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सोमवार, 30 जनवरी 2012

क्या कहूँ उस देश को ( कविता)

यह संभवतः 30 जनवरी 2008 को लिखी कविता है। समय का जिक्र करना आदत-सी है। इसका यह अर्थ न लगाया जाये कि कोई ऐतिहासिक सामग्री प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसके यह अंश मुझे भाषा की दृष्टि से बहुत पसंद हैं- 

बन रहे हैं शस्त्र ऐसे
नाश का भी नाश कर दें
आदमी की शक्तियों से
जहाँ भय, भयभीत!

अब पूरी कविता:

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

एक बार फ़िर आ जाओ (गाँधी जी पर एक गीत)


हमेशा की तरह आज दो अक्तूबर को गाँधी जी अधिक, लाल बहादुर शास्त्री कम ही याद किए जाएंगे। हम भी गँधियाते थे पहले। कई बार गाँधी जी कविताई का विषय बनते रहे थे। लेकिन अब यह सब 2004-05 के बाद बन्द है। विवेकानन्द भी इसी तरह कई बार अपने विषय होते थे। अभी थोड़े दिनों पहले ही आपने गाँधी जी पर जय हे गाँधी! हे करमचंद!! कविता पढ़ी थी यहाँ। आज गाँधी जी के प्रति सम्मान तो है लेकिन पहले जितनी श्रद्धा तो नहीं ही रही। उनपर एक कविता या गीत जो कहें, गाँधी जयंती, 2004 पर गाने के लिए ही मानिए, लिखा था। क्योंकि गाँधी जी लोकप्रिय क्यों विषय पर भाषण प्रतियोगिता आयोजित हुई थी, तो सोचा कि एक गीत भी हो जाए। हालांकि इसे गाया नहीं जा सका और बाद में 26 जनवरी, 2005 को इसे गाया गया। अब इन दिवसों में रुचि तो है नहीं। …इस रचना में भावनाएँ हैं, अब थोड़ा रूखा हूँ। पहले की अधिकांश मान्यताएँ एकदम बदल गईं है। फिर भी मेरी सबसे प्रिय खुद की रचनाओं में यह रचना आज भी शामिल है। अगर आप मोहम्मद रफ़ी का गाया क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी फ़ितरत छुपी रहे या इधर चलने वाला गीत कलियुग बैठा मार कुंडली की तर्ज पर इस रचना को गाकर देखें, तो आपको पसन्द जरूर आएगा। मुझे इसकी कुछ पँक्तियाँ बहुत पसन्द हैं, अब यह अपनी प्रशंसा ही सही, लेकिन सच है।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

जय हे गांधी ! हे करमचंद !! (कविता)

गाँधी जी …मैंने 5-6 कविताएँ-गीत उनके ऊपर लिखे हैं। अन्तिम बार आज से पाँच-छह साल पहले। अब कविता लिखना कम हो गया है। पुरानी कविताएँ यहाँ पढ़वाता रहा हूँ। फिर एक पुरानी कविता लेकर हाजिर हूँ। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता 'वीरों का कैसा हो वसन्त' हमारी पाठ्यपुस्तक में पढ़ने को मिली थी। उसी तर्ज पर गाँधी जी पर कविता लिखने का खयाल हुआ था। दसवीं कक्षा में था, तब इसका एक-दो अंश लिखा था। बाद में सारी कड़ियाँ पूरी हुई थीं। हालांकि छूटी हुई रचनाएँ शायद ही पूरी हो पाती हैं। गाँधी जी पर लिखी अन्य कविताओं को भी यहाँ रखूंगा। दो अक्तूबर को अपनी प्रिय रचना जो मूलत: गीत है, गाँधी जी के ऊपर लिखी गयी है, वह भी रखूंगा। आइये, देखिए क्या बकवास किया था कभी। प्रवाह कहीं कहीं टूटा भी है। 


कर रहे नमन हम बार-बार
युग करता फिर तेरी पुकार
बापू तेरी महिमा अपार
युग के विकास की गति मंद ।
जय हे गांधी ! हे करमचंद !!

बुधवार, 13 जुलाई 2011

नाथूराम ने अंग्रेजी भाषा का राज कायम करने में दिया है बहुत बड़ा सहयोग

नाथूराम गोडसे। जाने कितने लोगों का आदर्श है ये नाम। अखंड भारत का स्वप्न देखनेवाले अभी भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो नाथूराम को आदर्श माने बैठे हैं। मैं आज नाथूराम की बात किसी विवाद के लिए नहीं कर रहा। आज मेरा विषय कुछ अलग है। 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सभी लोगों में गाँधी जी स्वभाषा के सबसे अधिक पक्षधर थे। इतना तो तय माना जा सकता है कि अगर 1948 के बाद और भारतीय संविधान बनने तक गाँधी जीवित होते तब निश्चित तौर पर हिन्दी और भारतीय भाषा का स्थान आज से बेहतर होता। आज जो अंग्रेजी की स्थिति है, उसमें और 1890 की स्थिति में रत्ती भर का फर्क नहीं है। अंग्रेजी का कोई सुखद प्रभाव हमारे देश पर कभी रहा है, इसपर सोचना व्यर्थ है। यह न सोचें कि अंग्रेजी के माध्यम से बहुत भारी बात हो गई। कुछ लोग यह सोचते हैं कि अंग्रेजी के चलते हमारे देश के लोगों को विश्व का श्रेष्ठ साहित्य पढ़ने को मिला लेकिन इस बात पर मैं यहाँ अधिक नहीं कहूंगा क्योंकि मैं अपनी किताब में इस पर विस्तार से लिख चुका हूँ।

रविवार, 3 जुलाई 2011

मैं मूर्ख हूँ और अपने देश का बुरा चाहता हूँ(परिवर्धित संस्करण )

साहब ने अपना ज्ञान बघारा है। अभी-अभी देखा। उनके सारे अनुयायी जैसे कि… छोड़िए नाम नहीं लेता हूँ। चला बिहारी ब्लागर बनने (सलिल नाम है जिन्होंने अप्रत्यक्ष रुप से मुझे कुछ कहा है। इनका नाम लेना पड़ा क्योंकि इन्होंने मुझे संबोधित किया है।) आदि अपने तो भेड़चाल में शामिल हैं लेकिन जरा देखिए कि मुझे क्या कहा है इस सलिल ने जो पटना के ही हैं- 'जिन महाशय ने कभी आपको भगोड़े भारतीय के खिताब से नवाजा था, उन्हें यह आलेख और ऐसे ही कई आलेख जो आपने पूर्ण शोध के आधार पर लिखे हैं, पढना चाहिए! मगर क्या किया जा सकता है- मूर्ख और मृतक अपने विचारों से चिपक जाते हैं!!'

      साहब भूल गए कि मृतक विचार कर ही नहीं सकता तो चिपकने की बात कहाँ से आ गई?


शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

गाँधी जी पर बहस और मेरी टिप्पणियाँ

पिछले दिनों महाशक्ति के चिट्ठे यानि ब्लॉग पर चला गया। वहाँ मुख्य पृष्ठ पर अंग्रेजी में नामित एक तरफ़ एक स्तम्भ जैसा है जिसमें गाँधी जी पर छ: आलेखों के लिंक हैं। इन आलेखों में मैंने पाँच आलेखों पर अपनी टिप्पणी की। वहाँ देखा कि महाशक्ति भाई और एक अन्य भाई दोनों बड़े परेशान हैं कि गाँधी जी को राष्ट्रपिता नहीं रहने देना है। यह लिखते वक्त मुझे एक एकांकी याद आ रही है जो कुछ साल पहले सुमन-सौरभ में छपी थी जिसमें गांधी जी कहते हैं कि वे साठ सालों से देश में राष्ट्रपिता का पद संभाल रहे हैं और अब उन्हें आराम चाहिए। किसी भी सेवा में कार्यरत आदमी को भारत में साठ-बासठ या पैंसठ साल की उम्र में सरकार सेवानिवृत्त कर देती है, तो उन्हें क्यों अभी तक सेवा से मुक्त नहीं किया गया।