सोमवार, 30 जनवरी 2012

क्या कहूँ उस देश को ( कविता)

यह संभवतः 30 जनवरी 2008 को लिखी कविता है। समय का जिक्र करना आदत-सी है। इसका यह अर्थ न लगाया जाये कि कोई ऐतिहासिक सामग्री प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसके यह अंश मुझे भाषा की दृष्टि से बहुत पसंद हैं- 

बन रहे हैं शस्त्र ऐसे
नाश का भी नाश कर दें
आदमी की शक्तियों से
जहाँ भय, भयभीत!

अब पूरी कविता:

हो रहा हो रक्तरंजित
पिता भी जिस राष्ट्र का
बोल मेरे मीत !
क्या कहूँ उस देश को ।

बरसती हैं गोलियाँ
आज पानी की जगह
देखता है नभ कृषक को
जल के लिए, विपरीत !
क्या कहूँ उस देश को ।

बन रहे हैं शस्त्र ऐसे
नाश का भी नाश कर दें
आदमी की शक्तियों से
जहाँ भय, भयभीत !
क्या कहूँ उस देश को ।

जहाँ सपने देखने को
बच्चे नहीं आजाद हैं,
मुस्कुराहट डर रही है
ऐसे रहे दिन, बीत !
क्या कहूँ उस देश को ।

कह रहे पुरखे मनुज के
मेरी नहीं संतान ये ।
पूछा गया मुझसे जहाँ
किसने दिया अधिकार
जो ये गा रहे हो गीत !
बोल मेरे मीत !
क्या कहूँ उस देश को ।

3 टिप्‍पणियां:

  1. किसने दिया अधिकार
    जो ये गा रहे हो गीत !
    बोल मेरे मीत
    बोल मेरे मीत |

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  2. पासपोर्ट की तैयारी दिखती है.

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  3. कह रहे पुरखे मनुज के
    मेरी नहीं संतान ये ।
    पूछा गया मुझसे जहाँ
    किसने दिया अधिकार
    जो ये गा रहे हो गीत !
    बोल मेरे मीत !
    क्या कहूँ उस देश को ।very nice.

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