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शुक्रवार, 23 मार्च 2012

भगतसिंह के चौदह दस्तावेज



भगतसिंह के चौदह दस्तावेज

किसी ने सच कहा है- "सुधार बूढ़े आदमी नहीं कर सकते, क्योंकि वह बहुत ही बुद्धिमान और समझदार होते हैं। सुधार तो होते हैं युवक के परिश्रम, साहस, बलिदान और निष्ठा से, जिन्हें भयभीत होना आता ही नहीं और जो विचार कम तथा अनुभव अधिक करते हैं।"
( भगतसिंह के 'स्वाधीनता के आन्दोलन में पंजाब का पहला उभार' लेख से)

सोमवार, 14 नवंबर 2011

नेहरु और नेताजी पर भगतसिंह के विचार


बाल दिवस यानी चौदह नवम्बर के पहले जवाहर लाल नेहरु के खिलाफ़ भाई विश्वजीत सिंह जी ने एक लेख लिखा है। इन दिनों बहस का इरादा भी नहीं है मेरा, इसलिए यहाँ इस लेख को प्रस्तुत करने के बाद मैं किसी बहस में पड़ना भी नहीं चाहता। एक अक्तूबर को ही यह लेख मैंने टंकित कर लिया था। संयोग से विश्वजीत भाई ने याद दिला दिया, सो आज यहाँ लगा रहा हूँ। इसे भगतसिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज, सम्पादक - चमनलाल से लिया है। नेहरु के प्रति भगतसिंह के विचारों से मतभेद हो सकता है क्योंकि नेहरु भी 1928 में जो थे या रहे थे, वही नेहरु तो 1947 या 1962 में नहीं रहे होंगे।

नए नेताओं के अलग-अलग विचार

[जुलाई, 1928 के किरती में छपे इस लेख में भगतसिंह ने सुभाषचन्द्र बोस और जवाहरलाल नेहरू के विचारों की तुलना की है।]

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

भगतसिंह नास्तिक और कम्युनिस्ट थे, थे और थे ( भगतसिंह पर विशेष )


भगतसिंह का लिखा एक लेख है- युवक, बलवन्तसिंह के नाम से। यह मतवाला के 16 मई, 1925 के अंक में छपा था। आलोचना के 32वें वर्ष के अक्टूबर-दिसम्बर, 1983 अंक में, इस बात की पुष्टि आचार्य शिवपूजन सहाय ने की थी। युवक शीर्षक लेख में भगतसिंह अमेरिका के युवक दल के नेता पैट्रिक हेनरी के अमेरिका के युवकों में की गई ज्वलन्त घोषणा “We believe that when a Government becomes a destructive of the natural right of man, it is the man’s duty to destroy that Government.” अर्थात् अमेरिका के युवक विश्वास करते हैं कि जन्मसिद्ध अधिकारों को पद-दलित करने वाली सत्ता का विनाश करना मनुष्य का कर्तव्य है, को उद्धृत करते हैं। अफसोस है कि आज के अमेरिका की स्थिति एकदम 180 डिग्री पर उल्टी है। उस वक्त अमेरिका, इटली, रूस, आयरलैंड, फ्रांस आदि देशों के अनेक लेखकों-चिन्तकों से भगतसिंह प्रेरणाएँ लिया करते थे, क्योंकि इन सब देशों में क्रांतिकारी आन्दोलन हुआ करते थे या ईमानदार नेता भी अधिक थे।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

अभिनेता भी थे भगतसिंह


भगत सिंह के क्रांतिकारी रूप से तो सभी परिचित हैं लेकिन वह एक कुशल अभिनेता भी थे। भगत सिंह के अभिनेता रूप से परिचित करा रहे हैं- राजशेखर व्यास।

गत सिंह और अभिनय-! निश्चय ही यह बात सारे लोगों को चौंका सकती है क्योंकि उनसे बड़ा यथार्थवादी क्रांतिकारी तो भारत में दूसरा नहीं हुआ फिर भला वह अभिनय कैसे कर सकते थे? लेकिन जीवन को रंगशाला समझनेवाले महानायक जीवन को भी एक अभिनय से ज्यादा नहीं समझते थे।

बुधवार, 20 जुलाई 2011

एक अंग्रेजी लेखक के बाप को सम्मान देने की तैयारी जिसने भगत सिंह के खिलाफ गवाही दी थी

इच्छा तो कुछ और लिखने की थी लेकिन लिख कुछ और रहा हूँ। एक बेहद शर्मनाक खबर है। अपनी इस पोस्ट का शीर्षक मैं वहीं से लेकर इस्तेमाल कर रहा हूँ।

खबर यहाँ है , विस्तार से पढिए। हमारी सरकार ने भगतसिंह जैसों के लिए तो पहले ही अंग्रेजी में टेरोरिस्ट शब्द किताबों में लिखवाया है। उग्रवादी या आतंकवादी तो पहले से भगतसिंह को घोषित किया गया है। आई सी एस ई और सी बी एस ई बोर्ड तो हैं ही देश को नीचे ले जाने के लिए। इन बोर्डों के भक्तजनों को दुख पहुँचना लाजमी है। उनसे माफी नहीं मांगूंगा क्योंकि अपनी किताब में भी इनकी आलोचना की है। एक अच्छा पक्ष दिखाकर बोर्ड को बहुत अच्छा साबित करनेवाले भाई लोग यहाँ बयानबाजी न करें।

रविवार, 3 जुलाई 2011

मैं मूर्ख हूँ और अपने देश का बुरा चाहता हूँ(परिवर्धित संस्करण )

साहब ने अपना ज्ञान बघारा है। अभी-अभी देखा। उनके सारे अनुयायी जैसे कि… छोड़िए नाम नहीं लेता हूँ। चला बिहारी ब्लागर बनने (सलिल नाम है जिन्होंने अप्रत्यक्ष रुप से मुझे कुछ कहा है। इनका नाम लेना पड़ा क्योंकि इन्होंने मुझे संबोधित किया है।) आदि अपने तो भेड़चाल में शामिल हैं लेकिन जरा देखिए कि मुझे क्या कहा है इस सलिल ने जो पटना के ही हैं- 'जिन महाशय ने कभी आपको भगोड़े भारतीय के खिताब से नवाजा था, उन्हें यह आलेख और ऐसे ही कई आलेख जो आपने पूर्ण शोध के आधार पर लिखे हैं, पढना चाहिए! मगर क्या किया जा सकता है- मूर्ख और मृतक अपने विचारों से चिपक जाते हैं!!'

      साहब भूल गए कि मृतक विचार कर ही नहीं सकता तो चिपकने की बात कहाँ से आ गई?


मंगलवार, 28 जून 2011

भगतसिंह के नास्तिक होने की बात को ही झुठलाने की कोशिश

भगतसिंह और नास्तिकता का मुद्दा अभी भी जोरों पर है। कल वाली पोस्ट के बाद भी टिप्पणियों का शोर थमा नहीं है। मैं खुद चकित हूँ कि इस तरह टिप्पणियाँ होती रहीं, तो कुछ ही दिनों में किताब का रुप अख्तियार कर लेंगी। फिर मैं आपके सामने आगे की टिप्पणियाँ दे रहा हूँ। कुछ चीजें जो व्यक्तिगत हैं, उन्हें देने की कोई जरूरत तो नहीं है लेकिन उन्हें हटाने से कुछ बातें स्पष्ट नहीं हो पाएंगी और वैसे भी चिट्ठा यानि ब्लॉग है तो कुछ कुछ डायरी जैसा भी। 

पहले की टिप्पणियों के लिए पिछली पोस्ट देखें। इस बार दो नए लोग बहस में शामिल हुए हैं। पहले आते हैं अमर कुमार जो कुछ देर के लिए अपनी बात या कहिए आपत्ति रखते हैं और बाद में स्मार्ट साहब अपनी बात कह जाते हैं। थोड़े गुस्से में हैं। तभी आगमन होता है इस नाटक के एक नए पात्र ग्लोबल अग्रवाल का जो भगतसिंह के नास्तिक होने पर ही सवाल खड़ा करता आलेख थमा जाते हैं। मैंने उनकी हर बात का जवाब अपनी समझ से देने की कोशिश की है। यह बहस अभी चलती रहेगी या समाप्त भी होगी, यह नहीं कहा जा सकता। 

सोमवार, 27 जून 2011

अब भगतसिंह के 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' पर ही उठा दी गई अंगुली

जी हाँ। अब भगतसिंह के लिखे आलेख 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' पर ही अंगुली उठाते हुए पिछली पोस्ट वाले स्मार्ट इंडियन अपने शक की सूई चुभोना चाह रहे हैं। इस आलेख में मैं अनवरत पर हुई चर्चा के उन अंशों को दे रहा हूँ जिनमें भगतसिंह के आलेख पर संदेह किया गया है।

मैं अक्सर अपनी टिप्पणियाँ दूसरे चिट्ठों पर करता हूँ और वह इस लायक हो जाते हैं कि उन्हें पूरे आलेख में आपके सामने रखा जा सकता है। मेरा मानना है कि इस तरह की टिप्पणियों वाले आलेखों में अच्छी बातें सामने आती हैं। अब अफसोस इस बात का है कि ऐसा करते समय किसी खास आदमी को केंद्र में रखना पड़ जाता है। और यह अच्छा नहीं लगने पर भी करना आवश्यक लगता है क्योंकि बहुत सारे सवाल-जवाब के क्रम में बहुत सी नई बातें और विचार सामने आते हैं। इसलिए आज पढ़िए यह आलेख।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

किसी को याद न आये शहीद

23 मार्च 2011 को हमारे देश की संसद में यह तय किया जा रहा था कि कौन सा पक्ष ज्यादा दोषी है। मनमोहन सिंह सरकार और विपक्ष भाजपा में यह हल्ला था कि कौन बेदाग है। हमारी संसद के सारे लोग आरोप-प्रत्यारोप में जी-जान से लगे हुए थे। उन्हें याद ही नहीं आ सका कि आज 23 मार्च 2011 है यानि भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के शहीद होने के अस्सी साल पूरे हो रहे हैं। अब कोई भी आदमी सोचें कि इनकी हरकतों को क्या कहा जाए? हमारा देश क्रिकेट, सिनेमा, चुनाव को कितने जोर-शोर से याद करता है! लेकिन 23 मार्च में न तो ग्लैमर है, न मार्केट वैल्यू, न कोई टी आर पी है फिर क्यों कोई याद रखे। अपनी क्षणिक खुशी के लिए क्रिकेट के पीछे साल के पचासों दिन खर्च करने वाले युवा, कभी सोचते ही नहीं कि वे चैन से खेल देख पाते हैं तो इसके पीछे भी कितनी बड़ी बात है। सवा अरब का शोर हर तरफ़ हो रहा है। मीडिया कमीनेपन की हद पार कर चुका है। भगतसिंह के अरबवें हिस्से में नहीं आने वाले इस देश के ऊपर शासन करते हैं। बीस पेज के अखबार में बीस लाइन में हर साल भगतसिंह को निपटा देने वाले मीडिया को क्या कहा जाए, आप खुद सोच लें। लेकिन यही मीडिया अखबार में साल में क्रिकेट के पीछे हजार पेज, सिनेमा के पीछे हजार पेज बहुत आसानी से खर्च करता है। और खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहता फिरता है। लेकिन हकीकत में यह लोकतंत्र के चौकी की एक कील तक नहीं है।

बुधवार, 23 मार्च 2011

आखिर कौन है ये भगतसिंह?


भगतसिंह के बहाने अपनी बात

भगतसिंह- एक जाना पहचाना नाम विशेष रूप से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक्शन हीरो के तौर पर। इस नाम के बारे में मुझे क्यों कुछ कहने की जरुरत हो रही है जबकि इस नाम के उपर लाखों पन्ने भरे जा चुके हैं, करोड़ों रूपये का व्यापार हिन्दी सिनेमा कर चुका है। कुछ तो ऐसा है जरुर कि मैं कुछ कहना चाह रहा हूं। तो चलिए भगतसिंह की रेलगाड़ी में सैर करते हैं।

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

'शीला की जवानी’ बीच चौराहे पर गाइये और देख लीजिये क्रान्ति


मिस्र में होस्नी मुबारक को भगाया जा चुका है। ट्यूनिशिया की देखा देखी वहां के नागरिकों के दिमाग में कुछ खलबली मची, सेना ने भी साथ दिया और हो गया तीस सालों से चले आ रहे शासन का समापन। यमन और अल्जीरिया भी नकल करने में लगे हुए हैं। फिलहाल सरकार ने इन दोनों देशों के लोगों पर रोक लगा दी है। लोकतंत्र का शोर शुरु हो रहा है यानि एक और लोकतांत्रिक देश। वहां के जनाक्रोश का असर भारत में क्या पड़ सकता है, इसपर विचार विनिमय शुरु हो चुका है तब क्रान्ति को लेकर कुछ कहना अप्रासंगिक नहीं होगा।