मंगलवार, 31 मई 2011

वरदान का फेर (नाट्य रुपांतरण, भाग -2)

वाचक: दोनों जून 1-1 कटोरा साबूदाना उबालकर महात्माजी पीते थे। आइए हम देखते हैं कि वे किस तरह नित्य मूर्खोपनिषद् का पाठ करते हैं। (महात्माजी के हाथ में एक मोटी पुस्तक है। वे पढ़ते हैं।
ॐ नमो मूर्खेश्वराय मूर्खतां देहि मे सदा।
वंदे मूर्खोपनिषदम् ग्रंथम् पठति मूर्खशिरोमणि:॥

रविवार, 29 मई 2011

ये टाई काहे को पहनता है भाई?

कल क्या टाई के बगैर गंभीर पत्रकारिता नहीं हो सकती? शीर्षक से एक आलेख देखा तो एक कहानी याद आ गयी। जरा ध्यान से सुनिएगा।
     यह कहानी ठीक से याद नहीं। लेकिन गालिब के बारे में है। एक बार गालिब को बादशाह ने भोजन पर बुलाया। गालिब ठहरे गरीब आदमी। कोई शाही या राजसी वस्त्र तो था नहीं उनके पास। इसलिए पहुंच गए सीधे अपने सादे कपड़ों में। द्वारपाल ने दरवाजे से भगा दिया। गालिब कहते रहे कि मैं गालिब हूं और मुझे भोजन पर बुलाया गया है। 

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

क्या हम आजाद हैं और हैं, तो किस मामले में?


आज से करीब दो सौ साल पहले जब अंग्रेज भारत पर अपनी शासन व्यवस्था लादना शुरु कर रहे थे तब भारत की जनसंख्या कितनी रही होगी? मुझे लगता है पंद्रह करोड़ के आस-पास जबकि उसमें पाकिस्तान और बांग्लादेश भी शामिल थे। भारत में तथाकथित आजादी के बाद जो भी व्यवस्थाएं की गईं उनमें कोई भारतीयता नहीं थी। शुरु करते हैं- शिक्षा से। आज शिक्षा व्यवसाय है। लेकिन उस समय शिक्षक समाज का सबसे ज्यादा सम्मानित हिस्सा हुआ करता था। शिक्षा के क्षेत्र में पैसे का प्रचलन नहीं था। गुरुकुल हुआ करते होंगे। इस समय उनकी क्षमता या प्रासंगिकता मेरा आलोच्य विषय नहीं है। राजा या अमीर लोग दान देते होंगे और विद्यालय चलते होंगे। यानि हमारी शिक्षा व्यवस्था को सेवा से पेशा बनाने का काम इन अंग्रेजों ने किया जो आज पूरी तरह पेशे में बदल चुकी है। यहां तक कि सरकार के यहां भी शिक्षक अब सेवा नहीं नौकरी करता है और तनख्वाह सबसे प्रमुख विषय बन गयी।

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल( भाग-2)


युद्ध की राजनीति और हथियारों का व्यवसाय

युद्ध कभी भी राजनीतिक कारणों के लिये नहीं बल्कि आर्थिक कारणों के लिये ही लड़े जाते हैं। प्रथम विश्व युद्ध के बाद यह बात एकदम शीशे की तरह साफ नजर आती है कि इन विशालकाय कम्पनियों के आपसी हित जब टकराते हैं तो उसका परिणाम पूरी मानव जाति को झेलना पड़ता है। अमेरिका ने प्रथम विश्व युद्ध में दखल देने का निर्णय तभी लिया जब उसने देखा कि अमरीकी कम्पनियों के आर्थिक हित चौपट होते जा रहे हैं।

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल( भाग-1)


प्रस्तुतकर्ता : चंदन कुमार मिश्र

इन विदेशी कम्पनियों ने देश में कम्पन पैदा कर दिया है। पूरे देश में लाखों-करोड़ों लोगों के अस्वस्थ बनाने, रोजगार छीन लेने, भारत को कमजोर बनाने, पूरे देश को जकड़ कर जोंक की तरह पकड़ कर रखने में इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने कोई प्रयास नहीं छोड़ रखा है। इसी विषय पर आइए एक शानदार किताब पढ़ते हैं जो कुछ कड़ियों में आपके सामने प्रस्तुत की जायेगी जिसका नाम है- बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल। इसके लेखक हैं राजीव दीक्षित। इस किताब में आप निम्न अध्यायों को पढ़ेंगे।


मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

किसी को याद न आये शहीद

23 मार्च 2011 को हमारे देश की संसद में यह तय किया जा रहा था कि कौन सा पक्ष ज्यादा दोषी है। मनमोहन सिंह सरकार और विपक्ष भाजपा में यह हल्ला था कि कौन बेदाग है। हमारी संसद के सारे लोग आरोप-प्रत्यारोप में जी-जान से लगे हुए थे। उन्हें याद ही नहीं आ सका कि आज 23 मार्च 2011 है यानि भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के शहीद होने के अस्सी साल पूरे हो रहे हैं। अब कोई भी आदमी सोचें कि इनकी हरकतों को क्या कहा जाए? हमारा देश क्रिकेट, सिनेमा, चुनाव को कितने जोर-शोर से याद करता है! लेकिन 23 मार्च में न तो ग्लैमर है, न मार्केट वैल्यू, न कोई टी आर पी है फिर क्यों कोई याद रखे। अपनी क्षणिक खुशी के लिए क्रिकेट के पीछे साल के पचासों दिन खर्च करने वाले युवा, कभी सोचते ही नहीं कि वे चैन से खेल देख पाते हैं तो इसके पीछे भी कितनी बड़ी बात है। सवा अरब का शोर हर तरफ़ हो रहा है। मीडिया कमीनेपन की हद पार कर चुका है। भगतसिंह के अरबवें हिस्से में नहीं आने वाले इस देश के ऊपर शासन करते हैं। बीस पेज के अखबार में बीस लाइन में हर साल भगतसिंह को निपटा देने वाले मीडिया को क्या कहा जाए, आप खुद सोच लें। लेकिन यही मीडिया अखबार में साल में क्रिकेट के पीछे हजार पेज, सिनेमा के पीछे हजार पेज बहुत आसानी से खर्च करता है। और खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहता फिरता है। लेकिन हकीकत में यह लोकतंत्र के चौकी की एक कील तक नहीं है।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

जन लोकपाल बिल में रेमन मैगसेसे पुरस्कार की बात क्यों ?


पता नहीं कैसे लोग मीडिया में होते हैं जिनको आंख पर पट्टी बांधकर रहना अच्छा लगता है और वे समझ ही नहीं पाते कि तहरीर चौक एक तमाशा के सिवा कोई क्रान्ति-व्रान्ति नहीं था। जिधर देखो उधर हर जगह यह शोर है कि तहरीर चौक बन जायेगा जंतर-मंतर। इस तहरीर चौक और मिस्र की क्रान्ति की नौटंकी के बारे में पहले भी लिख चुका हूं। जहां तक मैं समझता हूं कि मिस्र हो या लीबिया हो या कोई और हो जहां भी क्रान्ति की सुगबुगाहट सुनाई पड़ रही थी, वह अमेरिका के चालाकी और दुष्टतापूर्ण उपनिवेशवाद का ही दिखावटी चेहरा है। मिस्र में अलबरादेई अमेरिका के चापलूस( भले ही वे नोबेल पुरस्कार विजेता हैं) हैं, अपना कद बढ़ाने में लगे हुए हैं। वही अमेरिका जिसके बहुत से राष्ट्रपतियों को नोबेल का शान्ति पुरस्कार मिल चुका है। लेकिन भारत में कोई इस लायक नोबेल समिति को दिखता ही नहीं। अब अमेरिका जान बूझ कर क्रान्ति के नाम पर लोगों को भड़का कर अपने चापलूसों या नौकरों को इन देशों का प्रमुख बनवा रहा है ताकि अमेरिका का प्रभुत्त्व इन सब पर कायम रह सके। एक बात जरुर याद दिला दूं कि यही अमेरिका क्यूबा की मदद कर रहा था तो वहां की जनता इसकी तारीफ़ कर रही होगी लेकिन यह देश बाद में इन्हीं लोगों पर कब्जा कर बैठा था। ऐसे ही चालबाजी सहायता यह देश दूसरे देश को देता है। फिर भी अमेरिका कुछ गलत नहीं कर रह- ये कहने वाले लोग हैं। सुना है कि यही अमेरिका दूसरे देशों को सिखाता है कि ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए अन्य देश अपनी सुविधाओं में कमी लाएं लेकिन खुद उसके यहां किसी भी मिनट में 7000 हवाई जहाज उड़ते हुए पाए जाते हैं। इसी देश को लोग आदर्श और महान कहने वाले हमारे देश में मौजूद हैं।
           

रविवार, 3 अप्रैल 2011

यह जीत नहीं, भारत के लाखों करोड़ों के विदेश जाने का संकेत है


जीतना सबको अच्छा लगता है। जीत का मतलब ही होता है आंशिक उन्माद। और यह उन्माद भारत में कुछ ज्यादा ही है। हमारे यहां लोग हार को भी इसी उन्माद के साथ मनाते हैं। अगर भारत मैच हार जाये तो रोने चिल्लाने वाले लाखों लोग हैं, गाली देने वाले भी लाखों लोग हैं। लेकिन अगर जीत जाय तो इसका नशा भी लोगों पर चढ़कर नहीं ओवरफ्लो होकर दिखता है। पता नहीं यह क्या हो रहा है!

बुधवार, 30 मार्च 2011

आंख और इलाज (कविता)


आंख और इलाज

लोगों की
करतूत देखते-देखते
भगवान की भी
आंख
हो गयी ख़राब ।

बुधवार, 23 मार्च 2011

आखिर कौन है ये भगतसिंह?


भगतसिंह के बहाने अपनी बात

भगतसिंह- एक जाना पहचाना नाम विशेष रूप से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक्शन हीरो के तौर पर। इस नाम के बारे में मुझे क्यों कुछ कहने की जरुरत हो रही है जबकि इस नाम के उपर लाखों पन्ने भरे जा चुके हैं, करोड़ों रूपये का व्यापार हिन्दी सिनेमा कर चुका है। कुछ तो ऐसा है जरुर कि मैं कुछ कहना चाह रहा हूं। तो चलिए भगतसिंह की रेलगाड़ी में सैर करते हैं।

गुरुवार, 17 मार्च 2011

क्या सचमुच गाने लायक है हमारा राष्ट्रगान (श्रुतिलेख)



राजीव दीक्षित से मेरा पहला परिचय हाल ही में इंटरनेट के माध्यम से हुआ। मैं उनसे और उनके अंग्रेजों के समय के इतिहास की और भारत की गुलामी से पूर्व की स्थिति पर इतिहास की जानकारी से प्रभावित हुआ। उनका जन्म 1967 में उत्तर प्रदेश में हुआ था। वे आई आई टी के छात्र, फ्रांस में इंजीनियर और वैज्ञानिक भी रहे। कलाम के साथ भी काम किया। आजादी बचाओ आंदोलन के प्रणेता रहे। अल्पायु में ही 2010 में उनकी मृत्यु हो गयी। बाद में वे योग वाले बाबा रामदेव के भारत स्वाभिमान आंदोलन के सचिव रहे और इस आंदोलन के दौरान कई बेहद महत्वपूर्ण व्याख्यान दिए। उनके कुछ व्याख्यान मैंने सुने और सुन रहा हूं। फिर सोचा कि इन व्याख्यानों को शब्द में बदल दिया जाय तो सबसे पहला श्रुतिलेख आपके सामने है। यह व्याख्यान सबसे छोटा था (19 मिनट 45 सेकेंड का) इसलिए शुरुआत इससे ही कर रहा हूं। यह काम बहुत कठिन है। कम से कम मेरे लिए तो बहुत श्रमसाध्य है। फिर भी मैंने इसे सुनकर ज्यों का त्यों एक -एक शब्द लिखा है। भारतीयता और भारत को समझने में उनके व्याख्यानों से मदद मिलती है। अब आपको राजीव के व्याख्यान पढने को मिलते रहेंगे। यह व्याख्यान कब का है, कहां दिया गया, मुझे नहीं मालूम। इस व्याख्यान में आनंदमठ और गीतांजलि की बात आयी है। इसलिए इन दोनों को डाउनलोड करने के लिए लिंक दे रहा हूं।

सोमवार, 14 मार्च 2011

आम आदमी क्या करे, अंधी है सरकार (दोहे)


हिन्दी साहित्य में एक बहुत ही मशहूर छंद रहा है दोहा। दो पंक्तियों में कुछ कहने के लिए यह भक्तिकालीन युग में काफी इस्तेमाल में लाया गया। कुछ लोगों का तो मानना है कि अब इसमें कोई शक्ति शेष बची ही नहीं या यूं कहें कि इसकी सारी शक्ति निचोड़ ली गयी। फिर भी आज दोहे लिखे जा रहे हैं। पहले के कवियों को धर्म, भक्ति, राजा के गुणगान और स्त्री के रूप श्रृंगार के अलावा और कोई विषय शायद ही मिलते थे। जब राजा महाराजा कवियों को सोने की मुद्राएं दे रहे हों तो भला उन्हें और समस्याएं कहां से दिखतीं। कबीर के दोहों को सब लोगों ने सुना है। दोहा इस अर्थ में भी खास है कि इसका सहज प्रवाह और तुकांत होने का गुण लोगों को आसानी से अपनी ओर खींचता था और शायद है भी। जब कोई छंद लय में बंधा हुआ हो तो उसे दुहराना या याद रखना सरल हो जाता है। जैसे हम अक्सर शेर याद रखते हैं और उनका इस्तेमाल अलग-अलग जगहों पे करते हैं ठीक वैसे ही दोहों को भी याद रखा जा सकता है। मुक्तक काव्य में दोहे अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

मंगलवार, 8 मार्च 2011

स्त्री और शब्द (कविता)


एक कविता जो मैंने 29 नवंबर 2010 को लिखी थी, आपके सामने है। 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। इसी अवसर पर सोचा कि यह कविता आपके सामने रखूं। इसमें हो सकता है कि शब्द ठीक से न पिरोया गया हो। अर्थ छितराये हुए हों। लेकिन मेरी पुरानी आदत है कि मैं अपने पहले की लिखी चीजों में कोई बदलाव नहीं करता क्योंकि वो मुझे याद दिलाती है कि मैंने उसे कैसे लिखा था। तो पढिए और बताइए लिखने वाला किस हद तक सिरफिरा मालूम पड़ता है।

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

रफी का सिर्फ एक ही पूरक है वह है -रफी


मनुष्य का जन्म दर्द से ही शुरु होता है। माता की प्रसव पीड़ा के साथ ही एक मनुष्य का आगमन इस संसार में होता है। शायद मनुष्य की दर्द पहली अनुभूति है। इसलिए ही कहा जाता है कि कविता से संगीत तक सभी का जन्म दुख या दर्द से ही हुआ है। संगीत में सबसे अहम स्थान है आवाज। सबसे पहले आदमी ने गाना शुरु किया होगा। इसके बाद ही तरह-तरह के वाद्य-यंत्र आए। सिर्फ़ आवाज के साथ यानि बिना वाद्य-यंत्रों के या सिर्फ एक ही वाद्य-यंत्र की सहायता से सबसे ज्यादा गाने गाने वालों में रफी शायद पहला नाम है।


बुधवार, 2 मार्च 2011

अंग्रेजी और अंग्रेजों के शासन में जी रहे हैं हम


एक वेबसाइट है भारत सरकार की। प्रकाशन विभाग आता है सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत उसी की बात कर रहा हूं। मैं पिछले दो-तीन वर्षों से इस साइट पर जाकर भारत 2008, 2009, 2010 तक किताब डाउनलोड करता था। लेकिन इस बार इण्डिया 2011 वह भी बहुत ही घटिया रूप में सिर्फ़ कुछ पन्नों में उसकी झलक दिखायी गई है, तो बहुत देर के बाद आ गयी है लेकिन भारत 2011 का अभी तक कोई अता-पता नहीं। हमारे प्रधानमंत्री और लगभग सारे मंत्री अंग्रेजों की मानस संतानें हैं। शायद इसलिये ऐसा हो रहा है कि जो किताब साल के शुरु में ही आ जाती थी वह आज तक इस साल में 60 दिन बीत जाने पर भी नहीं आयी है। और मुझे लगता भी नहीं कि आयेगी। हमारी सारी सरकारें खासकर वर्तमान सरकार अंग्रेज लोगों से भरी पड़ी है। प्रधानमंत्री को साल में एक दो बार ही आप हिन्दी और पंजाबी बोलते सुन पायेंगे। हमारे देश में एक और इतिहास है कि एक ऐसे आदमी को जिसे भारत की 80 करोड़ से भी ज्यादा जनता बोल सकती है, समझ सकती है ऐसी भाषा नहीं जानने वाले को राष्ट्रपति बनाकर भारत का प्रतिनिधि बनाया जाता है। शायद ही किसी देश में ऐसा हुआ हो कि एक राष्ट्राध्यक्ष अपनी राष्ट्रभाषा जानता ही नहीं हो।