गुरुवार, 16 अगस्त 2012

क्यों - कमला बक़ाया (कविता)


यह बच्चों के लिए रची गई एक साधारण-सी कविता है। लेकिन दूसरी तरफ़ यह एक असाधारण कविता है। कमला बक़ाया की यह कविता इस देश और दुनिया के हर बच्चे तक पहुँचाई जानी चाहिए, ऐसा हमें लगता है। यहाँ प्रस्तुत है-

बुधवार, 15 अगस्त 2012

स्वतंत्रता दिवस पर बच्चों के चार भाषण


इस बार कुछ और बातें!

पिछले दिनों एक विद्यालय में जाने का अवसर मिला। वहाँ मेरे पूर्व शिक्षक ने बच्चों के लिए कुछ भाषण स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देने के लिए लिखने का निर्देश दिया। कुछ खास इच्छा न रहते हुए भी 10 भाषण लिखे। निर्देशानुसार भाषण में कोकविता या शेर होने पर वह अच्छा लगेगा। हकीकत यह है कि कविता के अंश या शेर तालियाँ बजवाते हैं, इससे ज़्यादा शायद ही कुछ होता हो। पास में न कोई डायरी, न किताब, न नोट। कविता के चक्कर से छुटकारा कैसे भी मिल सका। उन दस भाषणों में से 7-8 को आज बच्चे विद्यालय द्वारा आयोजित समारोह में देंगे। यहाँ 15 अगस्त, 2012 के अवसर पर उन भाषणों में से कुछ दिए जा रहे हैं। संबोधन को भी यहाँ रहने दिया जा रहा है। हालाँकि वह जरूरी नहीं है।

शनिवार, 11 अगस्त 2012

कवि भाषाविद् कितने आये । अंश अरब भी कह क्या पाये ॥(?)


हाल में फेसबुक पर लिखा था....

फेसबुक पर निजी बातें नहीं लिखता रहा हूँ। समाज से बातों का जुड़ाव रहे, ऐसी कोशिश रही है। लेकिन आज एक निजी बात......

मई, 2006 में मुझे कृष्ण पर कुछ लिखने का (सच कहूँ तो महाकाव्य लिखने का, भले ई बुझाय चाहे नहीं बुझाय कि महाकाव्य क्या है :) ) मन हुआ। जमकर भक्तिभाव से चौपाइयाँ, दोहे लिखा। पहला दोहा था।

अतिप्रिय राधाकृष्ण को करूँ नमन कत बार।
कौन पूछता है मुझे थक गये जब कर्तार॥

फिर उसी साल दो-चार पन्ने लिखे तब तक धर्म और भगवान से विश्वास उठ गया और फ़िर आज मैं वह नहीं हूँ, जो पहले था।

कैसे भक्ति के 'महान' गाने रवीन्द्र की गीतांजलि बन जाते हैं, या विनय पत्रिका, इसका गवाह मैं स्वयं हूँ! सब बस एक पागलपन है, कोरी कल्पना है। भक्ति गीत गाने से कैसे आँसू बहने लग सकते हैं, यह भी आस्तिकता के समय मैंने महसूस किया।

शनिवार, 7 जुलाई 2012

बुर्जुआ भाषा वालीं हिन्दी फ़िल्में

21 जून को हिन्दी फ़िल्मों पर कुछ विचार लिखकर रखे, जिनमें भाषा, कथा आदि पर अपना पक्ष रखने की कोशिश थी। उसी लेख के संपादित और परिवर्धित रूप को तीन हिस्सों में यहाँ बाँट रहा हूँ। आज तीसरा और अन्तिम हिस्सा प्रस्तुत है।

फ़िल्मों पर लिखना शुरू करने पर सबसे पहले भाषा को लेकर ही लिखा था, आज भाषा पर कुछ बातें...

बुर्जुआ भाषा वालीं हिन्दी फ़िल्में

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

अमिताभ वाली 'नास्तिक' और नास्तिकों का अपमान

21 जून को हिन्दी फ़िल्मों पर कुछ विचार लिखकर रखे, जिनमें भाषा, कथा आदि पर अपना पक्ष रखने की कोशिश थी। उसी लेख के संपादित और परिवर्धित रूप को तीन हिस्सों में यहाँ बाँट रहा हूँ। आज दूसरा हिस्सा प्रस्तुत है।

फिल्मों पर लिखे लेख के पहले भाग पर एक मित्र ने ग़ुलामी का ज़िक्र किया है। ग़ुलामी फ़िल्म में धर्मेन्द्र और मिथुन की मुख्य भूमिका थी। उसमें धर्मेन्द्र को मैक्सिम गोर्की की माँ पढ़ते दिखाया गया है और ज़मीनदारी से लड़ने के क्रम में अंत में सारे ज़मीनी दस्तावेज़ों या कागज़ातों को जलाते हुए भी दिखाया गया है। फ़िल्मों में जो जनपक्षधरता दिखाई गई है, वह सुधारवाद या अंशतः मार्क्सवाद को छूती नज़र आती है। मार्क्सवाद के साथ एक रात गुज़ारने, उसके बगल से कटते हुए निकलने का उदाहरण फ़िल्मों में ज़रूर कई बार आया है, लेकिन लेनिन या चे जैसी दृढता और सिद्धान्तनिष्ठा नहीं दिखाई गई। एक साधारण आदमी जो थोड़ा भी सोचेगा, वह यह कह सकता है ग़रीबी समाप्त होनी चाहिए, बेहतर जीवन जीने का अधिकार सबको मिलना चाहिए, यही सारी बाते गाँधी जी जैसे लोग भी करते हैं और मार्क्स भी, भगतसिंह भी, लोहिया भी। अंतर इतना है कि वामपंथ (यहाँ लिखते समय यह शब्द मुझे अच्छा नहीं लग रहा) के अनुसार जिस क़िस्म के विकास की बात होती है, वह फ़िल्मों में नहीं दिखाया जाता। मार्क्सवाद के साथ एक रात गुज़ारने और मार्क्सवादी होने में अंतर तो ज़रूर है। एक व्यक्ति जो हिन्दू है, जाति से ब्राह्मण है और माँसाहारी है, सिर्फ़ माँसाहारी होने मात्र से वह ईसाई नहीं हो जाता। पूरे तौर पर अनीश्वरवादी और मार्क्सवादी व्यक्ति को नहीं दिखाया जाने का प्रश्न मेरे इस लेख का केंद्रीय विषय था। और हमारे यहाँ तो ऊपर से कुछ वामपंथी दिखनेवाली फ़िल्में भी धर्म के चंगुल से मुक्त नहीं दिखाई जातीं। यहाँ फ़िल्मों में वामपंथ के नज़दीक दिखनेवाले पात्रों पर ईश्वरीय दासता थोपना भी तो एक शग़ल रहा है। देव आनंद की मशहूर फ़िल्म गाईड अंत में आध्यात्मिक बन जाती है, ऐसे ही फ़िल्मों में नायकों के संघर्ष को सामूहिक संघर्ष दिखाया भी गया तो, उसे धार्मिक रंग चढा ही दिया गया।
   अब आज उसी लेख का दूसरा हिस्सा- 

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

हिन्दी फ़िल्मों का नायक वामपंथी क्यों नहीं


21 जून को हिन्दी फ़िल्मों पर कुछ विचार लिखकर रखे, जिनमें भाषा, कथा आदि पर अपना पक्ष रखने की कोशिश थी। उस लेख को तीन हिस्सों में यहाँ बाँट रहा हूँ। पहला हिस्सा प्रस्तुत है।

हिन्दी फ़िल्मों का नायक वामपंथी क्यों नहीं

नायक, खलनायक और संघर्ष का चक्कर

फ़िल्मों में पहले खलनायकी का बड़ा महत्व था। लोग नायक के साथ एकात्म होकर कुछ घंटे खलनायक से स्वयं ही लड़ने का काल्पनिक और अनोखा अनुभव प्राप्त करते थे। आज भी यह पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। आज भी भोजपुरी या दक्षिण की फ़िल्मों में खलनायकी का होना एक ज़रूरी-सी शर्त बना हुआ है।

बुधवार, 13 जून 2012

ग्रामीण इलाक़े में अंगरेज़ी माध्यम का एक स्कूल



कुछ दिनों से नियमित एक अंगरेज़ी माध्यम के एक छोटे-से स्कूल का हाल-चाल सुनने को मिल रहा है। क़रीब 150 बच्चे पढ़ते हैं उस स्कूल (विद्यालय से ज्यादा स्कूल समझा-कहा-जाना जाता है) में। नर्सरी से लेकर वर्ग (स्टैण्डर्ड) 6 तक चलने वाले इस स्कूल में पढानेवाले दो लोगों द्वारा रोज़ कई बातें पता चल रही हैं। पहले उस अनुभव का एक दृश्य देखिए, जो एक शिक्षक के साथ कुछ दिनों पहले वास्तव में हुआ।

सोमवार, 14 मई 2012

मनोहर पोथी बेचते बच्चे (कविता)


हाल की एक कविता जिसके कुछ भाव आजादी कविता से मिलते हैं... 

दस रुपये में चार किताबें
बेच रहे थे बच्चे
उस दिन
रेलगाड़ी में
जिनकी उम्र दस साल भी नहीं थी।

बुधवार, 2 मई 2012

भारत में बौद्ध धर्म की क्षय - दामोदर धर्मानंद कोसांबी


× × × 

     अजीब हालत है। एक तरफ धर्म के नाम पर भयानक खून-खराबा भी होता है, और दूसरी तरफ ध्यान से देखने पर सभी धर्म एक जैसे लगते हैं। साफ है कि धर्मों की बुनियाद कहीं और है- शायद धर्मों से बाहर। यह छोटी-सी किताब इस गहरे रहस्य को कुछ-कुछ समझने में मदद देगी।

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

स्वामी विवेकानंद का दूसरा पक्ष


स्वामी विवेकानंद वह पहले प्रसिद्ध व्यक्ति हैं, जिनसे मेरा परिचय हुआ और मैं इन्हें जितना संभव हुआ, पढता गया। तब मैं नवीं कक्षा में था। यहाँ विवेकानंद के बनाये हुए सुंदर चेहरे से बाहर कुछ देखने की कोशिश की है मैंने। विवेकानंद के भक्तों से गुजारिश है कि खिसियाने से पहले पढ लें इसे। यहाँ कई बातें अप्रत्यक्ष रूप से विषय से संबंधित हैं, भले वे अलग दिखें या थोड़ी लंबी हो जाएँ।

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

अब तो अपना असली नाम भी भूल गया हूँ... (भोजपुरी से हिन्दी में अनूदित)


अभी आब ता आपन असली नाम भी भुला गईल बानी... शीर्षक से एक व्यंग्य या लघुकथा या जो कहें, पढा। सोचा कि इसे पढवाते हैं। प्रस्तुत है इसका हिन्दी अनुवाद। हालाँकि इसका अधिकांश हिस्सा हिन्दी में था, फिर भी अनुवाद करने की कोशिश की है। 

शहर में पिछले १० दिन से एक मनोचिकित्सक की बड़ी धूम मची थी, हर आदमी के मुँह से एक ही बात कि अगर आप डिप्रेशन के शिकार हैं, तो इस मनोचिकित्सक से ज़रूर मिलें, यह मनोचिकित्सक आपकी समस्या २ मिनट में ठीक कर देगा, आपको अवसादमुक्त कर देगा। और यह बात झूठी भी नहीं थी, पिछले १ महीने से जो भी डिप्रेशन का शिकार उसके पास गया उसे उसने २ दिन में ठीक कर दिया। 

यह सब सुन और जान कर एक आदमी सुबह से उसके क्लिनिक में अपना इलाज करवाने के लिए भूखा-प्यासा लाइन में लगा रहा। भूख के मारे उसकी हालत ख़राब हो गई तब जाकर दिन में २ बजे उसका नंबर आया। गया डॉक्टर की केबिन में, कुर्सी पर बैठा। 

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

भगतसिंह के चौदह दस्तावेज



भगतसिंह के चौदह दस्तावेज

किसी ने सच कहा है- "सुधार बूढ़े आदमी नहीं कर सकते, क्योंकि वह बहुत ही बुद्धिमान और समझदार होते हैं। सुधार तो होते हैं युवक के परिश्रम, साहस, बलिदान और निष्ठा से, जिन्हें भयभीत होना आता ही नहीं और जो विचार कम तथा अनुभव अधिक करते हैं।"
( भगतसिंह के 'स्वाधीनता के आन्दोलन में पंजाब का पहला उभार' लेख से)

बुधवार, 7 मार्च 2012

अक्षरों की चोरी (कविता)


वे
बोरियों में भरकर
ले जा रहे हैं
हमारे अक्षरों को। 


क्या तुम सुन रहे हो
उनका चिल्लाना ? 
उनका रोना ? 
उनका गिड़गिड़ाना ? 

सोमवार, 5 मार्च 2012

स्त्री और शब्द-2 (कविता)

स्त्री और शब्द कविता का पहला भाग यहाँ है। 


लुट जाती है इज्जत
होता है बलात्कार
होती है बीमारी
होता है इलाज

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

इसपर 'नेता' शब्द इतना नाराज हुआ कि भाग गया शब्दकोश से (कविता)


शीर्षकहीन कविताः 

नेता... 

इतनी बार गाली दी गयी इसे
कि शब्दकोश ने भी गालियाँ देते देते
एक परिशिष्ट जोड़ डाला शब्दकोश में।