शनिवार, 14 अप्रैल 2012

अब तो अपना असली नाम भी भूल गया हूँ... (भोजपुरी से हिन्दी में अनूदित)


अभी आब ता आपन असली नाम भी भुला गईल बानी... शीर्षक से एक व्यंग्य या लघुकथा या जो कहें, पढा। सोचा कि इसे पढवाते हैं। प्रस्तुत है इसका हिन्दी अनुवाद। हालाँकि इसका अधिकांश हिस्सा हिन्दी में था, फिर भी अनुवाद करने की कोशिश की है। 

शहर में पिछले १० दिन से एक मनोचिकित्सक की बड़ी धूम मची थी, हर आदमी के मुँह से एक ही बात कि अगर आप डिप्रेशन के शिकार हैं, तो इस मनोचिकित्सक से ज़रूर मिलें, यह मनोचिकित्सक आपकी समस्या २ मिनट में ठीक कर देगा, आपको अवसादमुक्त कर देगा। और यह बात झूठी भी नहीं थी, पिछले १ महीने से जो भी डिप्रेशन का शिकार उसके पास गया उसे उसने २ दिन में ठीक कर दिया। 

यह सब सुन और जान कर एक आदमी सुबह से उसके क्लिनिक में अपना इलाज करवाने के लिए भूखा-प्यासा लाइन में लगा रहा। भूख के मारे उसकी हालत ख़राब हो गई तब जाकर दिन में २ बजे उसका नंबर आया। गया डॉक्टर की केबिन में, कुर्सी पर बैठा। 

मनोचिकित्सक- आप का नाम क्या है?

मरीज- दुनिया ने हजारों नाम दिए हैं, अब तो अपना असली नाम भी हम भूल गए हैं। 

मनोचिकित्सक- आप तो काफी गहरे अवसाद के शिकार लगते हैं, खैर कोई बात नहीं, हम आपको ठीक कर देंगे। आप चिंता मत कीजिये। सबसे पहले आप यह बात अपने मन में बिठा लीजिये की ये अवसाद यानि डिप्रेशन की बीमारी दवा से नहीं बल्कि अपने मन को बदलने से ठीक होगी। 

मरीज- डॉक्टर साहेब, ई सब बात छोड़िए, बस आप हमको वह दवा बताइये जिसकी आजकल सब लोग चर्चा करते हैं, कि उससे हर तरह का अवसाद २ दिन में ठीक हो जायेगा। 

मनोचिकित्सक- जी बिलकुल... 

इतना कहकर मनोचिकित्सक उठ गया और केबिन की खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया।  

मनोचिकित्सक- यहाँ आइये, उस अनोखी दवा जिससे हर तरह का अवसाद ठीक हो जाता है, की दूकान यहाँ से दिखती है, बस आप को आज शाम वहीं जाना है और वहीं आपकी बीमारी का इलाज हो जायेगा बस २ घंटे में। 

मरीज- अरे वह तो सर्कस का तम्बू लगा है, पिछले एक महीने से वहाँ सर्कस दिखाया जाता है!

मनोचिकित्सक- जी हाँ, सर्कस का तम्बू! उसी में अवसाद का इलाज है, आप वहाँ जाइये, आज का शो देखिये। उस सर्कस में एक जोकर है, जब आप उसके कारनामों को देखेंगे तो हँसते-हँसते लोट-पोट हो जायेंगे और तब जाकर आपको इस बात का एहसास होगा की हँसना और हँसना ही ज़िन्दगी है, मैं अपने सारे मरीजों को वहीं भेजता हूँ सर्कस देखने और उन सबको इस बात का एहसास २ घंटे में ही हो जाता है कि अगर ज़िन्दगी में हँसी शामिल हो जाये तो अवसाद अपने आप भाग जायेगा। आप भी जायें आज ही वहाँ, फिर फायदा देखिये उस जोकर के कारनामों का।

मरीज- डॉक्टर साहब, वो जोकर "मैं ही हूँ"। 

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यह अंश भी अंत में था उसमें- 

कहने का अर्थ यह है कि हमारी ज़िन्दगी में चाहे जितने भी दुःख भरे हों, फिर भी हम सबको हमेशा ऐसे काम करने की कोशिश करनी चाहिए कि हमारी वजह से दूसरे की ज़िन्दगी में ख़ुशियाँ भर जायें। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह वाह क्या बात है, कथावस्तु का अंत |
    अवसादी बांटे ख़ुशी, जब जीवन-पर्यन्त ||

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  2. चंदन, बहुत अच्छी कथा पेश की है आप ने।
    हमारी लोकभाषाओं और बोलियों में ऐसा साहित्य भरा पड़ा है जिन में जनता का सामुहिक अनुभव अभिव्यक्त होता है। उन्हें हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में लाने का काम एक महत्वपूर्ण काम है। इसे यदा कदा करने के स्थान पर नियमित काम के बतौर किया जा सकता है।

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