यह बच्चों के लिए रची गई एक साधारण-सी कविता है। लेकिन दूसरी तरफ़ यह एक असाधारण कविता है। कमला बक़ाया की यह कविता इस देश और दुनिया के हर बच्चे तक पहुँचाई जानी चाहिए, ऐसा हमें लगता है। यहाँ प्रस्तुत है-
"कैसा प्रदर्शन, क्या सिर्फ पुलिस की गालियाँ और मार खाने के लिए…हरगिज नहीं! इस तरह का कोई भी कदम मैं उस समय तक नहीं उठाऊंगा, जब तक मेरे पास एक अदद बंदूक न हो" - चे ग्वेरा
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गुरुवार, 16 अगस्त 2012
शुक्रवार, 6 जुलाई 2012
अमिताभ वाली 'नास्तिक' और नास्तिकों का अपमान
21 जून को हिन्दी फ़िल्मों पर कुछ विचार लिखकर रखे, जिनमें भाषा, कथा आदि पर अपना पक्ष रखने की कोशि श थी। उसी लेख के संपादित और परिवर्धित रूप को तीन हिस्सों में यहाँ बाँट रहा हूँ। आज दूसरा हिस्सा प्रस्तुत है।
फिल्मों पर लिखे लेख के पहले भाग पर एक मित्र ने ‘ग़ुलामी’ का ज़िक्र किया है। ‘ग़ुलामी’ फ़िल्म में धर्मेन्द्र और मिथुन की मुख्य भूमिका थी। उसमें धर्मेन्द्र को मैक्सिम गोर्की की ‘माँ’ पढ़ते दिखाया गया है और ज़मीनदारी से लड़ने के क्रम में अंत में सारे ज़मीनी दस्तावेज़ों या कागज़ातों को जलाते हुए भी दिखाया गया है। फ़िल्मों में जो जनपक्षधरता दिखाई गई है, वह सुधारवाद या अंशतः ‘मार्क्सवाद’ को छूती नज़र आती है। ‘मार्क्सवाद के साथ एक रात गुज़ारने’, उसके बगल से कटते हुए निकलने का उदाहरण फ़िल्मों में ज़रूर कई बार आया है, लेकिन ‘लेनिन’ या ‘चे’ जैसी दृढता और सिद्धान्तनिष्ठा नहीं दिखाई गई। एक साधारण आदमी जो थोड़ा भी सोचेगा, वह यह कह सकता है ग़रीबी समाप्त होनी चाहिए, बेहतर जीवन जीने का अधिकार सबको मिलना चाहिए, यही सारी बाते गाँधी जी जैसे लोग भी करते हैं और मार्क्स भी, भगतसिंह भी, लोहिया भी। अंतर इतना है कि ‘वामपंथ’ (यहाँ लिखते समय यह शब्द मुझे अच्छा नहीं लग रहा) के अनुसार जिस क़िस्म के विकास की बात होती है, वह फ़िल्मों में नहीं दिखाया जाता। ‘मार्क्सवाद के साथ एक रात गुज़ारने’ और मार्क्सवादी होने में अंतर तो ज़रूर है। एक व्यक्ति जो हिन्दू है, जाति से ब्राह्मण है और माँसाहारी है, सिर्फ़ माँसाहारी होने मात्र से वह ईसाई नहीं हो जाता। पूरे तौर पर अनीश्वरवादी और मार्क्सवादी व्यक्ति को नहीं दिखाया जाने का प्रश्न मेरे इस लेख का केंद्रीय विषय था। और हमारे यहाँ तो ऊपर से कुछ ‘वामपंथी’ दिखनेवाली फ़िल्में भी धर्म के चंगुल से मुक्त नहीं दिखाई जातीं। यहाँ फ़िल्मों में ‘वामपंथ’ के नज़दीक दिखनेवाले पात्रों पर ईश्वरीय दासता थोपना भी तो एक ‘शग़ल’ रहा है। देव आनंद की मशहूर फ़िल्म ‘गाईड’ अंत में आध्यात्मिक बन जाती है, ऐसे ही फ़िल्मों में नायकों के संघर्ष को सामूहिक संघर्ष दिखाया भी गया तो, उसे धार्मिक रंग चढा ही दिया गया।
अब आज उसी लेख का दूसरा हिस्सा-
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गुरुवार, 5 जुलाई 2012
हिन्दी फ़िल्मों का नायक वामपंथी क्यों नहीं
21 जून को हिन्दी फ़िल्मों पर कुछ विचार लिखकर रखे, जिनमें भाषा, कथा आदि पर अपना पक्ष रखने की कोशि श थी। उस लेख को तीन हिस्सों में यहाँ बाँट रहा हूँ। पहला हिस्सा प्रस्तुत है।
हिन्दी फ़िल्मों का नायक वामपंथी क्यों नहीं
नायक, खलनायक और संघर्ष का चक्कर
फ़िल्मों में पहले खलनायकी का बड़ा महत्व था। लोग नायक के साथ एका त्म होकर कुछ घंटे खलनायक से स्वयं ही लड़ने का काल्प निक और अनोखा अनुभव प्राप्त करते थे। आज भी यह पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। आज भी भोजपुरी या दक्षिण की फ़िल्मों में खलनायकी का होना एक ज़रूरी-सी शर्त बना हुआ है।
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शुक्रवार, 11 नवंबर 2011
पैसा, वेतन, बिहार सरकार, आडवाणी की यात्रा …गड्डमड्ड बातें बिहार की ( दूसरा और अन्तिम भाग )
(पैसा, वेतन, नीतीश कुमार, बिहार सरकार, प्रभात खबर, अंग्रेजी, निजी स्कूल, संसद, सांसदों के वेतन, आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी जनचेतना यात्रा…सब कुछ गड्डमड्ड हैं इस लेख में। इस लेख में सुसंगठित होना मेरे लिए सम्भव नहीं था। इसके लिए माफ़ी चाहता हूँ।)
निजी स्कूलों का पंजीयन और उनकी ताकत
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मंगलवार, 1 नवंबर 2011
समाजवाद ही क्यों? - अल्बर्ट आइन्सटीन
…लियो ह्यूबरमैन और पॉल स्वीजी ने समाजवादी और मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य से घटनाओं का व्यापक विश्लेषण करने और उन पर टीका टिप्पणी करने के लिए एक मंच के रूप में मंथली रिव्यू पत्रिका की शुरूआत की थी। आइन्सटीन ने उस पत्रिका की नींव डाले जाने का स्वागत किया और मई 1949 में निकलने वाले उसके पहले अंक के लिए लियो ह्यूबरमैन के दोस्त नॉटो नाथन के आग्रह पर यह लेख लिखा था…लेख थोड़ा लम्बा है, लेकिन दो टुकड़ों में देने पर कुछ ठीक नहीं लगता। इसलिए पढ़ने में थोड़ा समय लगेगा।
समाजवाद ही क्यों?
-अल्बर्ट आइन्सटीन
क्या ऐसे व्यक्ति का समाजवाद के बारे में विचार करना उचित है जो आर्थिक-सामाजिक मामलों का विशेषज्ञ नहीं है? कई कारणों से मेरा विश्वास है कि यह उचित है।
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