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शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

रामशलाका के बाद अब अन्ना शलाका


तो यह है अन्नाशलाका। तुलसीदास की रामशलाका तो आपने सुनी होगी। अब इस अन्नामय माहौल में जरा अन्नाशलाका भी देख लीजिए।


अन्ना शलाका का हर वर्ग नीचे की नौ चौपाइयों से संबद्ध है, जिसमें आपके लिए एक सुझाव छुपा हुआ है।  अन्ना का स्मरण कर आँखें मूंदकर (खोलकर भी चलेगा) किसी भी ख़ाने पर उंगली रखें। ध्यान रहे अंगूठा नहीं। फिर उस वर्ग यानि खाने से आगे नवें खाने पर जाएँ। उस खाने में लिखे वर्ण या शब्दांश को लिख लें या याद रख लें। मात्रा भी ठीक से ध्यान रखें। जैसे ‘क’ के बाद ‘ा’ आए तो इसका अर्थ ‘का’ होगा। यह नवें खाने तक जाने का क्रम तब तक जारी रखें जब तक आप शुरु के खाने तक (जिसे आपने शुरु में चुना था) वापस आ न जाएँ। यह काम पूरी श्रद्धा के साथ करें वरना फल खट्टा भी हो सकता है।

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

देख तमाशा अनशन का


अनवरत पर इस लेख को पढ़ा तो टिप्पणी लिखते-लिखते यह लेख लिख दिया।

अन्ना से सरकार की अनबन और अन्ना के अनशन का खेल रोज दिख रहा है। तानाशाही तरीका अपनाना कहीं से न्यायोचित नहीं कहा जा सकता। अन्ना के साथ जो हुआ, वह निश्चय ही ठीक नहीं लेकिन कुछ सवाल और समस्याएँ तो हैं ही।
मोमबत्ती जलाने से कुछ होगा? यह तो एक नकल मात्र है। दिवाली के दिन दिये कम नहीं जलते। और लोगों को एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि क्या अन्ना इतने प्रसिद्ध नहीं होते तब उनके साथ यही व्यवहार किया जाता? यानि आप किसी बात के लिए अनशन करेंगे तो आपके साथ सरकार और पुलिस इतने आदर से पेश आएंगे। आदर का अर्थ कि सरकार ने अन्ना को परेशान तो बिलकुल नहीं किया। जतिन दास जैसा आदमी मर जाता है लेकिन कुछ लोग अन्ना को न मरने देंगे, न खुद जाएंगे। अन्ना को आगे भेज कर अर्जुन जैसे कायर किस्म के लोग महाभारत का कौन सा हिस्सा लिख रहे हैं? मरें अन्ना, अनशन करें अन्ना और रेमन मैगसेसे किसी और को।

रविवार, 5 जून 2011

दोलन बन गया बाबा रामदेव का आंदोलन


पिछले आलेख में मैंने लिखा था कि बाबा रामदेव के साथ क्या-क्या हो सकता है। लेकिन वह आलेख सभी बातों और संभावनाओं को ध्यान में रखकर लिखा गया था। मेरे मन में तो पहले से ही था कि बाबा का यह अनशन बेकार होनेवाला है और आखिरकार पुलिस ने बाबा और उनके साथियों को समझा दिया कि अंग्रेजों से लड़ने का मतलब क्या होता है?

शनिवार, 4 जून 2011

लालू और नीतीश की तरह बेवकूफी कर रहे हैं बाबा रामदेव

निस्संदेह बाबा रामदेव दुनिया में सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाले लोगों में से एक हैं या संभव हो सबसे तेजी से बढ़ने वाले ही यही हों। कोई आदमी अभी तक इस रफ़्तार से न तो अमीर बन सका है और न ही किसी के आन्दोलन के शुरुआत में ही इतने लोगों ने किसी का साथ दिया है। लेकिन अभी ठीक उसी तरह की बेवकूफी यह कर रहे हैं जैसी बिहार में लालू और नीतीश करते रहे हैं। कहने का मतलब यह कि इन सभी के पास जो जनसमर्थन था या है, वह इन सबको इतिहास के निर्माताओं में जगह दिला सकता था। लेकिन बिहार में लालू और नीतीश दोनों नशे में चूर हो गए और इन्होंने अपने अल्पकालिक लाभ या सनक के लिए अपना सुंदर भविष्य एकदम नष्ट कर डाला। जब तक घटना घट रही होती है या समय गुजर रहा होता है, सभी हल्ला मचाते हैं लेकिन इतिहास उपलब्धियों और हारों का होता है, युग-निर्माताओं का होता है, युद्धों का होता है।