरा दृष्टिकोण यह है कि हिंदी में अधिकतम कार्य करना मुझे अच्छा लगता है. एक पोस्ट में आपने सही कहा था कि गोडसे ने गाँधी की हत्या करके हिंदी को बहुत हानि पहुँचाई है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. महत्वपूर्ण विषय उठाया है आपने.

    उत्तर देंहटाएं
  6. भाई इस ऐतिहासिक प्रस्तुति को प्रस्तुत कर आपने बहुत सही काम किया है। हमारी भी मतृभाषा मैथिली रही है, और बड़े से बड़े मीटिंग में हम हिन्दी में काम चलाते हैं। हमें पिछले दो दशकों से अधिक के सरकारी जीवन में कभी कोई कठिनाई नहीं हुई। जब तक हम नहीं आए थे इस क्षेत्र में तो हमारी भी धारणा थी कि बिना अंग्रेज़ी के काम नहीं चलेगा। पर अब इस सोच में परिवर्तन की ज़रूरत है।
    अपने कार्यकाल के दौरान हिन्दीतर भाषी क्षेत्रों में ही काम किया है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. हिन्दी की क्षमता अद्भुत है। कोई काम नहीं जो हि्न्दी में न किया जा सकता हो। हिन्दी जानते हुए भी यदि कोई कहे कि वह फलाँ काम हिन्दी में नहीं कर सकता तो उसे अपंग ही कहा जा सकता है।
    हिन्दी अपना स्थान प्राप्त करेगी, लेकिन उस के लिए हिन्दी प्रेमियों को बहुत कुछ करना होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  8. संस्कृत से युक्त होकर हिन्दी की कोई सानी नहीं है -मगर दुर्भाग्य है इसके दुश्मन अपने ही बने हुए है -एक दस्तावेजी आलेख को आपने अद्यतन किया है -साधुवाद!

    उत्तर देंहटाएं