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शनिवार, 31 दिसंबर 2011

भाषा पर एक बातचीत ... 'भाषा एक प्राथमिक सवाल क्यों है'

एक मित्र से हुई बातचीत यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। 

'भाषा एक प्राथमिक सवाल क्यों है'

हम: एक उदाहरण देखिए। 

मित्र: हाँ। 

हम: पूँजीवादी कितने है ? कितने प्रतिशत ? 

मित्र: पाँच फीसदी के करीब। 

हम: अंग्रेजी वाले कितने हैं ? 121 करोड़ में से कितने ?

शनिवार, 17 सितंबर 2011

नीतीश कुमार के ब्लॉग से गायब कर दी गई मेरी टिप्पणी (हिन्दी दिवस आयोजन से लौटकर)


मैं किसी ऐसे आयोजन में शामिल नहीं हुआ था जो हिन्दी दिवस पर हुए। फिर वहाँ से लौटने की बात क्यों? कारण है भाई। पिछले कुछ दिनों से लगातार हिन्दी पर पढ़ने को मिलता रहा है। आयोजनों में भाषण-पुरस्कार-शपथ आदि के अलावा कुछ होता तो है नहीं, इसलिए हम ब्लॉग-जगत के अलग-अलग घरों में पैदल ही घूमते रहे। 40-50 से कम लेख-कविताएँ नहीं पढ़ी होंगी। कई जगह टिप्पणी भी की। तो मेरा यह काम भी तो आयोजन में शामिल होना ही माना जाएगा।
कुछ दिनों से हिन्दी का जोर सबमें मार रहा था। कई तो ऐसे भी दिखे जो 14 सितम्बर बीतते ही अंग्रेजिया गये, जो उनकी असली प्रवृत्ति रही है। ऐसे लोग बड़े चालू किस्म के होते हैं। पूरा का पूरा गिरगिट। जब चाहा रंग बदल लिया।

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

सिर्फ़ एक बार (हिन्दी दिवस पर विशेष)


सब जानते होंगे कि ब्लागर ने पोस्ट के लिए संदेश शब्द अपनाया है। यह हिन्दी में ब्लागर का इस्तेमाल करने वाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं। लेकिन हमने पोस्ट को ही माना। ठीक यही हाल चिट्ठा शब्द का हुआ। जब पहली बार ब्लॉग के लिए इस शब्द का इस्तेमाल हुआ तब हिन्दी के कई नए शब्द उभरे जैसे- चिट्ठाकारी या चिट्ठेकारी, चिट्ठा-जगत, चिट्ठेकार आदि। लेकिन जैसा कि हम हिन्दी लोगों की आदत है, हमने अंग्रेजी शब्द को ऐसे स्वीकारा जैसे वह अमृत हो। शब्द तो कोई बुरा नहीं होता। लेकिन मैंने सुना है कि अंधे को सूरदास कहना अधिक सम्मानजनक है और उचित भी। आज कितने प्रतिशत ब्लॉगर चिट्ठा शब्द इस्तेमाल करते हैं? शायद बहुत कम। मैं स्वयं भी अधिकांशत: ब्लॉग शब्द का इस्तेमाल करता हूँ, चिट्ठे का कम। इसका कारण मैं स्वयं भी हूँ और अन्य लोग भी। शब्दों का भाषाओं में आना-जाना लगा रहता है लेकिन वह स्वाभाविक होता है। हमने जानबूझकर इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया है। उदारवाद हमेशा मूल रूप से खतरनाक साबित होता आया है, क्योंकि वह कहीं-न-कहीं नाव में छेद कर देता है। चाहे वह भाषा के मामले में हो या सुरक्षा के मामले में। उदार होने के साथ-साथ स्वयं के अस्तित्व को बनाए रखना भी अनिवार्य है।

शनिवार, 13 अगस्त 2011

अंग्रेजी के खिलाफ़ जब बोले श्री सेठ गोविन्ददास( चौथा और अन्तिम भाग):- अवश्य पढ़ें

(बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के नवम वार्षिकोत्सव में सभापति-पद से श्रीसेठ गोविन्ददास जैसा प्रख्यात और जबरदस्त हिन्दी-सेवी अंग्रेजी के भक्तों के सारे झूठे और बेबुनियाद  (कु)तर्कों  को चुनौती देते हुए जब बोलता है तब वे परेशान हो उठते हैं। लेकिन इसके बावजूद कि यह व्याख्यान आज से करीब पचास साल पहले का है (1960-62 ), आज भी इसकी प्रासंगिकता में कमी नहीं आई है और संकट और बढ़ा है। इसलिए उनके उस व्याख्यान को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। यह व्याख्यान परिषद द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'राष्ट्रभाषा हिन्दी: समस्याएँ और समाधान' से लिया गया है। इसे देखिए, लोगों तक पहुँचाइये कि कैसे आज से पचास साल पहले के भारत में और आज के भारत तक में अंग्रेजी का भ्रम फैलाया गया है क्योंकि भारत का अधिकांश आदमी कभी इन बातों पर सोचता नहीं कि ये भ्रम कितने तथ्यपूर्ण और सत्य हैं। इन सत्यों को छिपाया गया है और आज भी छिपाने का षडयंत्र हो रहा है और इस कारण लोग हमेशा इनके कहे झूठ का शिकार होते आये हैं।)


पहला भाग        दूसरा भाग        तीसरा भाग



अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों का आधार अँगरेजी: एक भ्रमजाल

बुधवार, 10 अगस्त 2011

अंग्रेजी के खिलाफ़ जब बोले श्री सेठ गोविन्ददास(भाग-3):- अवश्य पढ़ें

(बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के नवम वार्षिकोत्सव में सभापति-पद से श्रीसेठ गोविन्ददास जैसा प्रख्यात और जबरदस्त हिन्दी-सेवी अंग्रेजी के भक्तों के सारे झूठे और बेबुनियाद  (कु)तर्कों  को चुनौती देते हुए जब बोलता है तब वे परेशान हो उठते हैं। लेकिन इसके बावजूद कि यह व्याख्यान आज से करीब पचास साल पहले का है (1960-62 ), आज भी इसकी प्रासंगिकता में कमी नहीं आई है और संकट और बढ़ा है। इसलिए उनके उस व्याख्यान को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। यह व्याख्यान परिषद द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'राष्ट्रभाषा हिन्दी: समस्याएँ और समाधान' से लिया गया है। इसे देखिए, लोगों तक पहुँचाइये कि कैसे आज से पचास साल पहले के भारत में और आज के भारत तक में अंग्रेजी का भ्रम फैलाया गया है क्योंकि भारत का अधिकांश आदमी कभी इन बातों पर सोचता नहीं कि ये भ्रम कितने तथ्यपूर्ण और सत्य हैं। इन सत्यों को छिपाया गया है और आज भी छिपाने का षडयंत्र हो रहा है और इस कारण लोग हमेशा इनके कहे झूठ का शिकार होते आये हैं।)



वैज्ञानिक उधार खाता

रविवार, 7 अगस्त 2011

अंग्रेजी के खिलाफ़ जब बोले श्री सेठ गोविन्ददास(भाग-2):- अवश्य पढ़ें

(बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के नवम वार्षिकोत्सव में सभापति-पद से श्रीसेठ गोविन्ददास जैसा प्रख्यात और जबरदस्त हिन्दी-सेवी अंग्रेजी के भक्तों के सारे झूठे और बेबुनियाद (कु)तर्कों  को चुनौती देते हुए जब बोलता है तब वे परेशान हो उठते हैं। लेकिन इसके बावजूद कि यह व्याख्यान आज से करीब पचास साल पहले का है (1960-62 ), आज भी इसकी प्रासंगिकता में कमी नहीं आई है और संकट और बढ़ा है। इसलिए उनके उस व्याख्यान को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। यह व्याख्यान परिषद द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'राष्ट्रभाषा हिन्दी: समस्याएँ और समाधानसे लिया गया है। इसे देखिएलोगों तक पहुँचाइये कि कैसे आज से पचास साल पहले के भारत में और आज के भारत तक में अंग्रेजी का भ्रम फैलाया गया है क्योंकि भारत का अधिकांश आदमी कभी इन बातों पर सोचता नहीं कि ये भ्रम कितने तथ्यपूर्ण और सत्य हैं। इन सत्यों को छिपाया गया है और आज भी छिपाने का षडयंत्र हो रहा है और इस कारण लोग हमेशा इनके कहे झूठ का शिकार होते आये हैं।)

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

अंग्रेजी के खिलाफ़ जब बोले श्री सेठ गोविन्ददास(भाग-1):- अवश्य पढ़ें

(बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के नवम वार्षिकोत्सव में सभापति-पद से श्रीसेठ गोविन्ददास जैसा प्रख्यात और जबरदस्त हिन्दी-सेवी अंग्रेजी के भक्तों के सारे झूठे और बेबुनियाद (कु)तर्कों  को चुनौती देते हुए जब बोलता है तब वे परेशान हो उठते हैं। लेकिन इसके बावजूद कि यह व्याख्यान आज से करीब पचास साल पहले का है (1960-62 ), आज भी इसकी प्रासंगिकता में कमी नहीं आई है और संकट और बढ़ा है। इसलिए उनके उस व्याख्यान को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। यह व्याख्यान परिषद द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'राष्ट्रभाषा हिन्दी: समस्याएँ और समाधान' से लिया गया है। इसे देखिए, लोगों तक पहुँचाइये कि कैसे आज से पचास साल पहले के भारत में और आज के भारत तक में अंग्रेजी का भ्रम फैलाया गया है क्योंकि भारत का अधिकांश आदमी कभी इन बातों पर सोचता नहीं कि ये भ्रम कितने तथ्यपूर्ण और सत्य हैं। इन सत्यों को छिपाया गया है और आज भी छिपाने का षडयंत्र हो रहा है और इस कारण लोग हमेशा इनके कहे झूठ का शिकार होते आये हैं।)

बुधवार, 23 मार्च 2011

आखिर कौन है ये भगतसिंह?


भगतसिंह के बहाने अपनी बात

भगतसिंह- एक जाना पहचाना नाम विशेष रूप से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक्शन हीरो के तौर पर। इस नाम के बारे में मुझे क्यों कुछ कहने की जरुरत हो रही है जबकि इस नाम के उपर लाखों पन्ने भरे जा चुके हैं, करोड़ों रूपये का व्यापार हिन्दी सिनेमा कर चुका है। कुछ तो ऐसा है जरुर कि मैं कुछ कहना चाह रहा हूं। तो चलिए भगतसिंह की रेलगाड़ी में सैर करते हैं।

बुधवार, 2 मार्च 2011

अंग्रेजी और अंग्रेजों के शासन में जी रहे हैं हम


एक वेबसाइट है भारत सरकार की। प्रकाशन विभाग आता है सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत उसी की बात कर रहा हूं। मैं पिछले दो-तीन वर्षों से इस साइट पर जाकर भारत 2008, 2009, 2010 तक किताब डाउनलोड करता था। लेकिन इस बार इण्डिया 2011 वह भी बहुत ही घटिया रूप में सिर्फ़ कुछ पन्नों में उसकी झलक दिखायी गई है, तो बहुत देर के बाद आ गयी है लेकिन भारत 2011 का अभी तक कोई अता-पता नहीं। हमारे प्रधानमंत्री और लगभग सारे मंत्री अंग्रेजों की मानस संतानें हैं। शायद इसलिये ऐसा हो रहा है कि जो किताब साल के शुरु में ही आ जाती थी वह आज तक इस साल में 60 दिन बीत जाने पर भी नहीं आयी है। और मुझे लगता भी नहीं कि आयेगी। हमारी सारी सरकारें खासकर वर्तमान सरकार अंग्रेज लोगों से भरी पड़ी है। प्रधानमंत्री को साल में एक दो बार ही आप हिन्दी और पंजाबी बोलते सुन पायेंगे। हमारे देश में एक और इतिहास है कि एक ऐसे आदमी को जिसे भारत की 80 करोड़ से भी ज्यादा जनता बोल सकती है, समझ सकती है ऐसी भाषा नहीं जानने वाले को राष्ट्रपति बनाकर भारत का प्रतिनिधि बनाया जाता है। शायद ही किसी देश में ऐसा हुआ हो कि एक राष्ट्राध्यक्ष अपनी राष्ट्रभाषा जानता ही नहीं हो।