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शनिवार, 23 जुलाई 2011

चंद्रशेखर आजाद - मन्मथनाथ गुप्त(दूसरा और अन्तिम भाग)

पिछला भाग

(जन्मदिन: 23 जुलाई)
चंद्रशेखर आजाद को उनके जन्मदिन के दिन याद करना तो बस एक झूठा उत्सव है। होना तो यह चाहिए कि हम साल के हर दिन ऐसे लोगों को याद करें। और सिर्फ़ याद ही नहीं करें वरन इनसे प्रेरणा भी लें। जन्मदिन और शहादत के दिन किसी शहीद को याद कर लेना या एक आलेख चिपका देना तबतक महत्वहीन है जबतक हम उनके सपनों का भारत नहीं बना डालते। लेकिन यहाँ तो सालों से परम्परा बन चुकी है कि बस जन्मदिन के दिन दो फूल स्मारकों पर, चित्रों पर चढ़ा लो और ड्यूटी पूरी हो जाती है। लेकिन इन उत्सवों के बहाने हम उन लोगों को याद तो कर लेते हैं वरना देश और इसके लोगों को अब फुरसत नहीं है कि वे रिमिक्स गानों, पब, बार, डांस और पार्टी के चक्कर से बाहर निकलकर एक झलक इधर भी देख लें। इसी समाज का हिस्सा होने के चलते आइए मैं भी एक बार इस झूठे उत्सव में शामिल हो जाता हूँ। (पिछले भाग से ही खुद का लिखा हुआ)

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

चंद्रशेखर आजाद - मन्मथनाथ गुप्त

(जन्मदिन: 23 जुलाई)
चंद्रशेखर आजाद को उनके जन्मदिन के दिन याद करना तो बस एक झूठा उत्सव है। होना तो यह चाहिए कि हम साल के हर दिन ऐसे लोगों को याद करें। और सिर्फ़ याद ही नहीं करें वरन इनसे प्रेरणा भी लें। जन्मदिन और शहादत के दिन किसी शहीद को याद कर लेना या एक आलेख चिपका देना तबतक महत्वहीन है जबतक हम उनके सपनों का भारत नहीं बना डालते। लेकिन यहाँ तो सालों से परम्परा बन चुकी है कि बस जन्मदिन के दिन दो फूल स्मारकों पर, चित्रों पर चढ़ा लो और ड्यूटी पूरी हो जाती है। लेकिन इन उत्सवों के बहाने हम उन लोगों को याद तो कर लेते हैं वरना देश और इसके लोगों को अब फुरसत नहीं है कि वे रिमिक्स गानों, पब, बार, डांस और पार्टी के चक्कर से बाहर निकलकर एक झलक इधर भी देख लें। इसी समाज का हिस्सा होने के चलते आइए मैं भी एक बार इस झूठे उत्सव में शामिल हो जाता हूँ।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

किसी को याद न आये शहीद

23 मार्च 2011 को हमारे देश की संसद में यह तय किया जा रहा था कि कौन सा पक्ष ज्यादा दोषी है। मनमोहन सिंह सरकार और विपक्ष भाजपा में यह हल्ला था कि कौन बेदाग है। हमारी संसद के सारे लोग आरोप-प्रत्यारोप में जी-जान से लगे हुए थे। उन्हें याद ही नहीं आ सका कि आज 23 मार्च 2011 है यानि भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के शहीद होने के अस्सी साल पूरे हो रहे हैं। अब कोई भी आदमी सोचें कि इनकी हरकतों को क्या कहा जाए? हमारा देश क्रिकेट, सिनेमा, चुनाव को कितने जोर-शोर से याद करता है! लेकिन 23 मार्च में न तो ग्लैमर है, न मार्केट वैल्यू, न कोई टी आर पी है फिर क्यों कोई याद रखे। अपनी क्षणिक खुशी के लिए क्रिकेट के पीछे साल के पचासों दिन खर्च करने वाले युवा, कभी सोचते ही नहीं कि वे चैन से खेल देख पाते हैं तो इसके पीछे भी कितनी बड़ी बात है। सवा अरब का शोर हर तरफ़ हो रहा है। मीडिया कमीनेपन की हद पार कर चुका है। भगतसिंह के अरबवें हिस्से में नहीं आने वाले इस देश के ऊपर शासन करते हैं। बीस पेज के अखबार में बीस लाइन में हर साल भगतसिंह को निपटा देने वाले मीडिया को क्या कहा जाए, आप खुद सोच लें। लेकिन यही मीडिया अखबार में साल में क्रिकेट के पीछे हजार पेज, सिनेमा के पीछे हजार पेज बहुत आसानी से खर्च करता है। और खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहता फिरता है। लेकिन हकीकत में यह लोकतंत्र के चौकी की एक कील तक नहीं है।

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

रफी का सिर्फ एक ही पूरक है वह है -रफी


मनुष्य का जन्म दर्द से ही शुरु होता है। माता की प्रसव पीड़ा के साथ ही एक मनुष्य का आगमन इस संसार में होता है। शायद मनुष्य की दर्द पहली अनुभूति है। इसलिए ही कहा जाता है कि कविता से संगीत तक सभी का जन्म दुख या दर्द से ही हुआ है। संगीत में सबसे अहम स्थान है आवाज। सबसे पहले आदमी ने गाना शुरु किया होगा। इसके बाद ही तरह-तरह के वाद्य-यंत्र आए। सिर्फ़ आवाज के साथ यानि बिना वाद्य-यंत्रों के या सिर्फ एक ही वाद्य-यंत्र की सहायता से सबसे ज्यादा गाने गाने वालों में रफी शायद पहला नाम है।


मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

'शीला की जवानी’ बीच चौराहे पर गाइये और देख लीजिये क्रान्ति


मिस्र में होस्नी मुबारक को भगाया जा चुका है। ट्यूनिशिया की देखा देखी वहां के नागरिकों के दिमाग में कुछ खलबली मची, सेना ने भी साथ दिया और हो गया तीस सालों से चले आ रहे शासन का समापन। यमन और अल्जीरिया भी नकल करने में लगे हुए हैं। फिलहाल सरकार ने इन दोनों देशों के लोगों पर रोक लगा दी है। लोकतंत्र का शोर शुरु हो रहा है यानि एक और लोकतांत्रिक देश। वहां के जनाक्रोश का असर भारत में क्या पड़ सकता है, इसपर विचार विनिमय शुरु हो चुका है तब क्रान्ति को लेकर कुछ कहना अप्रासंगिक नहीं होगा।