बिहार में इंटर के परिणाम घोषित हो चुके हैं। इसलिए इस परिणाम पर कुछ कहने की इच्छा हो रही है। भारत में एक मौसम होता है परीक्षाओं का और दूसरा उनके परिणामों का। लाखों छात्र सबसे पहले परिणाम देखने के लिए बेचैन हो जाते हैं और एक होड़ शुरु हो जाती है कि पहले परीक्षा-परिणाम कौन जान जाता है? इसी बेचैनी का फायदा सारे साइबर-कैफे उठाना शुरु करते हैं। और जम कर लूटते हैं। अगर मैं हिसाब बताऊँ तो साफ हो जाएगा। छोटे शहरों में 20-25 से लेकर कभी-कभी 40 रूपये तक इस परिणाम के लिए वसूले जाते हैं। अगर एक घंटे में 40 छात्रों का भी परिणाम ये साइबर कैफे वाले देखें और अंक-पत्र छाप कर दें, तो 40 * 15(अगर पंद्रह रूपये भी लिए जाएँ तो) रूपये के हिसाब से 600 रूपये वसूल लिए जाते हैं। अब खर्च देखें तो इस एक घंटे में किसी भी जगह 60 रूपये भी खर्च नहीं हो सकते। इसमें आप उनके दुकान का किराया, बिजली का खर्च, कागज का खर्च, इंटरनेट का खर्च सब जोड़ दें तो आप देखेंगे कि लाभ 900 प्रतिशत से 1000-2000-3000 प्रतिशत तक होता है। अब इसे चोरी नहीं कहें तो क्या कहें?
"कैसा प्रदर्शन, क्या सिर्फ पुलिस की गालियाँ और मार खाने के लिए…हरगिज नहीं! इस तरह का कोई भी कदम मैं उस समय तक नहीं उठाऊंगा, जब तक मेरे पास एक अदद बंदूक न हो" - चे ग्वेरा
सोमवार, 13 जून 2011
शुक्रवार, 10 जून 2011
वरदान का फेर (नाट्य रुपांतरण, तीसरा और अन्तिम भाग)
तीसरा दृश्य
( मंच पर एक चारपाई है। उसपर महात्माजी आराम कर रहे हैं। )
वाचक: चारपाई में बहुत अधिक खटमल थे। इनके सोते ही खटमलों ने धावा बोल दिया। इतना अधिक भोजन किया कि करवट बदलने में भी तकलीफ होती थी। खटमलों ने काटना शुरु किया। महात्माजी त्राहि-त्राहि करने लगे।) बुद्धूदेव: ब्रह्माजी! मैं अभी आपसे 3 वरदान मांगता हूँ। पहला वरदान मुझे यह दीजिए कि अभी फौरन इन खटमलों को मार डालिए। अभी मेरा पेट दुख रहा है। इसलिए मुझे दूसरा वरदान यह दीजिए कि किसी वैद्य के यहाँ से कोई पाचक की गोली मांग लाइए और तीसरा वरदान मैं यही सोचता हूँ कि जब मैं चाहूं तब आपसे 3 वरदान मांग लूं। ( ब्रह्माजी खटमलों को मारना शुरु करते हैं। फिर मंच से चले जाते हैं )
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गुरुवार, 9 जून 2011
काहिल अधिकारियों के भरोसे है मढौरा बिजली आफिस
मढौरा, सारण।
जनता की सुविधाओं के प्रति सरकार कितनी लापरवाह है इसका एक उदाहरण सारण जिले के मढौरा के बिजली आफिस में हो रही भयंकर लापरवाही है। हुआ कुछ यों कि 18 मई की रात को आँधी-तूफान आने के बाद स्टेशन रोड का ट्रांसफार्मर जल गया और पूरे इलाके में अंधेरे का राज कायम हो गया। लाइनमैन ने अगले दिन अधिकारी को सूचित कर दिया। मढौरा बिजली आफिस के एस डी ओ लम्बे समय से अपना प्रभार ओवरसियर को सौंप कर छुट्टी पर हैं। लेकिन ओवरसियर और अन्य कर्मचारियों की लापरवाही का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि इन लोगों ने छपरा कार्यालय को 30 मई तक कोई सूचना नहीं दी। इसी बीच यह सुनने में आया कि ट्रांसफार्मर के लिए चन्दा इकट्ठा किया जा रहा है और 200 केवीए क्षमता के ट्रांसफार्मर के लिए लगभग 15-20 हजार रूपयों की जरूरत है। लोगों ने सरकार की देरी से तंग आकर चंदा देकर ही ट्रांसफार्मर लगवाने की सोची।
सोमवार, 6 जून 2011
एक साधारण आदमी की बात
मैं एक साधारण आदमी हूँ और मुझे विदेश व्यापार, सकल घरेलू उत्पाद, आय-व्यय की कोई समझ नहीं। मुझे अपना हिस्सा चाहिए। जब मैं आठ घंटे काम करता हूँ तो मुझे अधिक से अधिक डेढ़ सौ रूपये मिलते हैं लेकिन बल्ला और गेंद लेकर मुझसे हजार नहीं लाख गुनी कम मेहनत करनेवाला आदमी एक दिन में डेढ़ लाख या डेढ़ करोड़ रूपये क्यों लेता है? सुनाई पड़ता है कि हर आदमी पर इतना विदेशी कर्ज है। यह विदेशी कर्ज मैंने नहीं लिया है। जिन्होंने लिया है वे भाजपाई भी थे, कांग्रेसी भी थे और सबने एक ही काम किया है। कर्ज चुकाने के लिए मेरे मेहनत का सामान खाकर और बेचकर ये झूठ बोलते हैं और फिर कर्ज ले डालते हैं। कब तक कर्ज लेंगे ये? कर्ज लेकर वैसे भी इन्होंने किया क्या है, अपनी सुख-सुविधा में कोई कमी न हो इसके सारे उपाय किए हैं। मुझे इससे कोई मतलब नहीं कि मंदी आई कि नहीं, विश्व व्यापार और विदेश व्यापार में क्या हो रहा है, ये जानकर मैं क्या करूंगा? ये सब मेरे काम के नहीं हैं।
पूरी दुनिया में भारतीय लोकतंत्र कलंकित हो गया। यह वाक्य बहुत जगह सुनने को मिल रहा है। लेकिन कब प्रशंसित था यह भारतीय लोकतंत्र ? भाजपा ने अपने जाल फैलाने शुरु कर दिए हैं। मैं पूछता हूँ कि क्या 2004 से 2011 तक मात्र सात सालों में ही 400 लाख करोड़ की सम्पत्ति विदेशों में जमा कर ली गई? यह सरासर झूठ है। हो सकता है कि समूचे काले धन का अधिकतम पंद्रह-बीस प्रतिशत हिस्सा इन सात सालों में जमा किया गया हो। लेकिन 2004 से पहले, अगर हम 400 लाख करोड़ की बात करें तब, कम से कम 300 लाख करोड़ रूपये तो जमा हो चुके थे। 1998 से 2004 तक भाजपाई कहाँ थे? क्यों नहीं उठाया गया ये मुद्दा उस समय। अगर नहीं उठाया गया तो आज किस मुँह से आडवाणी, स्वराज, जेटली, राजनाथ आदि सत्याग्रह करने चले? ये सब के सब मिले हुए हैं। इन सबको देश से बाहर फेंक दिया जाना चाहिए था। वाजपेयी सरकार की उपलब्धियाँ क्या हैं? कुछ लोग सड़कें दिखाते हैं। क्या मैं सड़क चबाता हूँ? और अच्छी सड़कों की जरूरत मुझे है भी क्या जब मेरे पास गाड़ी नहीं है। और न ही मेरे पास ऐसे कपड़े हैं जिनपर बरसात में कच्ची सड़कों पर कींचड़ लगने से वे गंदे हो जाएंगे।
पूरी दुनिया में भारतीय लोकतंत्र कलंकित हो गया। यह वाक्य बहुत जगह सुनने को मिल रहा है। लेकिन कब प्रशंसित था यह भारतीय लोकतंत्र ? भाजपा ने अपने जाल फैलाने शुरु कर दिए हैं। मैं पूछता हूँ कि क्या 2004 से 2011 तक मात्र सात सालों में ही 400 लाख करोड़ की सम्पत्ति विदेशों में जमा कर ली गई? यह सरासर झूठ है। हो सकता है कि समूचे काले धन का अधिकतम पंद्रह-बीस प्रतिशत हिस्सा इन सात सालों में जमा किया गया हो। लेकिन 2004 से पहले, अगर हम 400 लाख करोड़ की बात करें तब, कम से कम 300 लाख करोड़ रूपये तो जमा हो चुके थे। 1998 से 2004 तक भाजपाई कहाँ थे? क्यों नहीं उठाया गया ये मुद्दा उस समय। अगर नहीं उठाया गया तो आज किस मुँह से आडवाणी, स्वराज, जेटली, राजनाथ आदि सत्याग्रह करने चले? ये सब के सब मिले हुए हैं। इन सबको देश से बाहर फेंक दिया जाना चाहिए था। वाजपेयी सरकार की उपलब्धियाँ क्या हैं? कुछ लोग सड़कें दिखाते हैं। क्या मैं सड़क चबाता हूँ? और अच्छी सड़कों की जरूरत मुझे है भी क्या जब मेरे पास गाड़ी नहीं है। और न ही मेरे पास ऐसे कपड़े हैं जिनपर बरसात में कच्ची सड़कों पर कींचड़ लगने से वे गंदे हो जाएंगे।
कुछ अर्थशास्त्र का हिसाब समझाते हैं। यह बजट बनता ही कहाँ है मेरे लिए और मुझे इस अर्थशास्त्र से क्या मतलब है जिसमें बड़ी-बड़ी बातें लिखी हैं? मैं छोटा आदमी हूँ।
कुछ स्कूल, इंजीनियरिंग कालेज, मेडिकल कालेज, मैनेजमेंट कालेज दिखाते हैं। मैं क्या करूंगा इन सबका। मुझे और मेरे जैसे लोगों के लिए इसमें जगह है कहाँ? और अगर जगह मिल भी जाय तो क्या है, किया क्या है उन लोगों ने जो इन कालेजों में पता नहीं क्या-क्या पढ़ते थे।
कभी-कभार कुछ हम जैसे घुस जाते हैं इन कालेजों में तो ये शोर मचाते हैं कि देखो किसान का बेटा, मजदूर का बेटा आई ए एस बन गया। ये अखबार जिनकी कीमत तीन-चार रूपये है, इनका मैं करुंगा क्या? ये चैनल और मीडिया हल्ला करते हैं कि देखो इस खिलाड़ी की पत्नी ने उस खिलाड़ी के साथ भोजन किया या यह फिल्मी मदारी उस हीरोइन के साथ उस पार्क में देखा गया। ये मीडिया चिल्लाता है कि देखो एक मजदूर का बेटा आई आई टी की परीक्षा में पास हो गया। जैसे यह कोई आश्चर्य हो। ये तो लगता है कि चेतावनी है कि नेताओं सावधान! कोई दूसरा हमारे घर में, हमारे हरम में घुस रहा है, सावधान हो जाओ। या इसकी खुशी है कि एक और बुद्धिशाली आदमी नेताओं के काम में आएगा और ये उसे चोरी की नई-नई तरकीबें सिखाकर बड़ा चोर बनाएंगे।
प्रधानमंत्री के नाम पर योजनाएँ चलती हैं। अपने घरवालों के नाम पर योजनाएँ चलती हैं लेकिन मुझे इससे क्या मिला? 1947 से 2011 तक कुल उपलब्धि क्या है मेरे लिए, मेरे जैसों के लिए? कुछ नहीं है उपलब्धि! ये सब तमाशा है। ये दिखाते हैं कि देश में पहले इतने अरबपति थे, अब इतने हैं। मुझे इन अरबपतियों से क्या लेना देना? दो रूपये की आमदनी हो तो सरकारें चिल्लाती हैं कि दो रूपये मिले हैं लेकिन जब हजारों करोड़ का घाटा होता है तब सब एसी कमरों में जश्न मना रहे होते हैं। और सब मिलाकर होता तो घाटा ही है।
कुछ दिखाते हैं कि देखो, शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ गई है। गली-गली में कोचिंग खुल गए हैं। लेकिन ये सब के सब दस गुना फायदा लेते हैं। व्यापारी से कई गुना चोरी करते हैं ये सब।
बन्द करो ये बकवास! मुझे तुम्हारी इन बातों से कोई लेना-देना नहीं, होगे तुम बड़े अर्थशास्त्री, नाम होगा तुम्हारा देश-विदेश में। तुम्हारे नाम पर विदेश में छात्रवृत्ति दी जाती होगी, लेकिन तुमने मेरे जैसे 90 करोड़ लोगों दिया क्या है? झूठा है तुम्हारा अर्थशास्त्र, भरमाना पढ़े-लिखों को, बड़ी-बड़ी बातें करके ठगना उन लोगों को जिनके पास विलासिता के सामान हैं, जिन्होंने अपने हक से हजार गुना ज्यादा इकट्ठा कर लिया है या कहो कि चोरी कर ली है। झूठे हो तुम और तुम्हारा ये सबकुछ! बन्द करो ये पढ़ाई-लिखाई, सब के सब तमाशे देखता रहा हूँ और अब पूरी तरह समझ गया हूँ कि तुम सब एक ही खेत की मूली हो और देश को लूटो चाहे नहीं लूटो मुझे और मेरे जैसों को तो जरूर लूटा है तुम सब ने।
मैं साधारण आदमी हूँ। छोटी-छोटी बातें समझता हूँ। दो-चार रूपये के हिसाब भी समझ ले सकता हूँ लेकिन चोर तो नहीं हूँ।
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रविवार, 5 जून 2011
दोलन बन गया बाबा रामदेव का आंदोलन
पिछले आलेख में मैंने लिखा था कि बाबा रामदेव के साथ क्या-क्या हो सकता है। लेकिन वह आलेख सभी बातों और संभावनाओं को ध्यान में रखकर लिखा गया था। मेरे मन में तो पहले से ही था कि बाबा का यह अनशन बेकार होनेवाला है और आखिरकार पुलिस ने बाबा और उनके साथियों को समझा दिया कि अंग्रेजों से लड़ने का मतलब क्या होता है?
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शनिवार, 4 जून 2011
लालू और नीतीश की तरह बेवकूफी कर रहे हैं बाबा रामदेव
निस्संदेह बाबा रामदेव दुनिया में सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाले लोगों में से एक हैं या संभव हो सबसे तेजी से बढ़ने वाले ही यही हों। कोई आदमी अभी तक इस रफ़्तार से न तो अमीर बन सका है और न ही किसी के आन्दोलन के शुरुआत में ही इतने लोगों ने किसी का साथ दिया है। लेकिन अभी ठीक उसी तरह की बेवकूफी यह कर रहे हैं जैसी बिहार में लालू और नीतीश करते रहे हैं। कहने का मतलब यह कि इन सभी के पास जो जनसमर्थन था या है, वह इन सबको इतिहास के निर्माताओं में जगह दिला सकता था। लेकिन बिहार में लालू और नीतीश दोनों नशे में चूर हो गए और इन्होंने अपने अल्पकालिक लाभ या सनक के लिए अपना सुंदर भविष्य एकदम नष्ट कर डाला। जब तक घटना घट रही होती है या समय गुजर रहा होता है, सभी हल्ला मचाते हैं लेकिन इतिहास उपलब्धियों और हारों का होता है, युग-निर्माताओं का होता है, युद्धों का होता है।
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गुरुवार, 2 जून 2011
सुशासन के बिहार में अपराध का सच
कौन कह रहा है कि बिहार में अपराध में कमी आई है। जी हाँ, जब बिहार सरकार खुद यह नहीं कहती तब औरों के कहने से क्या होता है? बिहार सरकार की पुलिस विभाग की वेबसाइट पर 2001 से लेकर फरवरी 2011 तक के अपराधों और पुलिस के संज्ञान में आने वाली सभी घटनाओं की संख्या दी गई है।
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मंगलवार, 31 मई 2011
वरदान का फेर (नाट्य रुपांतरण, भाग -2)
वाचक: दोनों जून 1-1 कटोरा साबूदाना उबालकर महात्माजी पीते थे। आइए हम देखते हैं कि वे किस तरह नित्य मूर्खोपनिषद् का पाठ करते हैं। (महात्माजी के हाथ में एक मोटी पुस्तक है। वे पढ़ते हैं।–
ॐ नमो मूर्खेश्वराय मूर्खतां देहि मे सदा।
वंदे मूर्खोपनिषदम् ग्रंथम् पठति मूर्खशिरोमणि:॥
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रविवार, 29 मई 2011
ये टाई काहे को पहनता है भाई?
कल क्या टाई के बगैर गंभीर पत्रकारिता नहीं हो सकती? शीर्षक से एक आलेख देखा तो एक कहानी याद आ गयी। जरा ध्यान से सुनिएगा।
यह कहानी ठीक से याद नहीं। लेकिन गालिब के बारे में है। एक बार गालिब को बादशाह ने भोजन पर बुलाया। गालिब ठहरे गरीब आदमी। कोई शाही या राजसी वस्त्र तो था नहीं उनके पास। इसलिए पहुंच गए सीधे अपने सादे कपड़ों में। द्वारपाल ने दरवाजे से भगा दिया। गालिब कहते रहे कि मैं गालिब हूं और मुझे भोजन पर बुलाया गया है।
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सोमवार, 25 अप्रैल 2011
क्या हम आजाद हैं और हैं, तो किस मामले में?
आज से करीब दो सौ साल पहले जब अंग्रेज भारत पर अपनी शासन व्यवस्था लादना शुरु कर रहे थे तब भारत की जनसंख्या कितनी रही होगी? मुझे लगता है पंद्रह करोड़ के आस-पास जबकि उसमें पाकिस्तान और बांग्लादेश भी शामिल थे। भारत में तथाकथित आजादी के बाद जो भी व्यवस्थाएं की गईं उनमें कोई भारतीयता नहीं थी। शुरु करते हैं- शिक्षा से। आज शिक्षा व्यवसाय है। लेकिन उस समय शिक्षक समाज का सबसे ज्यादा सम्मानित हिस्सा हुआ करता था। शिक्षा के क्षेत्र में पैसे का प्रचलन नहीं था। गुरुकुल हुआ करते होंगे। इस समय उनकी क्षमता या प्रासंगिकता मेरा आलोच्य विषय नहीं है। राजा या अमीर लोग दान देते होंगे और विद्यालय चलते होंगे। यानि हमारी शिक्षा व्यवस्था को सेवा से पेशा बनाने का काम इन अंग्रेजों ने किया जो आज पूरी तरह पेशे में बदल चुकी है। यहां तक कि सरकार के यहां भी शिक्षक अब सेवा नहीं नौकरी करता है और तनख्वाह सबसे प्रमुख विषय बन गयी।
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शनिवार, 23 अप्रैल 2011
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल( भाग-2)
युद्ध कभी भी राजनीतिक कारणों के लिये नहीं बल्कि आर्थिक कारणों के लिये ही लड़े जाते हैं। प्रथम विश्व युद्ध के बाद यह बात एकदम शीशे की तरह साफ नजर आती है कि इन विशालकाय कम्पनियों के आपसी हित जब टकराते हैं तो उसका परिणाम पूरी मानव जाति को झेलना पड़ता है। अमेरिका ने प्रथम विश्व युद्ध में दखल देने का निर्णय तभी लिया जब उसने देखा कि अमरीकी कम्पनियों के आर्थिक हित चौपट होते जा रहे हैं।
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शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल( भाग-1)
प्रस्तुतकर्ता : चंदन कुमार मिश्र
इन विदेशी कम्पनियों ने देश में कम्पन पैदा कर दिया है। पूरे देश में लाखों-करोड़ों लोगों के अस्वस्थ बनाने, रोजगार छीन लेने, भारत को कमजोर बनाने, पूरे देश को जकड़ कर जोंक की तरह पकड़ कर रखने में इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने कोई प्रयास नहीं छोड़ रखा है। इसी विषय पर आइए एक शानदार किताब पढ़ते हैं जो कुछ कड़ियों में आपके सामने प्रस्तुत की जायेगी जिसका नाम है- ‘बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल’। इसके लेखक हैं राजीव दीक्षित। इस किताब में आप निम्न अध्यायों को पढ़ेंगे।
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राजीव दीक्षित
मंगलवार, 12 अप्रैल 2011
किसी को याद न आये शहीद
23 मार्च 2011 को हमारे देश की संसद में यह तय किया जा रहा था कि कौन सा पक्ष ज्यादा दोषी है। मनमोहन सिंह सरकार और विपक्ष भाजपा में यह हल्ला था कि कौन बेदाग है। हमारी संसद के सारे लोग आरोप-प्रत्यारोप में जी-जान से लगे हुए थे। उन्हें याद ही नहीं आ सका कि आज 23 मार्च 2011 है यानि भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के शहीद होने के अस्सी साल पूरे हो रहे हैं। अब कोई भी आदमी सोचें कि इनकी हरकतों को क्या कहा जाए? हमारा देश क्रिकेट, सिनेमा, चुनाव को कितने जोर-शोर से याद करता है! लेकिन 23 मार्च में न तो ग्लैमर है, न मार्केट वैल्यू, न कोई टी आर पी है फिर क्यों कोई याद रखे। अपनी क्षणिक खुशी के लिए क्रिकेट के पीछे साल के पचासों दिन खर्च करने वाले युवा, कभी सोचते ही नहीं कि वे चैन से खेल देख पाते हैं तो इसके पीछे भी कितनी बड़ी बात है। सवा अरब का शोर हर तरफ़ हो रहा है। मीडिया कमीनेपन की हद पार कर चुका है। भगतसिंह के अरबवें हिस्से में नहीं आने वाले इस देश के ऊपर शासन करते हैं। बीस पेज के अखबार में बीस लाइन में हर साल भगतसिंह को निपटा देने वाले मीडिया को क्या कहा जाए, आप खुद सोच लें। लेकिन यही मीडिया अखबार में साल में क्रिकेट के पीछे हजार पेज, सिनेमा के पीछे हजार पेज बहुत आसानी से खर्च करता है। और खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहता फिरता है। लेकिन हकीकत में यह लोकतंत्र के चौकी की एक कील तक नहीं है।
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शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011
जन लोकपाल बिल में रेमन मैगसेसे पुरस्कार की बात क्यों ?
पता नहीं कैसे लोग मीडिया में होते हैं जिनको आंख पर पट्टी बांधकर रहना अच्छा लगता है और वे समझ ही नहीं पाते कि तहरीर चौक एक तमाशा के सिवा कोई क्रान्ति-व्रान्ति नहीं था। जिधर देखो उधर हर जगह यह शोर है कि तहरीर चौक बन जायेगा जंतर-मंतर। इस तहरीर चौक और मिस्र की क्रान्ति की नौटंकी के बारे में पहले भी लिख चुका हूं। जहां तक मैं समझता हूं कि मिस्र हो या लीबिया हो या कोई और हो जहां भी क्रान्ति की सुगबुगाहट सुनाई पड़ रही थी, वह अमेरिका के चालाकी और दुष्टतापूर्ण उपनिवेशवाद का ही दिखावटी चेहरा है। मिस्र में अलबरादेई अमेरिका के चापलूस( भले ही वे नोबेल पुरस्कार विजेता हैं) हैं, अपना कद बढ़ाने में लगे हुए हैं। वही अमेरिका जिसके बहुत से राष्ट्रपतियों को नोबेल का शान्ति पुरस्कार मिल चुका है। लेकिन भारत में कोई इस लायक नोबेल समिति को दिखता ही नहीं। अब अमेरिका जान बूझ कर क्रान्ति के नाम पर लोगों को भड़का कर अपने चापलूसों या नौकरों को इन देशों का प्रमुख बनवा रहा है ताकि अमेरिका का प्रभुत्त्व इन सब पर कायम रह सके। एक बात जरुर याद दिला दूं कि यही अमेरिका क्यूबा की मदद कर रहा था तो वहां की जनता इसकी तारीफ़ कर रही होगी लेकिन यह देश बाद में इन्हीं लोगों पर कब्जा कर बैठा था। ऐसे ही चालबाजी सहायता यह देश दूसरे देश को देता है। फिर भी अमेरिका कुछ गलत नहीं कर रह- ये कहने वाले लोग हैं। सुना है कि यही अमेरिका दूसरे देशों को सिखाता है कि ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए अन्य देश अपनी सुविधाओं में कमी लाएं लेकिन खुद उसके यहां किसी भी मिनट में 7000 हवाई जहाज उड़ते हुए पाए जाते हैं। इसी देश को लोग आदर्श और महान कहने वाले हमारे देश में मौजूद हैं।
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रविवार, 3 अप्रैल 2011
यह जीत नहीं, भारत के लाखों करोड़ों के विदेश जाने का संकेत है
जीतना सबको अच्छा लगता है। जीत का मतलब ही होता है आंशिक उन्माद। और यह उन्माद भारत में कुछ ज्यादा ही है। हमारे यहां लोग हार को भी इसी उन्माद के साथ मनाते हैं। अगर भारत मैच हार जाये तो रोने चिल्लाने वाले लाखों लोग हैं, गाली देने वाले भी लाखों लोग हैं। लेकिन अगर जीत जाय तो इसका नशा भी लोगों पर चढ़कर नहीं ओवरफ्लो होकर दिखता है। पता नहीं यह क्या हो रहा है!
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