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शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

जन लोकपाल बिल में रेमन मैगसेसे पुरस्कार की बात क्यों ?


पता नहीं कैसे लोग मीडिया में होते हैं जिनको आंख पर पट्टी बांधकर रहना अच्छा लगता है और वे समझ ही नहीं पाते कि तहरीर चौक एक तमाशा के सिवा कोई क्रान्ति-व्रान्ति नहीं था। जिधर देखो उधर हर जगह यह शोर है कि तहरीर चौक बन जायेगा जंतर-मंतर। इस तहरीर चौक और मिस्र की क्रान्ति की नौटंकी के बारे में पहले भी लिख चुका हूं। जहां तक मैं समझता हूं कि मिस्र हो या लीबिया हो या कोई और हो जहां भी क्रान्ति की सुगबुगाहट सुनाई पड़ रही थी, वह अमेरिका के चालाकी और दुष्टतापूर्ण उपनिवेशवाद का ही दिखावटी चेहरा है। मिस्र में अलबरादेई अमेरिका के चापलूस( भले ही वे नोबेल पुरस्कार विजेता हैं) हैं, अपना कद बढ़ाने में लगे हुए हैं। वही अमेरिका जिसके बहुत से राष्ट्रपतियों को नोबेल का शान्ति पुरस्कार मिल चुका है। लेकिन भारत में कोई इस लायक नोबेल समिति को दिखता ही नहीं। अब अमेरिका जान बूझ कर क्रान्ति के नाम पर लोगों को भड़का कर अपने चापलूसों या नौकरों को इन देशों का प्रमुख बनवा रहा है ताकि अमेरिका का प्रभुत्त्व इन सब पर कायम रह सके। एक बात जरुर याद दिला दूं कि यही अमेरिका क्यूबा की मदद कर रहा था तो वहां की जनता इसकी तारीफ़ कर रही होगी लेकिन यह देश बाद में इन्हीं लोगों पर कब्जा कर बैठा था। ऐसे ही चालबाजी सहायता यह देश दूसरे देश को देता है। फिर भी अमेरिका कुछ गलत नहीं कर रह- ये कहने वाले लोग हैं। सुना है कि यही अमेरिका दूसरे देशों को सिखाता है कि ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए अन्य देश अपनी सुविधाओं में कमी लाएं लेकिन खुद उसके यहां किसी भी मिनट में 7000 हवाई जहाज उड़ते हुए पाए जाते हैं। इसी देश को लोग आदर्श और महान कहने वाले हमारे देश में मौजूद हैं।
           

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

'शीला की जवानी’ बीच चौराहे पर गाइये और देख लीजिये क्रान्ति


मिस्र में होस्नी मुबारक को भगाया जा चुका है। ट्यूनिशिया की देखा देखी वहां के नागरिकों के दिमाग में कुछ खलबली मची, सेना ने भी साथ दिया और हो गया तीस सालों से चले आ रहे शासन का समापन। यमन और अल्जीरिया भी नकल करने में लगे हुए हैं। फिलहाल सरकार ने इन दोनों देशों के लोगों पर रोक लगा दी है। लोकतंत्र का शोर शुरु हो रहा है यानि एक और लोकतांत्रिक देश। वहां के जनाक्रोश का असर भारत में क्या पड़ सकता है, इसपर विचार विनिमय शुरु हो चुका है तब क्रान्ति को लेकर कुछ कहना अप्रासंगिक नहीं होगा।